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विश्वबैंक पर काबिज बहुराष्ट्रीय शक्तियां -शाल्मली गुत्तल

गरीबी हटाने और आर्थिक विकास के लिए विश्वबैंक विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 18-20 बिलियन अमरीकी डॉलर कर्ज और सहायता के रूप में देता है। बैंक अपनी एजेंसी अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के साथ मिलकर उन देशों में भी काम कर रहा है जो अब कोष के कर्जदार नहीं हैं। बैंक की सारी आर्थिक सहायता सरकारों को नहीं मिलती, बल्कि ज्यादातर हिस्सा प्राइवेट सेक्टर खासतौर पर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जाता है, जो कर्ज, तकनीकी सहायता और निवेश के खतरों को कम करने के रूप में होती हैं। अमीरों का समर्थन- पिछले 60 सालों में बैंक 'इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट' (आईबीआरडी) नाम की एक संस्था के स्वरूप से उठकर पांच संस्थाओं में विस्तृत हो गया है, ये पांचों संस्थाएं विशिष्ट कार्यक्षेत्र से संबंधित हैं। इनमें आर्थिक सहायता के........................
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विश्वबैंक और मानवाधिकार -एरिक टुसेन्ट

जब मैं बैंक में आया तब हमें corruption शब्द का उल्लेख करने की अनुमति नहीं थी, इसे ‘c’ शब्द कहा जाता था, लेकिन हमें ‘r’ यानी ‘right’ शब्द का उल्लेख करने की जरूरत है।- जेम्स बोल्फेन्सोह्न (1 मार्च, 2004)
मानव अधिकारों का सवाल कभी विश्वबैंक की प्राथमिक चिन्ता नहीं रहे हैं। बैंक द्वारा लगाई गई शर्तों में 'निजी संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार' का एक अधिकार अकेला ही सभी पर भारी पड़ रहा है जो व्यवहारिक रूप धन्ना-सेठों को मुनाफा पहुंचाने के लिए काम करता है, ये धन्ना सेठ कोई धनी व्यक्ति या राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां हो सकती हैं।
विश्वबैंक की शर्तों में जनता के सामूहिक अधिकारों का कोई जिक्र तक नहीं है। अगर विश्व बैंक में कहीं मानव अधिकारों पर जरा भी ध्यान दिया जाता है तो वह संयुक्त राष्ट्र के नीतिगत दस्तावेजों की तरह ही प्रगतिशील नहीं होता। अधिकार जैसी संकल्पनाओं की वह अपने ही तरीके से व्याख्या करता है।
जेन-फिलिप्पी पीमन्स ने बिल्कुल सही कहा है ''वर्तमान पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में मानव अधिकारों का संबंध हर हाल में निश्चित तौर पर कार्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी कार्यों में अहस्तक्षेप, अपनी संपत्ति की देखरेख के अधिकार से है और इन सबसे ऊपर है, किसी भी ऐसे कार्य को रोकने की राज्य की जिम्मेदारी; जो उत्पादन और विनिमय में समय, पूंजी और संसाधनों के निवेश की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करता है... नव उदारवारी सामाजिक और आर्थिक मांगे वैधानिक इच्छाएं तो कही जा सकती हैं, लेकिन अधिकार नहीं... नव उदारीकरण का विचार अधिकारों के किसी भी सवाल के सामूहिक सिध्दांत को नकारता है। केवल मात्र व्यक्ति ही अधिकारों की मांग कर सकता है और जो अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, वह भी अनिवार्य रूप से व्यक्ति ही हैं, अपने कार्यों के प्रति उनकी जवाबदेही भी होनी चाहिए। अधिकारों के उल्लंघन का संबंध किसी भी संगठन या निकाय से नहीं जोड़ा जा सकता है।''

आईएमएफ-विश्वबैंक और दुनिया में गरीबी - माइकल परेंटी

हमें इस रहस्य को अवश्य जानना चाहिए कि लगभग पिछली आधी शताब्दी से दुनिया में गरीब देशों को अन्तरराष्ट्रीय कर्जे, विदेशी सहायता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का निवेश, जितना बढ़ा है, उतनी ही गरीबी बढ़ी है। ऐसा कैसे हो सकता है? दुनिया की जनसंख्या से ज्यादा तेज गति से गरीबों की संख्या बढ़ी है।
पिछली अर्ध्दशती के दौरान अमरीकी उद्योगों, बैंकों और पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने 'तीसरी दुनिया' के गरीब देशों- एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमरीका में ही निवेश किया है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां विशाल प्राकृतिक संसाधनों और ऊंचे मुनाफे से आकर्षित हुई हैं क्योंकि वहां न केवल सस्ता श्रम मिलता है बल्कि करों, पर्यावरणीय नियमों, कामगारों के लाभ और कार्य-सुरक्षा लागतों आदि में पूरी तरह से रियायत मिलती है। अमरीकी सरकार ने कंपनियों को समुद्रपारीय पूंजी निवेश के लिए न केवल करों में रियायतें दे रखी हैं बल्कि उन्हें नए स्थान पर बसने के लिए, खर्चे भी उठा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां घरेलू व्यापार को तीसरी दुनिया में बढ़ाती हैं और उनके बाजारों पर कब्जा कर लेती हैं।

विकासशील देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां -कंवलजीत सिंह

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी नब्बे के दशक में अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में काफ़ी बदलाव आया। मध्य 90 में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां विकासशील देशों से उभर कर आई हैं । जहाँ एक तरफ ये कंपनियां विकासशील देशों में तो निवेश कर रही हैं, वहीं उलटे ये विकसित देशों में भी बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं। इनका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विकासशील और विकसित देशों में तेजी के साथ बढ़ा है। इसका परिणाम हुआ है कि विकसित देशों के द्वारा विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से ज्यादा आज विकासशील देश विकसित देशों में निवेश कर रहे हैं।

यह पूरी तरह जंग है और दोनों ही पक्ष अपने-अपने हथियार चुन रहे हैं: अरुंधति रॉय

(अरुंधति रॉय से शोमा चौधरी की बातचीत)

आज पूरे देश में जो हिंसा का माहौल बना हुआ है; आप इन चीजों को कैसे देखती हैं? इनके क्या कारण हैं? इसे किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए?
यह सब देख पाने के लिए विद्वान होना कोई जरूरी नहीं है। हमारे बीच एक ऐसा मध्यमवर्ग बढ़ रहा है, जिसमें स्वछंद-उपभोक्तावाद और बेतहाशा लालच पनप रही है। इसके लिए औद्योगिक पश्चिमी देशों ने तो संसाधनों की लूट व 'श्रमिक-दासों' के लिए उपनिवेश कायम कर लिए थे। लेकिन हमने तो अपने भीतर ही उपनिवेश कायम कर लिए हैं और खुद को ही खाना शुरू कर दिया है। बाजारीकरण के लिए बढ़ाई गई यह बेतहाशा लालच, ( इसे ही राष्ट्रवाद के रूप में बेचा जा रहा है) लालच की प्यास गरीबों से उनकी जल-जंगल और जमीन को लूट करके ही बुझा सकते हैं।
आजाद भारत में जो सबसे सफल अलगाववाद आन्दोलन हम देख रहे हैं, वह यह है कि उच्च और मध्यम वर्ग ने अपने आपको पूरे देश से काट लिया है, यह संघर्ष लम्बवत है, क्षैतिज नहीें। वे वैश्विक प्रभु वर्ग में शामिल होकर एक अलग स्वर्ग बना लेना चाहते हैं, क्योंकि वे इसे अपना हक समझते हैं। उसने कोयला, खनिज, बाक्साइट, पानी और बिजली आदि सभी संसाधनों पर पहले ही कब्जा जमा लिया है। अब उन्हें और ज्यादा कारें, और ज्यादा बम, और ज्यादा खदानें- सुपरपावर्स के नागरिकों के लिए सुपरट्वायज (बम, मिसाइल आदि) बनाने के लिए गरीबों के जमीन की जरूरत है। यह पूरी तरह एक जंग ही है, जहाँ अमीर-गरीब दोनों तरफ के लोग अपने-अपने हथियार चुन रहे हैं। उच्च वर्ग की बेतहाशा लालच को पूरा करने के लिए ही सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां ढ़ांचागत समायोजन में जुटी हैं, इस व्यवस्था को विश्व बैंक, एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश), एडीबी (एशियन विकास बैंक), न्यायालय के आदेश, नीति-निर्माता, कार्पोरेट मीडिया और पुलिस आदि मिलकर सब के सब जनता की गर्दन दबा रहे हैं। इसके विपरीत, जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं; उन्होंने धरने, भूख हड़ताल और सत्याग्रह किये, न्यायालय गए और हर उस काम को किया, लेकिन राहत नहीं मिली, इसलिए अब वे हताश होकर बंदूक उठा रहे हैं। क्या ये हिंसा बढ़ेगी? अगर जनता की प्रगति और सम्पन्नता मापने का बैरोमीटर सेंसेक्स और विकास दर ही है, तो निश्चित रूप से हिंसा बढ़ेगी। मैं इस सबको किस रूप में देखती हूं? इन चीजों को देखना ज्यादा मुश्किल नहीं है, यह तो साफ-साफ दिखाई दे रहा है। बीमारी तो सिर चढ़ गयी है।

आपने एक बार कहा था कि चाहे मैं हिंसा का सहारा नहीं लूगीं लेकिन देश के हालात को देखकर उसकी निंदा करना मैं अनैतिक मानती हूं। क्या इसे आप तफसील से बता सकती हैं?
गुरिल्ला बनकर तो मैं बोझ बन जाउंगी! मुझे शक है कि मैंने 'अनैतिक' शब्द का प्रयोग किया होगा, 'नैतिकता' शब्द गिरगिट जैसी हो गयी है, जो माहौल देखकर रंग बदल लेती है। मैं ऐसा महसूस करती हूं कि अहिंसक आंदोलन दशकों से इस देश की हर लोकतांत्रिक संस्था का दरवाजा खटका रहे हैं, लेकिन वे उपेक्षित और अपमानित ही हुए हैं। भोपाल गैस पीड़ितों या नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) को ही देख लीजिए। नर्मदा बचाओ आंदोलन के पास किसी भी दूसरे जनांदोलनों के अपेक्षा एक रसूख नेतृत्व, मीडिया कवरेज और संसाधन थे। लेकिन हुआ क्या? आज लोग रणनीति पर पुनर्विचार के लिए बाध्य हो गये हैं। आज जब सोनिया गांधी दावोस के वर्ल्ड इकॉनामिक फ़ोरम का गुणगान कर रहीं हैं, तो हमारे लिए यह सोचने और चौंकने का समय है। उदाहरण के तौर पर क्या आज एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य में सविनय अवज्ञा करना संभव रह गया है? क्या यह ऐसे युग में संभव है, जबकि मीडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित है और गलत सूचनाएँ जनता तक पहुँचा रहा है? क्या भूख हड़ताल और 'सेलिब्रेटी पोलिटिक्स' के बीच नाभिकीय रिस्ता हो गया है? अगर नांगला मांछी या भाटी माइन्स के लोग भूख हड़ताल करने लगें तो क्या कोई उनकी परवाह करेगा? इरोम शर्मिला पिछले छ: सालों से भूख हड़ताल पर है। यह हममें से कईयों के लिए सबक भी है। मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि यह एक माखौल की बात है कि ऐसे देश में जहाँ अधिकांश लोग भूखे रहते हैं; वहाँ भूख हड़ताल को राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अब जमाना बदल गया है, हमारे शत्रु का स्वरूप बदल गया है। हम एनजीओ के युग में प्रवेश कर चुके हैं या कहें कि हम 'पालतू शेर' के एक युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहां जनांदोलन का रास्ता भी फिसलन भरा हो सकता है। पैसे देकर प्रदर्शन और प्रायोजित धरने कराए जाते हैं, सोशल फोरम बनाई जाती हैं, जो लड़ाकू प्रवृत्ति रखने की नाटकीय भूमिका अदा करती हैं, लेकिन वह जो उपदेश देती हैं, खुद उसका कभी पालन नहीं करतीं। हमारे पास भिन्न-भिन्न तरह के 'आभासी' विरोध होते हैं। सेज बनाने वाले ही सेज के खिलाफ़ बैठकों को प्रायोजित कर रहे हैं। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ही पर्यावरण सुरक्षा और सामुदायिक कार्यों के लिए पुरस्कार और सहायता दे रही हैं। उड़ीसा के जंगलों में बाक्साइट का उत्खनन करने वाली कंपनी 'वेदांता' अब विश्वविद्यालय शुरू करना चाहती है। टाटा के दो चैरिटेबल ट्रस्ट हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश भर के जनांदोलनों और आंदोलनकारियों को पैसे दे रहे हैं, क्या यही कारण तो नहीं है कि सिंगूर की आलोचना नंदीग्राम से कम हो रही है और शायद इसीलिए न तो उन्हें निशाना, न ही बहिष्कार व घेराव किया गया है।
निश्चित रूप से टाटा और बिड़ला ने गाँधी को भी पैसा दिया था- शायद वही (गांधी) हमारे पहले एनजीओ थे। लेकिन आज के एनजीओ तो बहुत शोर करते हैं, बहुत सी रिपोटर्ें लिखते हैं, लेकिन सरकार को इनसे किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं है। पूरे राजनीतिक माहौल में भाड़े के लोग अपनी नौटंकी को ही असली राजनीति साबित करने में जुटे हैं। दिखावे का प्रतिरोध आज बोझ बन गया है।
एक समय था जब जनांदोलन न्याय के लिए न्यायालय की तरफ़ देखते थे, लेकिन अब तो न्यायालयों ने पक्षपातपूर्ण फैसलों की झड़ी लगा दी है, अनेकों ऐसे निर्णय दिए हैं, जो अन्यायपूर्ण हैं, जिनमें गरीबों की इतनी बेइज्जती की जा रही है और जो भाषा इस्तेमाल की गयी है, उससे तो हलक सूख जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फ़ैसले में वसन्तकुंज मॉल के पुन:निर्माण की आज्ञा दी है, हालांकि इसके पास आवश्यक कानूनी मंजूरी भी नहीं है। इस फैसले में न्यायालय ने कहा कि किसी भी कारपोरेशन द्वारा गोरखधंधा करने का सवाल ही नहीं उठता है।
बहुराष्ट्रीय भूमंडलीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भूमि हड़पने, एनरॉन और मोन्सेंटो, हेलीबर्टन और बैक्टेल के जमाने में यह बोलना देश की सबसे शक्तिशाली संस्थाओं के विचारधारा को उजागर कर देती है। कॉर्पोरेट प्रेस के साथ-साथ न्यायपालिका भी नवउदारवाद का हथियार बन गयी है। ऐसे माहौल में जबकि लोग खुद को इस अनवरत लोकतांत्रिक प्रक्रिया से थका हुआ महसूस कर रहे हैं, उन्हें केवल जलील किया जाता है, ऐसे में उनको क्या करना चाहिए? ऐसा नहीं है कि उनके पास हिंसा या अहिंसा का ही रास्ता बचा है। ऐसे राजनैतिक दल भी हैं, जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास तो करते हैं, लेकिन यह उनकी पूरी स्ट्रैटेजी का केवल एक हिस्सा है; इन संघर्षों में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को बेरहमी से मारा-पीटा गया है और झूठे आरोप भी लगाए भी गये हैं, गिरफ्तार भी किया गया है। जनता इस बात को अच्छी तरह समझती है कि हथियार उठाने का मतलब क्या है; हिन्दुस्तान के राजकीय हिंसा के हजारों रूपों को अपने ही झेलना। छापामार सशस्त्र सर्ंञ्ष अगर रणनीति बन जाए तो आपकी दुनिया सिमट जाती है और सिर्फ दो ही रंग- स्वेत या श्याम दिखाई पड़ते हैं। लेकिन सभी विकल्प खत्म हो जाने पर हारकर जनता हथियार उठाने का निर्णय लेती है तब क्या हमें उसकी निंदा करनी चाहिए? क्या कोई विश्वास करेगा कि अगर नंदीग्राम के लोग धरना देते या गाना गाते तो पश्चिम बंगाल सरकार अपना निर्णय वापस ले लेती?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां निष्क्रिय रहने का मतलब निरंकुशता का समर्थन करना है (जो निश्चित रूप से हममें से कुछ लोगों को भाता भी है) और सक्रिय होने का मतलब भयानक कीमत चुकाना है और जो लोग इस कीमत को चुकाने के लिए तैयार हैं, उनकी आलोचना करना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है।

आपने बहुत सारी यात्राएं की हैं-बहुत सारे संघर्षों को भी देखा है, क्या उनके बारे में कुछ बता सकती हैं? आप कौन से ऐसे स्थानों पर गई हैं? क्या इन स्थानों के कुछ संञ्र्षों के मुद्दों पर आप रोशनी डाल सकती हैं?
बहुत बड़ा प्रश्न है- क्या कहूँ? कश्मीर में सैनिक कब्जा, गुजरात में नव फ़ांसीवाद, छत्तीसगढ़ में गृह-युध्द, उड़ीसा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा लूट, नर्मदा घाटी में सैकड़ों गांवों का डूबना, भुखमरी के कगार पर खड़े लोग, जंगलों का उजाड़ा जाना और भोपाल गैस त्रासदी के 24 वर्ष के आंदोलन से पीड़ितों को कुछ नहीं मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार नंदीग्राम में यूनियन कार्बाइड (जिसे अब 'डॉव केमिकल्स' ने खरीद लिया है।) को दोबारा निमंत्रण दे रही है। मैं अभी हाल में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र तो नहीं गई हूं, लेकिन हम जानते हैं कि वहां लगभग एक लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। आंध्र प्रदेश में हुईं झूठी गिरफ्तारियों और भयानक दमन के बारे में हम जानते ही हैं। इनमें से हर स्थान का अपना विशिष्ट इतिहास, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण है। इनका विश्लेषण करना आसान नहीं है, फिर भी इन सबमें कुछ चीजें जैसे विशाल अंतरराष्ट्रीयता, सांस्कृतिक और आर्थिक दबाव के कारण एक जुड़ाव है। हिन्दुत्व प्रोजेक्ट की भी मैं बात करना चाहूंगी, जो हमारे नश में अपना जहर फैला रहा है और एक बार फ़िर फटने का इंतजार कर रहा है। मैं कहूंगी कि इस सबके बाद भी विडम्बना तो यह है कि हम अब भी एक देश, एक संस्कृति और एक समाज हैं, जहाँ आज भी छुआछूत की प्रथा का प्रचलन है। जहां हमारे अर्थशास्त्री वृध्दि दर को लेकर डींग हांकते हैं, जबकि देश में अभी भी पेट पालने के लिए लाखाें दलित प्रतिदिन दूसरे लोगों के मनों मैला अपने सिर पर ढोते हैं। दुनिया में कोई और ऐसा सुपरपावर है क्या?

हाल ही में बंगाल में हुई राज्य और पुलिस द्वारा हिंसा को कैसे देखा जा सकता है?
यह मामला किसी अन्य दूसरे राज्यों में हुई राज्य और पुलिस द्वारा हिंसा से अलग नहीं है- इसमें पाखंड और दोमुहें व्याख्यानों का मामला भी शामिल है, जिसमें मुख्यधारा के वामपंथी दल सहित अन्य सभी राजनैतिक पार्टियों की वाकपटुता शामिल है। क्या साम्यवादियों की गोलियां पूंजीवादियों से अलग हैं? अजीब- अजीब घटनाएं हो रही हैं। सउदी अरब में बर्फ़ पड़ रही है, तो कहीं दिन में उल्लू दिखाई दे रहे हैं। चीन सरकार निजी संपत्ति के अधिकार विधेयक को पारित करने के लिए बैठक कर रही है। मुझे नहीं पता कि क्या यह सब वातावरण परिवर्तन की वजह से हो रहा है! चीन के साम्यवादी इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़ी पूँजीवादी बन रहे हैं। तो फ़िर हम अपने संसदीय वामपंथियों से अलग उम्मीद क्यों करें? नंदीग्राम और सिंगूर इस बात के स्पष्ट संकेत हैं।
यह सोचने की बात है कि क्या हर क्रांति का अंत आधुनिक-पूँजीवाद होता है? जरा सोचिए, आपको आश्चर्य होगा-फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रान्ति, वियतनाम युध्द, रंगभेद विरोधी संघर्ष और भारत में स्वतंत्रता के लिए कथित गाँधीवादी संघर्ष! इन सबका अंजाम क्या हुआ? क्या यह कल्पना का अंत है?

बीजापुर में माओवादी हमला- जिसमें पचपन पुलिस कर्मियों की मौत हुई थी। क्या यह विद्रोह राजकीय हिंसा का ही दूसरा चेहरा तो नहीं है?
कैसे यह कहा जा सकता है कि यह हमला राजकीय हिंसा का दूसरा चेहरा है? क्या कोई यह कहेगा कि जो लोग रंगभेद के खिलाफ़ लड़े, चाहे उनके तरीके कैसे भी रहे हाें, वह भी राजकीय हिंसा का दूसरा रूप था? जो अल्जीरिया में फ्रांसीसियों से लड़े उनके बारे में आप क्या कहेंगे? या जो नाजियों से लड़े, जो उपनिवेशवादी ताकतों से लड़े, या वे जो इराक में अमेरिकी कब्जे के खिलाफ़ लड़ रहे हैं, क्या यह सब भी राजकीय हिंसा का दूसरा रूप है? इससे आधुनिक मानव अधिकार वाली रिपोर्ट की भाषा का प्रयोग कर हम राजनीतिक बन जाते हैं, जिससे असली राजनीति बह जाती है। जितना भी हम धर्मात्मा बनने की कोशिश करें, जितना भी हम अपनी जटा में भभूत लगाएं, हमारे पास कोई विकल्प नहीं रह गया है। लेकिन दु:खद तो यह है कि हम हिंसा के माहौल में खुद को साफ-सुथरा नहीं रख सकते, हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। छत्तीसगढ़ में गृहयुध्द चल रहा है, जिसे राज्य सरकार चला रही है और सार्वजनिक रूप से बुश सिध्दांत का पालन कर रही है- 'अगर तुम हमारे साथ नहीं हो तो तुम आतंकवादियों के साथ हो।' इस जंग में औपचारिक सुरक्षा बलों के साथ-साथ सलवा-जुडूम भी एक प्रमुख हथियार है, जो नागरिक सेना का सरकारी समर्थन प्राप्त सशस्त्र सैनिक है, जो 'स्पेशल पुलिस आफ़िसर' (एसपीओ) बनने को मजबूर हो गया है। सरकारों ने कश्मीर, मणिपुर नागालैंड में भी यही कोशिश की है। हजारों लोग मारे गए हैं। लाखों लोगों को सताया गया है, हजारों लोग लापता हो गए हैं। कोई 'बनाना रिपब्लिक' ही ऐसी चीजों पर गर्व कर सकती हैं....... और अब सरकार इन नकारा तरीकों को हर जगह पर लागू करना चाहती है। हजारों आदिवासी अपनी खनिज प्रधान जमीनों को पुलिस छावनी में बदलने पर मजबूर हो गए हैं। सैकड़ों गाँवों को जबरदस्ती खाली करा दिया गया है। जिन जमीनों में लौह-अयस्क बहुतायत में है, वहां टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों की गिध्द-दृष्टि लगी हुई है। जमीन देने के समझौता-पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि उनमें क्या कहा गया है, पर भूमि अधिग्रहण शुरू हो गया है। इसी तरह की ञ्टनाएं दुनिया के सबसे ज्यादा उजड़े हुए देशों में से एक कोलंबिया में हो रही हैं, जब सबकी आखें सरकारी समर्थन प्राप्त नागरिक सैनिकों और गुरिल्ला सैनिकों के बीच बढ़ती हुई हिंसा पर लगी है, तो ऐसे समय में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चुपचाप खनिज सम्पदा लूटने में लगी हुई हैं। रंगमंच की ऐसी ही छोटी सी 'स्क्रिप्ट' छत्तीसगढ़ में लिखी जा रही है।
वास्तव में यह दुख की बात है कि 55 पुलिसकर्मी मारे गए; लेकिन वे भी दूसरों की तरह सरकारी नीति के ही शिकार हैं। सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तो मात्र वे एक तोप के गोले के तरह हैं- पुलिसकर्मी तो सत्ता के हथियार मात्र हैं, कुछ मर गये तो सरकारे और भर्ती कर लेंगी। ऐसी मौतों पर मगरमच्छ के ऑंसू बहाए जाएँगे, कुछ समय के लिए टीवी एंकर हमें भी फड़फड़ा देते हैं। होगा क्या? और पुलिसकर्मी आ जाएंगे। जहां तक माओवादियों की बात है- तो उन्होंने जिन पुलिस और 'पुलिस के विशेष अधिकारियों' (एसपीओ) व सरकारी अधिकारियों को मारा; वे सब दमन, यातनाओं, हत्याओं और झूठे मुठभेड़ों के आरोपी थे; गांवों को जलाना और स्त्रियों के साथ बलात्कार करना उनके व्यवसायिक कर्तव्यों में था। चाहे कितना ही दूर तक सोच लीजिए- अगर वे वास्तव में ऐसे हैं- तो वे निर्दोष नागरिक नहीं हैं।
मुझे इनमें कोई संदेह नहीं कि माओवादी आतंक और दमन के एजेंट हैं। मुझे इसमें भी कोई शक नहीं कि उन्होंने भी बेरहमी की होंगी। बेशक वे इस बात का भी दावा नहीं कर सकते कि स्थानीय लोग बिना किसी प्रतिरोध के उनका समर्थन कर रहे हैं- लेकिन यह दावा कौन कर सकता है? फ़िर भी कोई गुरिल्ला सेना बिना स्थानीय समर्थन के टिक भी तो नहीं सकती। यह तार्किक रूप से भी असम्भव है और माओवादियों का समर्थन कम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ रहा है। जनता के पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वह जिसको कम बुरा समझती है, उसकी ओर हो जाती है। पर यह कहना कि नाईसाफी के खिलाफ जो लड़ रहे हैं और जो नाइंसाफी सरकार कर रही है दोनों एक जैसे हैं, तो यह कहना अजीब सी बात है। सरकार ने अहिंसक प्रतिरोध के लिए सभी दरवाजे बंद कर लिये हैं। इस पर जब लोग हथियार उठाते हैं, तो हर प्रकार की हिंसा होने लगती है- क्रांतिकारी, लम्पट और पूरी तरह अपराधी। इससे उत्पन्न हुई भयानक परिस्थितियों के लिए सरकार खुद उत्तरदायी है।

'नक्सली', 'माओवादी' और 'बाहरी लोग' इस तरह के शब्द आजकल बहुत ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। क्या आप इन्हें परिभाषित कर सकती हैं?
'बाहरी ताकतें' इस तरह का दोषारोपण दमन की प्रारंभिक अवस्था में किसी भी सरकार द्वारा किया जाना स्वाभाविक है। किसी भी घटना के लिए सरकारें सहजता से सारा दोष बाहरी ताकतों के सिर मढ़ देती हैं और अपने ही प्रचार पर विश्वास करने लगती हैैं और सरकारें शायद इस बात का अनुमान भी नहीं लगा पातीं कि जनता उसके विरोध में खड़ी हो गई है। यही सब बंगाल में माकपा कर रही है। हालांकि कुछ लोग कहेंगे कि बंगाल में यह दमन नया नहीं है। बस अब केवल बढ़ गया है- फिर भी ये 'बाहरी ताकतें' कौन हैं? सीमाओं का निर्धारण कौन करता है? क्या वे गाँव की सीमाएँ हैं? तहसील? ब्लाक? जिला या राज्य की सीमाएँ हैं? क्या संकीर्ण क्षेत्रीय और धार्मिक राजनीति साम्यवादियों का नया मंत्र है? रही नक्सली और माओवादियों की बात- भारत पुलिस राज्य बनता जा रहा है, जिसमें जो भी व्यवस्था का समर्थन नहीं करेगा, उसे आतंकवादी करार दिए जाने का खतरा उठाना पड़ेगा। मुस्लिम आतंकवादी को मुस्लिम होना जरूरी है- आदि जैसे वर्गीकरण से बचने के लिए उन्हें एक ऐसा नाम चाहिए था, जो सभी को परिभाषित कर दे। इसलिए परिभाषाओं को छोड़ दें, बिना परिभाषा के ही ठीक हैं। क्योंकि वह समय दूर नहीं जब हम सभी को माओवादी या नक्सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादियों का समर्थक कहा जाएगा और फिर जेलों में बंद कर दिया जाएगा, उन लोगों के द्वारा जो वास्तव में या तो जानते नहीं हैं या इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि माओवादी या नक्सली कौन हैं। गांवों में यह कार्यक्रम शुरु हो गया है और हजारों लोगों को जेलों में डाला जा रहा है। उन्हें राज्य को समाप्त करने की कोशिश करने वाले आतंकवादी करार दिया गया है। असली नक्सली और माओवादी कौन हैं? मैं इस विषय की विशेषज्ञ तो नहीं हूँ, लेकिन इनका एक मौलिक इतिहास है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में हुआ था और 1964 में इसका विभाजन हुआ और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी -माकपा इससे अलग हो गई और एक अलग पार्टी बना ली। दोनों ही संसदीय राजनैतिक दल थे। 1967 में माकपा ने कांग्रेस से अलग हुए एक ग्रुप के साथ पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की। उस समय देहात के भूखोें मर रहे किसानों में काफ़ी रोष था। माकपा के स्थानीय नेता कानू सान्याल और चारू मजूमदार ने नक्सलबाड़ी जिले में किसानों को संगठित किया और यहीं से नक्सली शब्द की शुरूआत हुई। 1969 में सरकार गिर गई और सिध्दार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस के हाथ में पुन: सत्ता आ गई। नक्सलियों को निर्दयता से कुचला गया। इस समय के बारे में महाश्वेता देवी ने लिखा भी है। 1969 में माकपा से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (लेनिनवादी-माक्र्सवादी)-'सीपीआई (एमएल)' अलग हो गए। कुछ सालों के बाद 1971 के आसपास सीपीआई(एमएल) कुछ दलों में बँट गई। जैसे बिहार में सीपीआई-एमएल(लिबरेशन), सीपीआई- एमएल(न्यू डिमोक्रसी) जो आंध्र प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में काम कर रही है और सीपीआई-एमएल (वर्गसंघर्ष) जो मुख्य रूप से बंगाल में सक्रिय है। इन दलों को ही नक्सली कहा जाता है। वे अपने को माओवादी नहीं, बल्कि लेनिनवादी माक्र्सवादी के रूप में देखते हैं। वे चुनावों, जनकार्यवाही और हमला होने की स्थिति में सशस्त्र संघर्ष में भी विश्वास करते हैं। बिहार में कार्यरत एमसीसी(माओईस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) का गठन 1968 में हुआ था। आंध्र प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में क्रियाशील पीडब्लूजी(पीपुल्स वार ग्रुप) 1980 में बनी थी और एमसीसी और पीडब्लूजी ने 2004 में ही मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) का गठन किया है। वे राज्य को समाप्त करने और पूर्ण युध्द में विश्वास करते हैं। वे चुनाव में भाग नहीं लेते। यही वह दल हैं, जो बिहार, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में गुरिल्ला युध्द कर रहे हैं।

भारत सरकार और मीडिया माओवादियों को 'आंतरिक सुरक्षा' के लिए बड़े खतरे के रूप में देखते हैं। क्या उन्हें इसी रूप में देखा जाना चाहिए?
मुझे यकीन है कि माओवादी इस परिभाषा से काफी खुश होंगे।

माओवादी व्यवस्था बदलने के मकसद से लड़ रहे हैं। वे माओ की तानाशाही विचारधारा से प्रेरणा लेते हैं। वे क्या विकल्प तय करेंगे? क्या उनके शासन में शोषणकारी निरंकुश हिंसा नहीं होगी? क्या वे पहले से ही आम आदमी का शोषण नहीं कर रहे हैं? क्या वास्तव में उन्हें आम आदमी का समर्थन मिल रहा है?
मुझे लगता है कि हमारे लिए यह बताना जरूरी है कि माओ और स्टालिन दोनों ही हत्याओं के इतिहास के साथ संदिग्ध हीरो हैं। उनके शासन में करोड़ों लोग मारे गए थे। चीन और सोवियत संघ में जो कुछ हुआ, उसके अलावा पोलपोट ने चीनी साम्यवादी दल के समर्थन से कम्बोडिया में दो लाख लोगों को खत्म कर दिया था (इस दौरान पश्चिमी देशों ने जानबूझकर चुप्पी साध रखी थी) और लाखों लोगों को बीमारी और भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था। क्या हम चीन में हुई सांस्कृतिक क्रान्ति की हिंसा से मुंह मोड़ सकते हैं? या इस बात को नकार सकते हैं कि सोवियत संञ् और पूर्वी यूरोप में लाखों लोग लेबर कैंपों और टार्चर-चैम्बरों, जासूसों और गुप्तचरों व पुलिस के शिकार नहीं हुए थे? इनका इतिहास भी पश्चिमी साम्राज्यवाद के इतिहास की तरह अंधकारमय ही है। बस केवल इतना फर्क है कि इसका जीवनकाल बहुत छोटा था। अगर हम तिब्बत और चेचन्या के मुद्दे पर मौन रहते हैं तो हम इराक, फिलीस्तीन, और कश्मीर में हो रही कार्यवाहियों की आलोचना भी नहीं कर सकते। मैं यह उम्मीद करूंगी कि माओवादी, नक्सली और मुख्य वामपंथी अपने इतिहास से सीख लेते हुए अपने इतिहास को दोबारा नहीं दोहराएंगे और भविष्य में जन-विश्वास को कायम रखेंगे। क्योंकि लोग यही उम्मीद करते हैं कि इतिहास दोहराया नहीं जाएगा। लेकिन वे इससे पलटते हैं तो जनता का विश्वास नहीं जीत सकते............फिर भी नेपाल के माओवादियों ने नेपाल के राजतंत्र के खिलाफ़ बहादुरी और सफ़लतापूर्वक सर्ंञ्ष किया है और अब भारत में भी माओवादी और विभिन्न लेनिनवादी-माक्र्सवादी दल अन्याय के खिलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। वे न केवल राज्य बल्कि सामंती जमींदारों और उनके सशस्त्र सैनिकों के खिलाफ़ भी संघर्ष कर रहे हैं। लड़ने वालों में वे आज अकेले ही हैं और इसके लिए मैं उनकी प्रशंसा करती हूँ। ऐसा हो सकता है, जैसा आपने कहा कि जब उनके हाथ में सत्ता आए तो वे क्रूर, अन्यायी और निरंकुश और शायद वर्तमान सरकार से भी बुरे साबित हों। हो सकता है, लेकिन मैं इस सब के बारे में पूर्वधारणा बनाने के लिए तैयार नहीं हूं। अगर वे ऐसे बनते हैं तो हमें उनके खिलाफ़ भी लड़ना होगा और उसके लिए पहला व्यक्ति कोई मेरे जैसा ही होगा। लेकिन अभी तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे प्रतिरोध के मोर्चे पर सबसे आगे खड़े हैं। हममें से कई लोग, उन लोगों के साथ हो लेते हैं, जहां हमें पता है कि यहाँ धार्मिक या वैचारिक रूप से हमारी कोई जगह नहीं है। यह सच है कि सत्ता मिलते ही प्रत्येक स्वाभाविक रूप से बदल जाता है। मंडेला के अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को ही देख लीजिए- भ्रष्ट, पूंजीवादी, आईएमएफ के आगे सिर झुकाने वाली, गरीबों को उनके ञ्र से बेघर करने वाली, लाखों इन्डोनेशियाई साम्यवादियों की हत्या करने वाले सुहार्तो का सम्मान करने वाली (जिसे दक्षिण अफ्रीका के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से नवाजा गया था)। किसने सोचा था कि ऐसा होगा, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि दक्षिण अफ््रीक़ा को रंगभेद के खिलाफ़ सर्ंञ्ष को रोक देना चाहिए था? या फिर इसके लिए उन्हें अब पछताना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि अल्जीरिया को फ्रंासीसी उपनिवेश में बने रहना चाहिए? क्या कश्मीरियों, फिलिस्तीनियों और इराकियों को सैनिक कब्जा को स्वीकार कर लेना चाहिए? जिन लोगों की गरिमा को चोट पहुंची है, क्या उन्हें लड़ाई छोड़ देनी चाहिए? इसलिए कि उन्हें जंग में नेतृत्व करने वाला कोई संत-महात्मा नहीं मिला।

क्या हमारे समाज में आपसी संवाद की भाषा खत्म हो गयी है?
बिल्कुल।

औद्योगिकीकरण-अब कौन सी राह ?

-प्रो. अमित भादुरी

यदि बहुदलीय संसदीय प्रजातंत्र का मतलब जनता को राजनीतिक चयन की स्वतंत्रता देना है, तो फिर भारत में इसके लिए ढेरों छोटी-बड़ी पार्टियां मौजूद हैं। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर शायद ही किसी भी पार्टी के पास कोई नया विकल्प रह गया है। वस्तुत: आज राजनीतिक दलों के पास न तो कोई राजनीतिक एजेन्डा रह गया है, न ही आर्थिक। फिर भी भ्रमित पार्टियां ' आर्थिक वृध्दि', 'औद्योगिकीकरण' और विकास के नारे लगा रही हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर आर्थिक वृध्दि दर बढ़ाने के लिए एक निश्चित प्रकार के औद्योगिकीकरण की जरूरत हो, तो क्या इस औद्योगिकीकरण को विकास का पर्याय माना जा सकता है?
आर्थिक वृध्दि दर बढ़ाने के लिए भारत में इस समय जिस तरह का औद्योगिकीकरण हो रहा है। उसमें नवउदारीकरण की तीन मुख्य विशेषताएं नजर आती हैं। पहली:- इसके पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियां काम कर रही हैं। दूसरी:- ये कंपनियां अधिकांशत: निजी क्षेत्र की हैं। तीसरी:- केन्द्र व राज्य सरकारें नियामक की बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एजेन्ट बन गयी हैं। सभी राजनीतिक दल यथास्थिति से सहमत हैं। इस बात को बार-बार दोहराया जा रहा है। कि ऐसे औद्योगिकीकरण के लिए त्याग की जरूरत है। लेकिन इस सच्चाई को सभी छुपाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह त्याग सिर्फ गरीबों को करना है। अमीरों को तो इसकी कोई जरूरत ही नहीं है, उस पर तुर्रा ये कि उन्हें तो सरकार से सहायता भी दी जा रही है॥ सिंगूर, पश्चिम बंगाल में टाटा को दी जाने वाली अनुमानित सबसिडी 1000 करोड़ रूपये के निवेश पर 850 करोड़ रुपए से भी ज्यादा है। इसी तरह की डील उत्तर प्रदेश के दादरी, महाराष्ट्र के रायगढ़ के सेज के लिए अंबानी बंधुओं के साथ होने की बात सामने आ रही है।
नवउदारीकरण ने आज पारम्परिक राजनैतिक विभिन्नताओं को समाप्त कर दिया है। सिंगूर और नंदीग्राम की घटनाओं ने यह बता दिया है कि वामपंथी दल भी विश्वबैंक, आईएमएफ और एडीबी जैसी संस्थाओं का समर्थन करने वाले केन्द्र में बैठे आर्थिक नीति-निर्माताओं से भिन्न नहीं हैं। राम मंदिर और वंदेमातरम् के झंडावरदार हिंदुत्ववादी भी अंत में विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सामने ही शीश नवा रहे हैं। राजनीति दोगली हो गयी है। 1984 के दंगों के जनसंहार को शायद कांग्रेस भूल गयी है। वामदल गुजरात के 2002 के दंगों को बार-बार उठाते हैं, जिसे भाजपा राज्य सरकार झूठे प्रचार के माध्यम से दबाती है। एक ओर आडवाणी नंदीग्राम में हुए जनसंहार की तुलना जलियाँवाला बाग से करते हैं, तो वामपंथी नेता और समर्थक इसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना का नाम देकर चुप्पी साध लेते हैं। सिंगूर और नंदीग्राम की तरह टाटा को जमीन देने का विरोध कर रहे कलिंगनगर के 13 आदिवासियों पर पुलिस ने बिना चेतावनी के ही गोलियां चला दीं। क्या ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं पर बचाव के लिए कोरे शब्दों का इस्तेमाल करना ठीक होगा कि नवीन पटनायक बुध्ददेव भट्टाचार्य से इसलिए अलग हैं, क्याेंकि वह भिन्न पार्टी से हैं?
उदारीकरण के इस दौर में सभी राजनीतिक दल इस बात पर एकमत हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नेतृत्व और राज्य को एजेन्ट वाली भूमिका का औद्योगिकरण ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन दूसरी ओर देश में सब ओर इस तथाकथित विकास के विरूध्द विद्रोह पनप रहा है। महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्रप्रदेश में किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। क्योंकि सरकार डब्लूटीओ के झंडे तले एक नए प्रकार की व्यवसायिक कृषि लाद रही है, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारी निवेश तो है। लेकिन किसानों के उत्पाद का न तो उचित मूल्य है और न ही कोई सबसिडी। उधर छत्तीसगढ़ में भी सलवा-जुडुम के नेतृत्व में आदिवासियों को उग्रवाद के नाम पर उनके घरों से निकाला जा रहा है। क्योंकि वहां की खनिज संपदा पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी गिध्ददृष्टि लगाए हुए हैं। गरीब आदमी देश की अपार प्राकृतिक संपदा का मालिक है, फिर भी उसके इस अधिकार को नकारा जा रहा है।
संवैधानिक तौर पर भूमि राज्य का विषय होने के बावजूद भी विभिन्न राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कृपापात्र बनने के लिए भूमि कब्जाने की होड़ में लगी हुई हैं और शान से कहती हैं' पश्चिम बंगाल में भले ही न सही हम उत्तरांचल में अपने मकसद् में जरूर कामयाब होंगे' या टाटा, जिंदल या और ऐसी किसी भी कंपनी की खुशामद के लिए हम उड़ीसा से भी ज्यादा भयानक बन सकते हैं।
जमीनें अलग-अलग तरीकों से कब्जाई जा रही हैं, खनन, उद्योगों, विशाल रियासतों, आईटी पार्कों और विदेशी क्षेत्रों- सेज के नाम पर। विदेशी क्षेत्र का उपबंध भूमि के निजी स्वामित्व के अधिकार को जनहित में राज्य के अधिकार में बदल देता है। इसमें भूमि के साथ पानी, खनिज आदि भी शामिल है। एक कृषि प्रधान देश में जहां भूमि ही रोजी-रोटी का मुख्यस्रोत है, जहां किसान के लिए जमीन ण्क सम्पत्ति नहीं बल्कि रोजी है; वहां आम आदमी से जबरदस्ती संसाधन छीनकर निजी कंपनियों को दिए जा रहे हैं। अंग्रेजों के जमाने के पुराने अधिनियम में ही 1984 में कुछ संशोधन करके बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित साधने के लिए गरीब से न केवल निवाला छीना जा रहा है; बल्कि उसे घर से भी बेघर किया जा रहा है। प्राय: ऐसा कहा जाता है कि इस आर्थिक प्रक्रिया में लगातार लाभ प्राप्त करता और खोने वाले होते हैं, जिसे शुम्पीटर ने 'रचनात्मक विनाश' का नाम दिया है। हालांकि वर्तमान संदर्भ में यह एक भ्रमित करने वाला आधा सच है। यदि ऐसा 'रचनात्मक विनाश' पूंजीवादी विकास की आम प्रक्रिया होती तो शायद निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरफ से जनहित के नाम पर राज्य को हस्तक्षेप करने की जरूरत ही न पड़ती। इस लेन-देन में दो निजी पक्ष बहुराष्ट्रीय कंपनी और जमीन का मालिक किसान शामिल है। राज्य का कर्य तो इस लेन-देन को ऐच्छिक बनाने के लिए होना चाहिए। क्योंकि इस सौदे में एक पक्ष यानी किसान आर्थिक रूप से कमजोर है। इसका मतलब होगा कि कंपनियां उस मुल्य पर तमीन खरीदें। जहां किसान स्वेच्छा से उसे बेचने के लिए तैयार हों। उसका निर्णय चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक। आदिवासियों की जमीन के सौदे के लिए तो निर्णय सामूहिक होना चाहिए। लेकिन आज किसानों और कंपनियों के बीच खुली प्रतिस्पर्धा के बजाय राज्य सूचना के अधिकार की परवाह किए बिना हिंसा और दमन से जमीनें कब्जा रहे हैं।
सेज की योजन में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित-साधन ही है। भले ही नंदीग्राम और सिंगूर में कानूनी रूप से टाटा व फिएट के ज्वांइट वेंचर और सलेम ग्रुप के लिए किया गया भूमि अधिग्रहण कानूनी रूप से सही रहा हो, परन्तु उन किसानों के नजरिए से देखा जाए, जो उस जमीन से जीविका पाते थे, तो गलत है। नंदीग्राम की घटना के बाद ज्यादातर राजनीतिक दल, जिसमें वामदल भी शामिल हैं, ने सरकार को यह सलाह दी की कि सभी सेज को खत्म न किया जाए बल्कि उनका अधिकतम भूमि का दायरा सीमित कर दिया जाए। हालांकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को किसानों से छीनकर दिए गये संसाधनों में केवल जमीन ही दिखाई देती है, लेकिन सम्स्याएं तो और भी गहरी हैं। परोक्ष और अपरोक्ष दोनों रूपों से नीतियां गरीबों के खिलाफ बनाई जा रही हैं, योजनाओं में सीधे तौर पर देखा जा सकता है। भारत की 60 फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। परन्तु पिछली जितनी भी पंचवर्षीय योजनाएं थीं, उसमें सरकार ने पाँच फीसदी से अधिक कृषि को नहीं दिया। अपरोक्ष रूप फसल की खपत और पैदावार के प्रति सरकार द्वारा तय नीति में देखा जा सकता है। कई बड़ी परियोजनाएं जैसे मॉल्स, भूमिगत मैट्रो सब जनता के खर्च पर शहरीकरण की अच्छी छवि बनाते हैं। इन सब चीजों को मूलभूत सुविधा मानकर स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि इनसे यात्रा में समय की बचत होती ही है। जीवन स्तर भी बेहतर बनता है। साथ ही निवेश को भी बढ़ावा मिलता है। यह तर्क गलत नही ंतो एकतरफा तो जरूर है। हमें जरूरत तो है, पर शायद ही हम उस ग्रामीण भारत को सुविधाएं और बेहतर बनाने के बारे में सोचते हैं। जहां देश की अधिकांश आबादी रहती है।
महानगरों में हमें मूलभूत सुविधाएं चाहिएं। मैनहटन जैसे शहर हमारा लक्ष्य बना दिए गये हैं। जबकि भारत में 25 से 60 फीसदी जनसंख्या को झोपड़पट्टी में मानवीय जीवन की सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। यह पक्षपात क्यों? इससे किसको लाभ होगा। उस धनाढय शहरी वर्ग को, जो कि शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। जहां रोज बिजली-पानी और जगह की हवस बढ़ती जा रही है। इसलिए बिना पुनर्वास के झोपड़पट्टियां उजाड़ी जा रही हैं। आवागमन के नए साधन जिनके लिए नए फ्लाई ओवर, नए तरह के शॉपिंग व आवासीय काम्पलेक्स को हम बढ़ावा दे रहे हैं, आश्चर्यजनक है! यह सब गहन बिजली खपत करते हैं। जिसका खामियाजा उन लोगों को भी भुगतना पड़ता है, जो इसका उपयोग नहीं करते। इसलिए किसानों को पानी, बिजली, साफ पीने का पानी और शौचालय आदि गाँवों में मयस्सर नहीं है।
यह सोच कि उद्योग कृषि से ज्यादा सक्षम हैं, वास्तव में किसान और गरीब विरोधी हैं। लगभग दो-तिहाई भारत की कामकाजी जनसंख्या कृषि कार्य करती है और राष्ट्रीय आय में मात्र एक चौथाई ही देती है, जबकि उद्योग राष्ट्रीय आय में दुगना देते हैं।
दूसरे तरह के विकास करने वाला आर्थिक विकल्प भी संभव है। जिसके तत्व आज के राजनीतिक-आर्थिक पध्दति में मौजूद हैं, जो तीन बातों पर निर्भर हैं; पहला हमें विदेशी बाजार की बजाए अपने ञ्रेलू बाजार पर विश्वास करना होगा। आम आदमी की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए रोजगार के अवसर को बढ़ाना होगा। कुछ सालों में भारत का रिकॉर्ड इस दिशा में कुछ खास अच्छा नहीं रहा हैं। ऐसा सोचना तो मूर्खता ही होगी कि कंपनियां से रोजगार पैदा हाेंगे क्याेंकि इनको मुनाफा चाहिए, जिसके लिए वह कम से कम लागत में काम करना चाहती है, इसमें श्रम की लागत भी शामिल है। अगर हम भूमण्डलीकरण को बिना शर्त स्वीकार करते हैं, तो बजाए घरेलू बाजार के विदेशी बाजार ही मजबूत होगा, मतलब निर्यात बढ़ाने क लिए श्रम की लागत में कमी होगी, ज्यादा निर्यात का मतलब, यहां की जनता की जरूरत के हिसाब से उत्पादन का नहीं होना है। घरेलू बाजार के विकास के लिए जरूरी है, रोजगाार के अवसर। अत: हमें भूमण्डलीकरण का चुनाव सोच-समझ से करना होगा।
दूसरा, रोजगार की बढ़ोत्तरी से आर्थिक विकास होना चाहिए न कि आर्थिक विकास के लिए रोजगार ही खत्म कर दिए जाएँ। रोजगार रोजगार वृध्दि आर्थिक वृध्दि दर में कितना योगदान देती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी उत्पादकता से श्रम को लगाया जा सकता है। भारत इस क्षेत्र में बहुत पीछे है, जिसके नतीजे अच्छे नहीं हैं। कारण केन्द्रीकृत नौकरशाही, जो स्थानीय स्तर पर लिए गए निर्णयों को खत्म कर देती है। हमें एक नई शुरुआत करनी होगी, सामाजिक रूढ़िवाद और नवउदारवादी नीतियों के मिले-जुले स्वरूप के साथ। एक ओर तो हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चंगुल से बचना है, जिसके लिए हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि को केन्द्रीय बिन्दु बनाना होगा, दूसरी तरफ़ हमें मौजूदा केन्द्रीकृत नौकरशाही को खत्म करना होगा। यह तभी संभव है, जब मौजूदा राष्ट्रीय रोजगार गारन्टी योजना को पूर्ण रोजगार में तब्दील कर पंचायताें तथा स्थानीय लोगों को अधिक से अधिक शक्तियां दी जाएं ताकि वे अपने स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा कर रोजगार दें। इसके लिए जमीन से संबंधित स्थानीय नियंत्रण पंचायतों को अधिकतम आर्थिक स्वायत्तता देना पहली शर्त है। हालांकि संविशान के अनुच्छेद 243 के अनुसार ग्राम्य/वार्ड स्तर के स्थानीय निकायों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने और सहायता देने के लिए 1993 में एक वित्त आयोग की स्थापना की जानी थी। लेकिन न तो केन्द्र और न ही राज्य की सरकारों ने इसे गंभीरता से लिया।
लेकिन न तो केन्द्र की सरकार ने और राज्य की सरकार ने इसे गम्भीरता से लिया। इस मामले में केरल अव्वल रहा तो पश्चिम बंगाल सबसे खराब। गौरतलब है कि वामदल ने नरेगा को पास कराने में अहम भूमिका निभाई, परंतु आश्चर्यजनक बात यह है कि मात्र 14 फीसदी धन का जो कि रोजगार के लिए आबंटित हुआ था, पुरूलिया के लिए प्रयोग में लाया गया। दिसम्बर 2006 तक केन्द्र द्वारा आबंटित आधे से ज्यादा धन खर्च ही नहीं किया गया और न ही 16 दिन से ज्यादा का रोजगार दिया गया; जबकि नियम के हिसाब से 100 दिन का होना चाहिए था। अगर सरकार ने थोड़ा भी अपना ध्यान या थोड़ी भी इच्छाशक्ति रोजगार देने के वादे पर लगाई होती तो भूमि अधिग्रहण के बजाए यह सही विकास की दिशा में पहला कदम होता।
अंत में सवाल आता है कि इन सब के लिए धन कहाँ से आएगा? उसका सही उपयोग किस तरह होगा? वित्त संबंधी जिम्मेदारी और बजट व्यवस्था अधिनियम-2003 ने रोजगार जैसे आवश्यक मामलों में धन खर्च करने के लिए सरकार के हाथ बांधे हुए हैं, इसे खत्म कर देना चाहिए। आर्थिक मदद के नाम पर सरकार अधिनियम की आड़ में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है और मूलभूत सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा में खर्च की कटौती कर वित्तीय अनुशासन के नाम पर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ रही है। इससे तो विश्वबैंक, आईएमएफ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का ही भला हो रहा है। वे तो चाहते ही यही हैं कि राज्य इन्हें बनाए नहीं बल्कि केवल लागू करने की भूमिका करें। वामदलों को इसके विरुध्द कार्य करना चाहिए और आग्रह करना चाहिए कि यह धन प्राथमिक शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य एवं असंगठित मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो कानूनों में बदलाव किया जाना चाहिए। इस नवीन उदारवादी अर्थिक विचारधारा के खिलाफ पहले थोड़ा बहुत हल्ला तो हुआ परंतु अब सबकी उर्जा इसी बहुराष्ट्रीय औद्योगिकरण पर लग रही है।
स्थानीय संस्थानों की स्वायत्तता बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा उनके बजट को अलग से राष्ट्रीय बैंको में भी रखा जा सकता है, जिसमें पंचायतों को भी क्रेडिट लाइन दी जाए, जो कि राष्ट्रीय बैंकों से मिले जिसमें पंचायत भी शामिल हों। इसका यह फ़ायदा होगा कि कोई फ़र्जी संस्थान नहीं चला पाएगा और व्यवस्था द्वारा इन पर निगाह भी रखी जा सकेगी यानी 'नियंत्रण व संतुलन' की व्यवस्था कायम हो सकेगी कि इन्होंने जिन परियोजनाओं के लिए धन लिया था उन पर कार्य किया कि नहीं तभी आगे की परियोजनाओं के लिए धन मिलेगा।
इससे भले ही विकास की गति 8 से 10 फीसदी न हो, परंतु समाज के गरीब तबके का भला होगा और वह सबल और सक्षम बन सकेगा, जिससे भारत की गणतंत्र व्यवस्था मजबूत होगी। हम उम्मीद कर सकते हैं कि कंपनीहीन विकास ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देगा, जो कि मुख्य बिन्दु है, जिससे देश आगे बढ़ेगा।

मुद्दे-स्तम्भकार