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न्यायपालिका और गरीब - प्रशांत भूषण

अगर किसी से भी यह पूछा जाए कि देश की न्यायपालिका के दरवाजे तक सही मायने में कितने लोग पहुंच पाते हैं? तो नि:संदेह ! उत्तर होगा ''आधे से भी कम''। वजह- हमारी न्यायिक व्यवस्था। जिसे गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया था। अंग्रेजों की न्यायिक व्यवस्था ने हमेशा से आम आदमी को इंसाफ दिलाने के बजाय अंग्रेजों का साथ दिया ताकि भारतीय उनके गुलाम बने रहें। यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया के लिए न केवल अंग्रेजी भाषा इस्तेमाल की गई बल्कि उसे इतना जटिल बना दिया गया है कि आम आदमी वकीलों की मदद के बिना तो वहां तक पहुंच ही नहीं सकता। ड्रेस कोड भी जानबूझकर आम आदमी के दिलों में व्यवस्था के लिए खौफ पैदा करने के लिए बनाया गया था। किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए आदमी के लिए खुद को बचा पाना नामुमकिन है। वह पूरी तरह से पुलिस और न्यायपालिका की दया पर निर्भर है, क्योंकि उसे तो कोर्ट की भाषा समझ में आती नहीं, तो 'कोर्ट' अकेले ही सारी प्रक्रिया निपटा लेता है। इससे भी कड़वा सच तो यह है कि देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए बनाई गई न्यायिक व्यवस्था केवल कागजों पर ही नजर आती है। ऐसी व्यवस्था गरीबों को इंसाफ दिलाने का साधन हो ही नहीं सकती।
70 के दशक के उत्तरार्ध्द में जब जस्टिस भगवती-कृष्ण अय्यर ने जनहित याचिका की परम्परा बनाई; तक यह सोचा गया था कि एक ऐसा यंत्र है जो गरीब की रोजी-रोटी और अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयं नागरिकों द्वारा ही सर्वोच्च अदालत की भूमिका निभाई जाए और न्यायालय गरीबों के अधिकारों की रक्षा के लिए आम जनता की ओर से काम करे। तभी सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को विस्तार से परिभाषित किया। यह परिभाषा खासकर संविधान के अनुच्छेद-21 में दिये गए 'जीवन के अधिकार' के संबंध में थी। अनुच्छेद 21- में 'सम्मान से जीने का अधिकार' शामिल किया गया और सम्मानपूर्वक जीने के लिए भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए।
इसलिए 80 के दशक में लीक से हटकर भी कुछ फैसले लिए गए। बेगार पर रोक, कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, बंदीकरण सुरक्षा के अधिकार, पागलखानों में सुरक्षित परिस्थितियां, बेघर-फुटपाथियों के अधिकार आदि कई मुद्दों पर न्यायालय ने सकारात्मक रवैया अपनाया। लेकिन 90 के दशक में उदारीकरण के युग में गरीबों के प्रति उच्च न्यायालयों का रूख धीरे-धीरे बदलता गया। अब तो यह आलम है कि न्यायालय आम आदमी के लिए जीविका, आवास, आजादी आदि सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार को निर्देश देने से भी पीछे हट रहे हैं। यहां तक कि अपने ही दिये हुए पुराने निर्णयों को ही नकार रहे हैं। वे निर्णय जो गरीबों के लिए आवास, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के कोई प्रबंध न होने की वजह से पूर्व में न्यायपालिका द्वारा दिऐ गए थे।
आज गरीब आदमी 'नव आर्थिक उदारीकरण' की नीतियों की मार झेल रहा है। उसकी जमीन, पानी और रोजी-रोटी राज्य द्वारा कब्जाई जा रही हैं ताकि सबकुछ बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धन्ना-सेठों की खनन, सेज और दूसरे बड़े-बड़े प्रोजेक्टों, आदि के लिए दी जा सकें। ऐसे में न्यायालयों को उन गरीबों की मदद के लिए आगे आना चाहिए था, जिनके अधिकार छीने जा रहे हैं। गरीबों के लिए कुछ करना तो दूर, न्यायालय उन संस्थाओं और लोगों की आवाज भी नहीं सुन रहे हैं, जो इन गरीबों के लिए न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
न्यायालयों में आजकल गरीब विरोधी निर्णयों का तो फैशन ही चल पड़ा है। मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग द्वारा दायर किए जनहित मुकद्मों में जो न्यायालय गरीब-पक्षधर सकारात्मक रूख अपनाते थे, दुर्भाग्यवश आज वे ही अपने फैसलों से गरीबों से आवास, व्यवसाय, रोजी और यहां तक कि आजादी भी छीन रहे हैं। बहुत से मामलों में तो देखा यह जा रहा है कि कोर्ट गरीबों को नोटिस तक देने की जहमत नहीं उठा रहे हैं, जिनके घरों को उनके फैसले पर उजाड़ दिया गया, रोजी छीन ली गई है और आजीविका एक ही पल में मिट्टी कर दिए गए और इस सबको 'कानून का शासन' नाम का जामा पहनाया जा रहा है। अमीरों को साफ-सुथरा पर्यावरण देने के कानून के लिए शासन के नाम पर गरीबों को सरकारी जमीन पर बने उनके मकानों में रहने से रोका जाता रहा है। जैसे कि दिल्ली और मुम्बई में हमने देखा कि एक ओर तो उच्च-मध्यम वर्ग की कॉलोनियों के पास बनी गरीबों की झुग्गियों की उजाड़ दिया गया तो दूसरी ओर दिल्ली की सड़कों से साइकिल और रिक्शा चलाने वालों को महज इसलिए हटा दिया गया, ताकि मध्यम और उच्च वर्ग के अमीरजादों को कार में घूमने का रास्ता साफ/क्लियर मिल सके।
ऐसा लगता है कि इन निर्देशों के पीछे 'कोर्ट' और सरकार की मिलीभगत है, क्योंकि सरकार दिल्ली में यमुना पुश्ता पर बनी झुग्गियों को हटाना चाहती थी ताकि उस जमीन पर फाइव स्टार होटल और शॉपिंग माल्स बनाए जा सकें। सरकार में इतना दम नहीं था कि वह राजनीतिक रूप से इन झुग्गियों को हटाती। वजह, चुनाव में हर पांच साल बाद वोट भी तो लेने होते हैं। सो इसने न्यायपालिका के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई, क्योंकि न्यायपालिका लोकतांत्रिक या अन्य किसी भी तरह से, किसी भी प्रकार के संस्थान के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह बड़ी आसानी से ऐसे आर्डर पास कर सकती थी, खासकर तब; जबकि फैसले इस वर्ग (न्यायपालिका के इलीट वर्ग) के भी अनुकूल थे। पिछले कुछ सालों से जिस तरीके से कामगारों और मजदूरों के लिए बने कानूनों को बिगाड़ा है। उससे सरकार और न्यायपालिका की जालसाजियों की सारी पोल खोल दी है। जैसे ही आर्थिक नीतियों का उदारीकरण किया गया और विदेशी कंपनियों को भारत में दुकानें खोलने के लिए बुलाया गया तो उद्योगों ने श्रम कानूनों को भी कम करने के लिए कदम उठाए और हवाला दिया कि देश को नए श्रम सुधारों की जरूरत है। इन सुधारों से श्रमिकों को मिली हुई सुरक्षा खत्म हो जाएगी और उन्हें अपने मालिकों की दया पर जीना होगा।
इसके बाद की सरकारों के लिए श्रम कानूनों को खत्म करना जरा मुश्किल था क्योंकि वे सभी वामपंथी पाटियों के सहयोग पर निर्भर थीं या फिर उन्हें कामगारों और गरीबों से अगले चुनावों में वोट न मिलने का भी खतरा था। लेकिन तभी फिर से 'न्यायपालिका' में सुविधाजनक रास्ता खोज लिया गया और न्यायपालिका ने बड़ी ही सफाई से मजदूरों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर अपनी कैंची चला दी। इन कानूनों की नई परिभाषाएं देकर गरीब मजदूरों को कर्ज और मुफलिसी की जिंदगी के जीने का फरमान सुना दिया। 'कांट्रेक्ट लेबर एक्ट' तो एक तरह से खत्म ही हो गया है, क्योंकि एक के बाद एक मुकद्मे होने के बावजूद भी न्यायालय इसे लागू करने से इनकार कर रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय तो इनसे भी एक कदम आगे चला गया और कहा कि 'न्यायालय अपनी राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों के अनुसार श्रम कानूनों को परिभाषित कर सकती हैं।' इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय की एक अन्य बेंच ने भी सरकार के उस फैसले को उचित ठहराया जिसमें उसने मॉरिशस में रजिस्टर्ड किसी 'एक पोस्ट बॉक्स कम्पनी' को 'इण्डो-मॉरिशस डबल टैक्सेशन अवाइडेंस एग्रीमेंट' का लाभ उठाने की अनुमति दे दी और इस तरह भारत को कोई भी टैक्स न देने का रास्ता साफ कर दिया। अब यह भारत में काम कर रही सभी विदेशी कंपनियां इसी रास्ते पर चल रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब सरकार ऐसे आदेश देकर कम्पनियों को कर से छूट दे सकती है। यह तो एक व्यवस्थित संसदीय-प्रक्रिया का भी माखौल है क्योंकि संसद केवल वित्त विधेयक द्वारा ही करों में छूट आदि के कानून बना सकती है।
नक्सलियों, माओवादियों या फिर मानव अधिकारों के लिए लड़ने वालों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के मामलों में भी न्यायालयों का अनुदारवादी और फासीवादी रूख नजर आ रहा है। राज्यों ने जिन लोगों को नक्सलवादी और माओवादी करार दिया, उनकी अपीलों के साथ जिस तरह न्यायालय ने व्यवहार किया और जिस तरीके से समाजसेवी डॉ. विनायक सेन की जमानत नामंजूर की, वह सब इस बात की तरफ इशारा करता है कि कुछ न्यायधीशों ने फासीवादी रूख अपनाने का मन ही बना लिया है।
अब यह बात साफ हो गई है कि अब न्यायपालिका गरीबों पर अत्याचार करने, भयभीत करने और यहां तक कि गरीबों से सबकुछ छीन लेने वाला तंत्र बनकर रह गई है। वह भी आम-जन को डराने और अत्याचार करने वाली संस्था बन गई है। ठीक वैसे ही जैसे पुलिस और नौकरशाही; आज विदेशी कंपनियों के पिट्ठू बनकर आम आदमी पर अत्याचार कर रहे हैं।
न्यायपालिका के जन-विरोधी रूख के लिये दरअसल इसका ढांचा ही जिम्मेदार है। इसमें वर्गीय प्रतिनिधित्व, चयन की प्रक्रिया और सदस्यों का स्थायित्व आदि कई खामियों ने न्यायपालिका को जनता की पहुंच से दूर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय में ज्यादातर जज ऊंची जाति और उच्च मध्यम वर्ग से आते हैं। इसलिए गरीबों के प्रति सहानुभूति तो शायद ही उनके मनों में होती है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में ही अपारदर्शिता, निरंकुशता और भाई-भतीजावाद चलता है। जो व्यक्ति या अधिवक्ता उनके संघ के साथ मेल नहीं खाता और शासक वर्ग के साथ जिसका तालमेल नहीं है उसे चयन की प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया जाता है। 1993 में न्यायपालिका ने संविधान की नई व्याख्या करके जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका के हाथों से छीन लिया और कार्यपालिका से स्वयं को 'मुक्त' करने के लिए न्यायपालिका ने सब किया। यह सब किया आजादी के नाम पर लेकिन गौर किया जाए तो इस सबसे न्यायपालिका की न तो स्वतंत्रता बढ़ी है; न ही न्यायपालिका में कोई सुधार ही हुआ है।
अब देश की जनता के लिए समय आ गया है कि वह वर्तमान न्यायिक व्यवस्था और उस प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाए, जिससे वह गरीबों को न्याय और अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अत्याचारी शासक बन गई है।
न्यायपालिका के सभी पक्षों और सारी कारगुजारियों को ध्यान में रखकर और विमर्श करके ही यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि अब क्या किया जाए, इसी को ध्यान में रखते हुए गरीब और न्यायपालिका पर चर्चा के लिए यह सभा आयोजित की गई है। इस सभा में हम न्यायपालिका के ढांचे, कार्यों, कार्यवाहियों और व्यवहार पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह चर्चा खासतौर पर गरीबों के प्रति न्यायपालिका के व्यवहार पर होगी। चर्चा में न्यायपालिका के कार्यों में बदलाव लाने वाले, ढांचागत परिवर्तनों का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की जाएगी ताकि न्यायपालिका आम आदमी के अधिकारों को लागू और रक्षा करने वाली बनें। इन परिवर्तनों को लागू करने के लिए हमें अफसरों पर दबाव डालने के लिए एक अभियान और राजनीतिक स्ट्रेटेजी बनाने की जरूरत है।
हमें उम्मीद है कि जन आंदोलनों के प्रतिनिधि, ग्रासरूट संस्थाएं और दूसरे वे सभी लोग जो देश में न्यायपालिका की हालत पर चिन्तित हैं, इस सभा में जरूर भागीदारी करेंगें।

जज कानून से ऊपर तो नहीं: प्रशांत भूषण

हाल में टीवी पत्रकार विजय शेखर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भरी टिप्पणी की थी। उससे लोगों की यह धारणा मजबूत ही हुई है कि न्यायपालिका अपने भीतर की सड़ांध को छिपाने के लिए अपने अवमानना अधिकारों का प्रयोग करने की कोशिश करती है। शेखर ने यह दिखाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन किया था कि किस तरह भ्रष्ट तरीके से गुजरात की अदालतों से गिरफ्तारी वारंट हासिल किया जा सकता है। मीडिया और सभ्य समाज को न्यायपालिका के अपने अवमानना अधिकारों के प्रयोग की कोशिश का पुरजोर विरोध करना चाहिए। अगर हम अवमानना की कार्रवाई की धमकियों से डरते रहेंगे तो अपने गणतंत्र के भीतर एक गैरजवाबदेह न्यायिक तानाशाही को पनपने देने के दोषी होंगे।यही सोच कर इस साल मार्च में दिल्ली में आयोजित नेशनल पीपुल्स कॅन्वेंशन में न्यायिक जिम्मेदारी एवं सुधार अभियान का गठन किया गया।

विश्वबैंक का 'रिवॉल्विंग डोर' -प्रशांत भूषण

विश्वबैंक के पूर्व चीफ इकॉनोमिस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज ने 'ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स डिसकंटेन्ट्स' में बैंक और आईएमएफ की खुली आलोचना करते हुए कहा है कि इन संस्थाओं पर केवल साहूकार औद्योगिक देश ही हावी नहीं हैं बल्कि उन देशों में निहित व्यापारिक और आर्थिक हित भी इन संस्थाओं पर हावी हैं; इनकी नीतियों से भी यही बात सामने आती है। उनका कहना है कि ऐसा इसीलिये होता है क्योंकि विश्वबैंक और उस जैसी अन्य बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाएं अमीर देशों द्वारा नियंत्रित की जा रही हैं और इन अमीर देशों के वित्तमंत्री और केन्द्रीय बैंक के गवर्नर ही अपने देशों का विश्वबैंक और आईएमएफ में प्रतिनिधित्व करते हैं। स्टिग्लिट्ज आगे कहते है, ''वित्तमंत्री और केन्द्रीय बैंक के गवर्नरों की वित्तीय समुदाय के साथ आमतौर पर साठगांठ होती है, वे इन्हीं वित्तीय फर्मों से ही आते हैं और सरकारी नौकरी का अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद इन्हीं फर्मों में दोबारा लौट जाते हैं। यही वजह है कि ये व्यक्ति दुनिया को पूंजीवादी समुदाय की नजर से ही देखते हैं। इसलिये किसी भी संस्था के फैसलों में फैसले बनाने वालों के हितों और नजरिये की झलक स्वाभाविक रूप से दिखाई पड़ती है। हैरानी की बात नहीं है कि अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं ही विकसित औद्योगिक देशों के व्यवसायिक और पूंजीवादी हितों से गहरे रूप से जुड़ी हुई हैं।''
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न्यायिक जवाबदेही कहां? न्यायाधीश वाई. के. सब्बरवाल और दिल्ली में सीलिंग

न्यायिक जवाबदेही लंबे समय से समाज के हर जनमानस को सवाल उठाने पर मजबूर कर रही है। इसी मसले को लेकर प्रेस क्लब ऑव इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की गई। 'कैम्पेन फार ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफार्म' के बैनर तले आयोजित इस कांफ्रेंस में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, भास्कर राव और अन्य बुध्दिजीवियों ने भारतीय न्यायिक व्यवस्था में होते दुराचार के गंभीर मुद्दे उठाए।
प्रशांत भूषण ने बताया कि 16 फरवरी 2006 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई. के. सब्बरवाल ने दिल्ली के रिहायशी इलाकों में व्यवसायिक गतिविधियों में इस्तेमाल की जा रही संपत्तियों की सीलिंग के आदेश जारी किए थे। न्यायालय ने ये आदेश दिल्ली मास्टर प्लान-2001 के तहत विधि का शासन लागू करने के लिए जारी किए थे। सीलिंग से जनता को राहत देने के लिए कुछ समय बाद सरकार ने एक नया मास्टर प्लान-2021 लागू किया, जिसमें संपत्ति के व्यवसायिक इस्तेमाल जारी रखने की अनुमति दी गई थी। बावजूद इसके न्यायालय ने सीलिंग के अपने कठोर आदेश जारी रखे।
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद शॉपिंग मॉल और कमर्शियल कॉम्प्लेक्सों में दुकानों और दफ्तरों के दाम रातोंरात आसमान छूने लगे। अब सवाल यह उठता है कि क्या सीलिंग मॉल और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स डेवलपर्स को मुनाफा पहुंचाने के लिए की गई थी। सच तो यह है कि ये आदेश जस्टिस सब्बरवाल ने अपने दोनों बेटों चेतन और नितिन के मुनाफे के लिए जारी किए थे, जो उस समय तक एक्सपोर्ट और एम्पोर्ट का छोटा बिजनेस करते थे। बाद में उन्हाेंने बीपीटीपी ग्रुप कमर्शियल कॉम्प्लेक्स डेवलपर काबुल चावला और पुरुषोत्तम बाघेरिया के साथ साझीदारी कर ली थी। 2004 तक उनके पास मात्र तीन कंपनियां थी- पवन इम्पेक्स, साब्स एक्सपोर्ट और सग एक्सपोर्ट, जिनका रजिस्टर्ड ऑफिस सब्बरवाल का अपना घर 3/81 पंजाबी बाग था। इसे जनवरी 2004 में 6 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर स्थानांतरित कर दिया गया और 7 मई 2004 को जस्टिस सब्बरवाल ने सीलिंग के आदेश जारी किए। उसका खुद का घर तो बच गया और सीलिंग के आदेश के बाद तो मॉल्स और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के बिजनेस में उसके बेटों की चांदी हो गई। 22 अगस्त 2006 को पवन इम्पेक्स को यूनियन बैंक ऑफ इंडिया कनॉट प्लेस ने 28 करोड़ रुपए का लोन मंजूर किया, जिसमें सिक्योरिटी के तौर पर नोएडा के सेक्टर-125 में प्लॉट संख्या ए-3, 4 और 5 में स्थित प्लांट, मशीनरी और अन्य संपत्ति रखी गई, जबकि वहां असलियत में प्लांट के बजाय पांच लाख स्क्वायर फिट का एक बड़ा आईटी पार्क बनाया जा रहा है। तीनों प्लॉट (12 हजार वर्ग मीटर प्रति प्लॉट) पवन इम्पेक्स को उत्तर प्रदेश की मुलायम/अमरसिंह सरकार ने 29 दिसंबर 2004 को मात्र 3700 रुपए वर्गमीटर की दर पर आवंटित किए थे। 10 नवम्बर 2006 को 12 हजार वर्ग मीटर का ही एक अन्य प्लॉट (12ए सेक्टर-68) मात्र चार हजार रुपए वर्ग मीटर की दर से, 800 वर्ग मीटर के तीन प्लॉट (सी-103, 104, 105 सेक्टर-63) में 2100 रुपए प्रति वर्ग गज की दर से आवंटित किए थे। और ऊपर से इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा सीबीआई जांच के लिए दिए गए निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीपी सिंह ने रोक लगा दी। मजेदार बात तो यह है कि अमरसिंह की पोल खोलने वाले टेप पर भी जस्टिस सब्बरवाल ने ही रोक लगाई। इस तरह मात्र दो साल में ही जस्टिस सब्बरवाल के बेटे कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के बिजनेस में करोड़ों में खेलने लगे और यह सब उस दौरान हुआ जब जस्टिस सब्बरवाल मुख्य न्यायाधीश थे और सीलिंग आदेश जारी कर रहे थे।
पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने कहा कि सब्बरवाल और उनके बेटों का व्यवहार न्यायिक मर्यादाओं को भंग करता है। सीलिंग पर दिए गए उनके आदेश प्राकृतिक न्याय के सिध्दांत के खिलाफ है, क्योंकि इनके अनुसार कोई भी जज ऐसा मुकदमा नहीं सुन सकता, जिसमें उसके निजी स्वार्थ टकराते हों। सीलिंग के आदेश से संबंधी यह मामला भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में आता है।
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के निदेशक भास्कर राव, पूर्व कानून मंत्री श्री शांति भूषण और अन्य बुध्दिजीवियों ने इस मामले की पूर्णतया तहकीकात करने की मांग की है। 'कैम्पेन फार ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफार्म' ने समाज के प्रत्येक वर्ग से इसके खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया है ताकि संसद और सरकार पर एक उचित संवैधानिक संशोधन बिल के लिए दबाव बनाया जा सके।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन स्वरूप लेने लगा है

देश भर में चल रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ राष्ट्रीय सभा का आयोजन 7-8 फरवरी 2007 को नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित 'इण्डियन सोशल इंस्टीटयूट' में किया गया। इस सभा का आयोजन पूर्व वित्त सचिव (भारत सरकार) एस. पी. शुक्ला, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और नवधान्य की संस्थापिका डा. वंदना शिवा द्वारा किया गया। सभा का उद्देश्य जमीनी स्तर के आंदोलनों को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाना है, जो सेज़ के लिए कब्जाई जा रही जमीनों के अभियान के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। सभा में उपस्थित अनेक नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों और लड़ने वालों ने एकसाथ मिलकर जमीन और जमीन संबंधी अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक रणनीति पर विचार किया। इस अवसर पर सेज अधिनियम के सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक-राजनैतिक स्वरूप का विश्लेषण भी किया गया, जिससे यह बात साफ-साफ दिखाई देने लगी कि सेज कुछ नहीं है बल्कि लाखों किसानों से जमीनें छीनकर उन्हें कंगाल बना देने की एक बहुराष्ट्रीय साजिश है।
पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के विभिन्न भागों के बहुराष्ट्रीय भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लड़ने वाले जनांदोलन अपने संघर्ष को तेज करने के लिए एकजुट हो गए हैं। किसान जागरूक मंच (गुड़गांव-झज्जर), भारत किसान यूनिसन एकता (पंजाब), विदर्भ जनांदोलन (महाराष्ट्र), कर्नाटक राज्य रैयत संघ (कर्नाटक), विस्थापन विरोधी जनमंच (कलिंग नगर,उड़ीसा), राष्ट्रीय युवा संगठन (उडीसा), प. बंगाल खेत मजदूर समिति ( प.बंगाल), नंदीग्राम के किसान आंदोलन और अन्य संगठनों ने राष्ट्रीय सभा में मिलकर संघर्ष के लिए विचार किया। विभिन्न आंदोलनकारियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में चल रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षों के बारे में भी बताया। उनके व्याख्यानों में विद्रोह के स्वर स्पष्ट सुनाई दे रहे थे। कर्नाटक राज्य रैयत संघ की ओर से कर्नाटक में हो रहे संघर्ष के बारे में बोलते हुए बासवराजू ने कहा -''सारे गांव को ब्रोंकरों और बिचौलियों का गांव बनाया जा रहा है।''
अनुराधा तलवार जिनको सिंगूर में गिरफ्तार कर लिया गया था। 6 फरवरी को जेल से रिहा होने के बाद सीधे ही प.बंगाल से राष्ट्रीय सभा में पहुंचीं। उन्होंने बताया कि तेभागा आंदोलन में औरतो ने यहां तक कहा है कि ''हम जान दे देगें लेकिन चावल नहीं देंगें'', ''हम जान दे देंगे लेकिन जमीनें नहीं देंगे।''वालमार्ट की सप्लायर 'ट्रिडेंट ग्रुप ऑव इण्डट्रीज' के द्वारा बरनाला में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर रहे भारत किसान यूनियन एकता के सुखदेव सिंह ने बताया कि कैसे पुलिस ने गांव में आतंक फैला रखा है और जमीन की रक्षा करते हुए किस तरह तीन किसान भी शहीद हुए हैं। लेकिन किसान अब भी डटे हुए हैं। इस अभियान को उन्होंने ''मातृभूमि रक्षा'' का नाम दिया है। 31 जनवरी को पुलिस के साथ हुई आमने-सामने की भिड़ंत में 70 किसान घायल हो गए थे, इस संघर्ष की अगुवाई पन्द्रह वर्षीया एक लड़की द्वारा की गई थी। 9 फरवरी को बच्चे और औरतें मिलकर एक आंदोलन करेंगें जिसका नारा है ''''बच्चा-बच्चा झोक देंगे, जमीन ते कब्जा रोक देंगे।''
गुड़गांव और झज्जर में रिलायंस के खिलाफ लड़ने वाले 22 गांवों के जागृत किसान मंच की ओर से सद्बीर गुलिया ने बताया कि सेज बनाकर सरकार प्रोपर्टी डीलर बन गई है और जमीनें कब्जाने वाले बहुराष्ट्रीय माफिया राज्य के शासक बन बैठे हैं। उन्होंने आगे यह भी कहा कि किसान अपनी जमीनों के अधिकारों के लिए लड़ रहे है और लड़ते हुए जान भी देनी पडी, तो वे इसके लिए भी तैयार हैं। पूर्व नौ सेना अध्यक्ष एडमिरल रामदास, जो अब महाराष्ट्र के अलीबाग में किसानी करते हैं। वे भी 22 गांवों की समिति के सदस्य हैं और भारत के सेज (सिलेक्टिव एक्सक्लूसिव जमींदार) से अपनी जमीनें बचाने के लिए लड़ रहे हैं। उन्हांने बताया कि ''मैने 45 वर्षों तक देश की रक्षा के लिए काम किया है और अब सरकार हमारी जमीनों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दे रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हथियाई जा रही जमीनों की सबसे बड़ी कीमत उड़ीसा के किसानों और आदिवासियों को चुकानी पड़ी है। 2001 में काशीपुर में 3 और 2006 में कलिंगनगर में 13 आदिवासी मारे गए। उड़ीसा के प्रफुल्ल सामंत्र ने बताया कि उडीसा में 45 स्टील प्लांटों के लिए 2,00,000 एकड़ जमीन पर कब्जा किया जा रहा है और यह स्टील भी भारत की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं बनाया जाएगा। इससे तो ऐसा लगता है कि भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पर्यावरणीय छूट देकर अपने प्राकृतिक संसाधनों को खत्म कर रहा है।
इस अवसर पर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि ''भारत ने जमींदारी प्रथा खत्म करके भूमि हदबंदी की और भूमि सुधार किए, पर अब वही भारत नए जमींदारों की जमात पैदा कर रहा है। सेज के अंतर्गत अमीर कंपनियों को दावत दी जा रही है। अन्य व्यापारियों पर सीलिंग के आदेश दिए जा रहे हैं। रिलायंस को 60,000 एकड़ जमीन दी गई हैं। मुकेश अंबानी रिलायंस में 50 फीसदी का हिस्सेदार होने के कारण किसानों के 30,000 एकड़ जमीन का मालिक बन बैठा है।
गुड़गांव-झज्जर संघर्ष के महावीर गुलिया ने घोषणा की कि सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह सोचना छोड़ देना चाहिए कि वे किसानों को थोड़े से पैसे का लालच देकर जमींन से उनके रिश्ते को तोड़ देंगे। भूमि सुधारों संबंधी मुद््दों के विशेषज्ञ और पूर्व 'रूरल डेवलपमेन्ट सेक्रेटरी' के. बी. सक्सेना ने बताया कि मजदूर, शिल्पकार आदि को किसानों में गिना हीं नहीं जाता और जो 40 फीसदी लोग गिने जाते है उनमें भी केवल 14 फीसदी को ही पुर्नस्थापित किया गया है। पहले से ही देश में करोड़ो लोगों को उजाड़ा जा चुका है, इसके बाद 10 करोड़ किसानों को और जमीन से उजाड़ दिया जाएगा तो स्थिति और भी भयावह हो जाएगी, जिससे ऐसा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजन्तिक विनाश पैदा होगा जो भारतीय इतिहास में कभी नहीं हुआ। सरकार कई तर्कों का सहारा लेकर इस विस्थापन को उचित साबित कह रही है जैसे इसके लिए पश्चिमी समाजों के ऐतिहासिक विकास का उदाहरण देकर कहा जा रहा है कि भारत में बहुत ज्यादा किसान हो गए हैं। डा. वंदना शिवा और डा. उत्सा पटनायक ने बताया कि जब इंग्लैण्ड में किसानों को उजाडा गया था तो उन्होंने अमरीका में रेड इण्डियनों की, आस्ट्रेलिया में अबोरिजन और अफ्रीका में देसी समुदायों की जमीनों पर उपनिवेश बना लिए थे। अगर भारत के खेतों पर भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उपनिवेश बना लिए तो भारत के उजड़े किसान कहां जाएगे? जनांदोलनों ने सेज के खिलाफ एक साथ लड़ने का संकल्प किया। पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह, आगरा के सांसद राजबब्बर और जनमोर्चा के अध्यक्ष ने भी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के आंदोलन का साथ देने की घोषणा की। महाराष्ट्र के भूमंडलीकरण विरोधी आंदोलन के प्रमुख एन. डी. पाटिल भी इस सेमिनार में शामिल हुए और कहा कि सेज अधिनियम को खत्म किया जाना चाहिए। भारत जनांदोलन के नेता व पूर्व कमिश्नर बी डी शर्मा भी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लड़ रहे हैं, उन्होंने भी सभा को संबोधित किया और कहा कि यह लडाई जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने वाली कंपनियों और जनता के बीच है जो अपनी जमीन, पानी और जीविका की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही है। नवधान्य ने किसानों की भू सम्प्रभुता की रक्षा के लिए एक चार्टर और 'कंपनियों का जमीनों पर कब्जा' नामक रिपोर्ट भी सभा में प्रस्तुत की। आंदोलनों ने भारत में सेज के खिलाफ विरोध को राष्ट्रीयव्यापी करने का संकल्प किया।

न्यायपालिका में सुधारों के लिए हुआ जनसंगठनों का जमावड़ा

देश की आधी आबादी अभी भी न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंच नहीं पाती
-जस्टिस पी वी सांवत

नई दिल्ली, 10 मार्च (पीएनएन), परिवर्तन, सूचना अधिकारों का राष्ट्रीय अभियान, लोक राज संगठन, अभ्युदय, आशा आश्रम, मीडिया अध्ययन केन्द्र, लोकायन, झुग्गी बस्ती संघर्ष मोर्चा इन्दौर, दिल्ली फोरम, जागोरी, जनहित मंच मुम्बई, पीयूसीएल, जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, न्यायिक सुधार-जवाबदेही अभियान सहित दर्जनों संगठनों के सैकडों प्रतिनिधियों ने दिल्ली में न्यायपालिका में सुधारों के लिए 'जन पंचायत' की। जन पंचायत में न्यायपालिका को जबावदेह बनाने के लिए चिंतन किया गया। जनपंचायत में कहा गया कि न्यायालय द्वारा फैसलों में वर्शों का समय लगता है और अगर किसी मुकदमे का समय से निर्णय हो भी जाता है तो वह भी ज्यादातर विकृतिपूर्ण ही होता है। वास्तव में पूरी न्यायिक प्रक्रिया ही जबरदस्त भ्रश्टाचार की शिकार हो गयी है। न्यायपालिका में जवाबदेही के लिए कोई तंत्र न होने की वजह से, इसका भ्रष्टाचार दिखाई नहीं देता। तथाकथित महाभियोग की व्यवस्था के अतिरिक्त भ्रष्ट न्यायाधीषों को अनुषासित करने का अन्य कोई साधन नहीं है। यहां तक कि खुले रूप से रिष्वत लेने वाले किसी न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज कराने के लिए मुख्य न्यायाधीश की स्वीकृति लेना आवष्यक बना दिया गया है, जो कभी मिलती ही नहीं है। हद तो यह हो गयी है कि न्यायपालिका ने अपनी जवाबदेही से बचाव अपने ही द्वारा बनाए निर्णयों से कर रखा है, इसलिए जनपंचायत ने एक सुर में कहा कि न्यायिक-सुधार आज के समय की मांग है। जनपंचायत को न्यायधीश पीबी सांवत, एडमीरल के तेहलियानी, लेखिका अरुंधति राय, पूर्व कानूनमंत्री शान्ति भूषण आदि ने संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने किया।
न्यायाधीश पी वी सांवत ने जनपंचायत में बोलते हुए कहा कि न्यायपालिका में सुधार केवल वकालत के लोगों का काम नहीं है, जनता को भी पहल करनी होगी। देश की आधी आबादी न्यायलय से कोसों दूर है। 70 फीसदी आबादी को तो यह भी पता नहीं है कि न्याय उसका हक है। न्यायधीषों के चयन की प्रक्रिया में सुधार की ओर संकेत करते हुए उन्होंने एक स्वतंत्र चुनाव समिति बनाए जाने पर जोर दिया।
पूर्व कानूनमंत्री शान्ति भूषण ने अपने व्याख्यान में कहा कि न्यायपलिका में सुधार के लिए देश की जनता को आगे आना होगा। 57 साल पहले देश ने साम्राज्यवादी षासन से मुक्त होकर प्रजातंत्र का रास्ता चुना था। अब लोगों की जिम्मेदारी है कि लोग सभी व्यवस्थाओं की समीक्षा करें। न्यायपालिका की समीक्षा जनता कड़े रूप से करे। आज बहुत सारे ऐसे न्यायधीश हैं, जिन्हें नहीं होना चाहिए। निहायत जरूरी हो गया है कि न्यायाधीश प्रतिवर्श अपनी संपत्ति की घोशणा करें। साथ ही न्यायधीषों के भ्रश्टाचार पर नियंत्रण के लिए जनता, संसद, विपक्श और न्यायपालिका को मिलाकर आयोग बनाया जाना चाहिए, न कि केवल न्यायधीशों का।
प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय ने कि न्यायपालिका सबसे ज्यादा शक्तिशाली तंत्र बनती जा रही है, यहां तक कि हमारे जीवन पर भी हावी होती जा रही है। न्यायपालिका की जवाबदेही मात्र अमीरों के प्रति ही रह गयी है। विवेक, दृश्टि का अभाव न्यायपालिका के फैसलों में आम बात हो गयी है। असल में तो न्यायपालिका को आम आदमी के चौकीदार की तरह काम करना चाहिए।
इस अवसर पर अध्यक्षता व्याख्यान में एडमिरल तेहलियानी ने चुटकी ली कि पुलिस के बाद न्यायपालिका ही दूसरा सबसे भ्रष्टतंत्र है। 'जनपंचायत' में जुटे संगठनों ने देश भर में न्यायपालिका में सुधारों के लिए देश व्यापी अभियान चलाने का संकल्प जाहिर किया।

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