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गुजरात का नरेन्द्र मोदी शासन: जहाँ आम आदमी की जिंदगी मोदी- रहमोकरम पर.......

-मीनाक्षी अरोड़ा
सोहराबुद्दीन शेख की हत्या का मामला फिर गरमा गया है। आखिर बौखलाहट में सच्चाई मोदी की जुबान पर आ ही गयी। मोदी ने सोहराबुद्दीन शेख की हत्या को सही ठहराया और कहा कि ऐसे लोगों का यही हस्र होना चाहिए। बौखलाहट की वजह साफ है हिन्दूकार्ड का नहीं चलना। भाजपा बागियों के कारण घिर गये मोदी हिन्दू वोटों को बंटने से रोकने के लिए यह साम्प्रदायिक कार्ड खेला है। वैसे सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ के आरोपपत्र में सीआईडी ने स्पष्ट कहा है कि इन सबने सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर पब्लिसिटी और प्रमोशन पाने के लिए किया था।
क्या है मामला-
सोहराबुद्दीन शेख नामक शख्स को पुलिस अधिकारियों ने लश्कर का आतंकवादी बता फर्जी मुठभेड़ में मौत के घाट उतारा. उज्जैन के पास स्थित गांव झिरनया निवासी सोहराबुद्दीन की मां गांव की सरपंच है. पुलिस पर सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी और दोस्त तुलसीराम प्रजापति की हत्या का भी आरोप है.कटघरे में कौन - गुजरात के डीआइजी डीजी बंजाराए एसपी राजकुमार पांडयन और राजस्थान में अलवर के एसपी एमएन दिनेश. तीनों गिरफ्तार. पुलिस के कुछ और अधिकारियों के नाम सामने आने की संभावना.
फूलप्रूफ प्लानिंग
22 नवंबर 2005 - बस से हैदराबाद से सांगली जा रहे पति-पत्नी सोहराबुद्दीन शेख व कौसर बी और दोस्त तुलसीराम प्रजापति को पुलिस ने बिना अरेस्ट वारेंट के उतार लिया. कौसर बी को उतारने के लिए कोई महिला पुलिसकर्मी नहीं.
24 नवंबर 2005 - गोपनीय पूछताछ के नाम पर एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड इन्हें व्यापारी गिरीश पटेल के गांधीनगर के पास जमियतपुरा स्थित फार्म हाऊस में ले गये.
26 नवंबर 2005 - 25.26 की रात पुलिस सोहराबुद्दीन को अहमदाबाद के पास ले गयी. तीनों अधिकारी पहले से मौजूद. एक कांस्टेबल को एटीएस में रखी हीरो होंडा बाइक लाने को कहा गया. तड़के करीब 4 बजे राजस्थान पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर ने थोड़ी दूर तक बाइक चलायी और चलती बाइक को सड़क पर रपट कर कूद गया. सोहराबुद्दीन को भी कार से निकालकर बाइक के पास फेंका गया. 4 इंस्पेक्टरों ने उसे गोलियों से भून डाला.
28 नवंबर 2005 - कौसर बी की हत्या कर शव को जला दिया गया. सीआइडी के मुताबिक हत्या बंजारा के गांव के पास की गयी.

गुजरात में ही सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी की हत्या की तर्ज पर ही इशरतजहाँ और उसके साथियों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। नरेन्द्र मोदी शासन सुराग तक ढूंढने में नाकाम रहा था। गुजरात में फर्जी मुठभेड़ का तो जैसे पिटारा ही खुल गया है। खाकी वर्दी में साम्प्रदायिक हिंसकों का जैसे एक नया वर्ग पनप रहा है।
जहाँ साम्प्रदायिक नफरत इस कदर पनप रही है कि हिंसको का यह वर्ग शासन पर भी भारी पड़ रहा हो, तो उसके बारे में आप क्या कहेंगे, क्या किसी से न्याय की उम्मीद की जा सकती है, आतंकवादी तो रोज रहस्यमय परिस्थितियों में मारे जाते हैं लेकिन सोहराबुद्दीन शेख और बाद में उसकी पत्नी और एकमात्र चश्मदीद गवाह तुलसीराम प्रजापति जैसे निर्दोष लोगों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या करने के लिये न तो राजनीति के ठेकेदारों की कोई जवाबदेही है, न ही पुलिस प्रशासन की।
गुजरात पुलिस के डायरेक्टर जनरल पी सी पांडे के नापाक कैरियर पर तो जरा गौर कीजिये जिनके सरपरस्त मोदी जी खुद हैं। यह जानते हुए भी कि उनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। उस दौरान शहर के पुलिस चीफ रहे पांडे ने अहमदाबाद को मौत की आग में झोंक दिया। गोधरा रेल हत्याकांड के बाद विश्व हिंदू परिषद् और बजरंग दल ने न केवल पुरुषों और बच्चों की निर्मम हत्याएं की बल्कि स्त्रियों के साथ बलात्कार किए, घरों और दुकानों में लूटपाट की। मिली खबरों और मीडिया ने गृहमंत्री गोरधन जडाफिया, नरेंद्र मोदी, पांडे और उसके पुलिस बल की पोल खोलकर रख दी कि यह हत्याकांड पूर्व नियोजित तरीके से राज्य और सत्ता के ठेकेदारों के संरक्षण में किया गया है। भाजपा-विहिप नेताओं की पुलिस कंट्रोल रूम से सेलफोन पर बातचीत के रिकॉर्ड मौजूद हैं, यहाँ तक कि जडाफिया भी इसमे सीधे तौर पर शामिल थे। खबरों के हिसाब से तो पांडे पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी से मिले और उन्हें पुलिस सुरक्षा का विश्वास भी दिलाया, लेकिन दंगइयों ने अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में बीसियों लोगों को जिंदा जला दिया। जाफरी की पत्नी ने अपने पति और निर्दोष लोगों की बेरहमी से की गई हत्या को अपनी आंखों से देखा और पांडे जी की पुलिस का तो अता-पता भी नहीं था।
दंगों के शिकार लोगों ने नरौडा पटिया में भाजपा-विहिप नेताओं मायाबेन कोडनानी, बाबू बजरंगी और जयदीप पटेल पर खुले तौर पर दंगे भड़काने का आरोप लगाया। अहमदाबाद में युवकों और किशोरियों खासतौर पर मुसलमानों को निशाना बनाकर बजरंगी ने अकेले ही फिल्म परजन्या को रोक दिया जबकि गुजरात पुलिस ने अलग रास्ता अख्तियार किया। भाजपा सांसद बाबूभाई कटारा हाल ही में मानव व्यापार के दोषी पाए गए, इतना ही नहीं उनके बेटे का गुजरात दंगों में हाथ होने का भी सबूत मिला है, तो ऐसे में आरएसएस और भाजपा सत्ता की ठेकेदार कैसे बन सकती है? कैसे गुजरात पुलिस इस रैकेट का भंडाफोड़ करने में नाकाम रही? क्यों पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा?
ऐसे में जहां मोदी की सरपरस्ती में फर्जी मुठभेड़ राज्य का चरित्र बन गया हो वहां सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी जैसे निर्दोष लोग फर्जी मुठभेड़ में मार दिए जायें तो इसमें हैरानी ही क्या हैघ् जहां-जहां मोदी और उसके चेलों ने 'मुसलमानों पाकिस्तान लौटो' का नारा बुलंद किया वहीं अनेक मुसलमानों को आतंकवादी करार देकर फर्जी मुठभेड़ में मौत के घाट उतार दिया गया।
नफरत को एक खूबसूरत जामा पहनाया गया है ठीक वैसे ही जैसे एक आर्किटेक्ट एक शहर का डिजाईन बनाता हैए जिसमें खुद ही राज्य की छत्रछाया में दंगे कराओ, जेल में मुसलमानों को डाल दो, वो भी पोटा के तहत, हत्यारे और बलात्कारी आजाद हवा में सांस लें, महज इसलिए कि वें आपके संघ परिवार के लंगोटिए हैं। उस साम्प्रदायिक पुलिस का क्या- उसे भी आप कोई दंड नहीं देते, हजारों लोगों को आप मजबूर कर देते हैं शरण्ाार्थियों की तरह खुले आसमान के नीचे तम्बुओं में रहने के लिएए इस तरह लाचार लोगों को अपनी ही जमीन से बेघर करके खुद ही आप तानाशाह बन जाते हैंए न्यायालय के दरवाजे बंद कर देते हैं। उन गरीबों, बेघरों की रोजी तक छीनकर, उन्हें समाज से भी अलग-थलग कर देते हैं या फिर 'जाहिरा शेख केस' की तरह रिश्वत देकर शिकायत वापिस लेने की धमकी देते हैं और जर्मन के फासीवादी और इसराइल के यहूदीवादियों की तरह भारतीय मुसलमानों के दिल में एक ऐसा खौफ भर रहे हें कि उन्हें लोकतंत्र, न्याय तो दूर मदद की एक उम्मीद तक आपसे नहीं है। अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रह गए हैं।
इतना ही नहीं खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए भी मोदी के गैर- संवैधानिक तरीकों के खिलाफ़ गूंगी और बहरी बन गई है। मोदी खुद को विकास पुरुष कहते हैं दरअसल उनकी ऑंखें केंद्र पर टिकी हैंए वे तो खुद को भावी प्रधानमंत्री समझते हैं। धर्म निरपेक्षता के नाम पर आप सब कुछ कर सकते हैं; दंगे-फसाद और हिंसा, लेकिन बस विकास का पल्ला पकडे रहिए।
जहाँ राजनीति के ठेकेदार खुद ही धर्मनिर्पेक्षता और लोकतंत्र की धज्ज्ाियां उड़ा दें, पुलिस नौकरशाही और कानून, सब साम्प्रदायिक हो गए हों ऐसे में गुजरात सरकार 'एंटी- टेरारिस्ट स्क्वाड' के आत्मसमर्पण में इतनी नैतिक कैसे हो गई?
'एंटी-टेरारिस्ट स्क्वाड' के हैड डी.जी. वन्जारा, एस. पी. इंटेलिजेंस राजकुमार पंडियान और एम. एन. दिनेश कुमार एस. पी. अलवर राजस्थान को 26 नवम्बर 2005 को हुई सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड़ में की गई हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है तीन अन्यों को भी गिरफ्तार किया गया है जिसमें एक व्यक्ति्त वह है जिसने जांच अधिकारी गीता चौधरी को ग्राफ़िक डिटेल दिए थे। वन्जारा को मोदी का आदमी बताया गया था। खैर इस सबसे यह तो साफ़ है कि इन दंगों के पीछे मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का हाथ है। भाजपा विरोधी नलिन भट्ट ने भी वन्जारा द्वारा अंजाम दी गई इस रहस्यमय मुठभेड़ों की सी.बी.आई. जाँच की माँग की है। सब इस बात को जानते हैं कि वन्जारा तो मात्र एक कठपुतली था। इशरत जहां, समीर पठान और अन्य लोगों की हत्या के मामले एक बार फ़िर उठाए जा रहे हैं, अगर इस बार गुजरात पुलिस मोदी को हत्यारा साबित करने में नाकाम रहती हैं तो मोदी और उसकी राजनीतिक ठेकेदार और पुलिस को कुछ भी कर के साफ़ बच निकलने का आसान रास्ता मिल जाएगा।
सी.आई.डी.(क्राइम) आईजी. गीता चौधरी की रिपोर्ट कि सोहराबुद्दीन शेख की हत्या का मामला फ़र्जी मुठभेड़ का मामला है, के बाद गिरफ्तारी का निर्णय लिया गया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उन्होने जाँच की और दिसंबर 2006 में अपनी रिपोर्ट दे दी थी तो फ़िर राज्य सरकार इतने समय तक चुप क्यों रही? क्यों और कैसे इस जाँच को गीता चौधरी के हाथ से लेकर किसी दूसरे अफसर को दे दिया गया? सच तो यह है कि गुजरात पुलिस में आज ईमानदार पुलिस अफसर का गला घोंटा जा रहा है। उनके लिए वहां कोई जगह नहीं है। 2002 के दंगों में कुछ पुलिस अफ़सर और प्रशासनिक अधिकारीए हिंदुत्ववादियों को दंगा भड़काने से रोकना चाहते थे, लेकिन मोदी ने इस पर गौर नहीं किया। दंगों के बाद श्रीकुमार ने मोदी के खिलाफ़ आवाज उठाई लेकिन उसे और उसके जैसे अनेक अफ़सरों को दंगों के दौरान और बाद में भाजपा सरकार और हिंदुत्ववादी झंडेबरदारों का कोपभाजक बनना पड़ा।
मुख्यमंत्री और गृहमंत्री का फ़र्जी मुठभेड़ में हाथ होने की पोल खुलने के डर से गुजरात पुलिस सी.बी.आई. जाँच का विरोध कर रही है।

कौसर बी के साथ बलात्कार, फिर हत्या -
इस बात के पुख्ता सबूत मिल रहे हैं कि शेख की पत्नी कौसर बी के साथ बलात्कार करके हत्या की गई। उसे गाँधीनगर के पास एक फार्म हाउस पर ले जाया गया और 26 नवम्बर 2006 शेख की हत्या करने के बाद 28 नवंबर को मार दिया गया। उसकी लाश को वन्जारा के गांव इलोल, हिम्मतनगर लाने के बाद जला दिया गया। एक सिपाही ने यह सब अपनी ऑंखों से देखा और बताया कि कैसे बलात्कार के बाद वह बीमार हो गई इसलिए उसे जला दिया गया। यहाँ तक कि चश्मदीद सिपाही की भी हत्या कर दी गई।
अपहरण, हत्या बलात्कार के इस दहलाने वाले मंजर को पुलिस के आला अफ़सरों, सिपाहियों ने मिलकर अंजाम दिया। कितने दिन और रात गैर- कानूनी साधन जुटाए, वाहन किराय के लिए गए और फ़ार्म हाउस एक भाजपा नेता का था और ऐसे में मजेदार बात तो यह है कि मोदी शासन, उसकी पुलिस और नौकरशाही के हाथ कोई सुराग तक नहीं है।
शेख के बारे में भी कुछ अफ़वाहें सुनने में आ रही हैं कि उसे इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह उनके अंदर के बहुत से राज जानता था। वह खुद भी सीडी साजिश में शामिल था और उसके परिवार के राजस्थान में भाजपा से सम्बंध्द थेए उसकी माँ गाँव की सरपंच थी और परिवार मारबल का व्यापार करता था लेकिन व्यापार छिन जाने के बाद वह संकट में आ गया वगैरह....... लेकिन इन सब कहानियों को सच नहीं माना जा सकता। सी. आई. ड़ी. गीता चौधरी की रिपोर्ट और गुजरात पुलिस व सरकार के हस्तक्षेप के बिना उचित सी. बी. आई. जाँच के बाद निश्चित रूप से इन रहस्यमयी हत्याओं का पर्दाफ़ाश होगा। इतना ही नहीं और भी बहुत सी फ़र्जी हत्याओं के रहस्य से पर्दा उठेगा।जरा मुम्बरा की इशरत जहां और अहमदाबाद में तीन फिदायीन आतंकवादियों की जून 15ए 2004 को हुई निर्मम हत्या को याद कीजिए। जिसके बारे में कहा गया कि वें मोदी की हत्या के मिशन पर आए थे। 'नेशनल सिविल लिबर्टीज' की टीम में अपने अध्ययन में पाया कि पुलिस के बयान के मुताबिक केवल एक आतंकवादी भागा था। उन चारों के पास से केवल एक एके-56 और दो पिस्तौलें बरामद हुईए 20 पुलिस कर्मियों के दो दलए जो एके-47 और रिवॉल्वरों से लैस थे। कार को घेरने के बावजूद भी विपक्षी दल पर कमजोर पड़ गई। इस बात से पुलिस की नीयत पर सीधा शक जाता है कि वे उनकी हत्या के इरादतन वहाँ गई थी.........
अगर पुलिस की इस बात को माने कि आतंकवादियों ने बयालिस बार गोली चलाई तो एक भी पुलिस कर्मी के बदन पर गोली का निशान तक क्यों नहीं पाया गया? इस बात का सबूत न होने से उनके इस झूठ को सच नहीं माना जा सकता कि उन्होंने अपने बचाव में गोलियां चलाईं थीं.....

मोदी की स्वीकारोक्ति से उठे सवाल
मोदी की स्वीकारोक्ति के बाद क्यों सोहराबुद्दीन शेख हत्या के मामले में मोदी को आरोपी नहीं बनाया जा रहा है? जबकि सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी के बारे में सुप्रीम कोर्ट में दिया गया गुजरात सरकार का यह बयान कि ये दोनों एनकाउंटर में नहीं मारे गये थे। बल्कि पुलिस ने सोच-समझ कर उनकी हत्या की थी। किसी सरकार द्वारा की गयी एक महत्वपूर्ण और शर्मनाक स्वीकारोक्ति है. पर देखने की बात यह है कि इस स्वीकारोक्ति से देश का आम आदमी चौंका नहीं है. जाहिर है कि इस तरह के एनकाउंटर आम बात हो चुके हैं। 2003 से लेकर 2006 के बीच नरेंद्र मोदी के शासनकाल में कम से कम 27 एनकाउंटर हो चुके हैं. यह कहना तो कठिन है कि इनमें से कितने सचमुच एनकाउंटर थे और कितने फर्जी लेकिन यह इस बात का सबूत तो हैं ही कि कथित अपराधियों के खात्मे का यह तरीका प्रशासन को रास आता है.

गुजरात में भी एंटी टेररिज्म स्क्वाड के मुखिया डीजी बंजारा की मोदी सरकार कई बार पीठ थपथपा चुकी है. इन्हीं के निर्देशन में सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी की हत्या की योजना क्रियान्वित हुई थी. तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी और अब गुजरात सरकार द्वारा गिरफ्तारी को अंजाम देनेवाले अफसर के पर कुतरने की कार्रवाई इस बात का प्रमाण है कि पुलिस यह काम सरकारी समर्थन (या शह) के बिना नहीं कर सकती थी. बात सिर्फ पुलिस तक ही सीमित नहीं हैं। गुजरात तक ही नहीं. हम देख चुके हैं कि कश्मीर और असम में कैसे सेना आतंकवादी बता कर निर्दोषों का एनकाउंटर कर चुकी है. अक्सर इस अवैध और अमानुषिक कारवाई के शिकार बेगुनाह होते हैं. गुजरात का यह मामला नवीनतम उदाहरण है. हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार के दबाव में भाजपा नेता वीके मल्होत्रा कह रहे हैं कि सोहराबुद्दीन जैसे व्यक्ति को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए। वह भयादोहन जैसी गतिविधियों में लिप्त था। लेकिन इस सच को कैसे नकारा जाये कि सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी न आतंकवादी थे, न लश्कर-ए-तोएबा के लिए काम करते थे और न ही गुजरात के मुख्यमंत्री को मारने की साजिश कर रहे थे।

सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी की हत्या की तर्ज पर ही इशरत जहाँ और उसके साथियों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया। क्या और लोग भी इसी तरह अतिरिक्त न्यायिक कार्यवाही के नाम पर मौत के घाट उतार दिए जाएँगे? क्यों आतंकवादी हमेशा मार दिए जाते हैं? पकड़े क्यों नहीं जाते? जिससे उनके सरपरस्तों का भंडाफोड़ कर औरों को बचाया जा सके। सिपाहियों को गम्भीर चोटें क्यों नहीं लगती, ऐसा क्यों होता है कि उनमें से ज्यादातर या तो मोदी की हत्या के लिए मिशन पर होते हैं या पाकिस्तानी इस्लामी ग्रुप से जुड़े होते हैं? एक ही तरह के मुठभेड़ में हर बार वही सिपाही क्यों शामिल होता है ? क्या ऐसी मुठभेड़ों के तरीके एकतरफा नहीं हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि मुख्यमंत्री से लेकर गृहमंत्री आदि इंटेलिजेंस, पुलिस और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं है? क्या कभी सच बाहर आएगा? क्या न्याय की जीत होगी? या फिर वंजारा के गांव में जलाई गई कौसरबी की लाश की राख में सबूतों की तरह यह भी भारतीय लोकतंत्र के प्यासे कुंए में दफ़न हो जाएगा?

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सोहराबुद्दीन मामले से प्रकाश में आये डीआइजी डीजी बंजारा की संपत्ति तो लगभग 150 करोड़ बतायी जा रही है, जिसमें होटल, बंगला और भूमि है. फर्जी मुठभेड़ से ऐसे पुलिसवालों की कमायी का अंदाजा लगाना इतना आसान भी नहीं है. जमीन-जायदाद के मामले को सुलझान में ही कमाई लाखों में हो जाती है. एक अनुमान के मुताबिक फर्जी मुठभेड़ में एक पुलिसवाले की सलाना कमाई 2 से 5 करोड़ रुपये तक हो जाती है. अब सवाल यह उठता है कि जब इतना सबकुछ पता है तो ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जाती है, जवाब भी सीधा है कि ऐसे लोगों के उपर राजनेताओं का हाथ होता है, जो ऐसे पुलिसवावलों का उपयोग अपने सत्ता संचालन में करते हैं.
सवाल यह उठता है कि ऐसे में पुलिस फोर्स को अपराध से लड़ने के लिए किस प्रकार का और कैसे अधिकार दिये जाने चाहिए और उसका उपयोग किस प्रकार से करें कि इसका गलत उपयोग न हो सके. इसके लिए पुलिस प्रशासन को एक दिशा निर्देश की जरूरत है, जिसमें हर एक एनकाउंटर के बाद उसकी पुलिस विभाग द्वारा ही जांच की जानी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस केस की सच्चाई सामने आ रही है. ऐसे में दिल्ली और मुंबई सहित पूरे देश में हो रहे एनकाउंटर शक के दायरे में आ गये हैं. प्रकाश में आये ज्यादातर पुलिसवालों की संपत्ति लाखों में नहीं करोड़ों में देखी गयी है. एक लेखक के रूप में कैरियर की शुरुआत करने के बाद पुलिस फोर्स ज्वाइन करनेवाले दया नायक की संपत्ति का अनुमान एंटी करप्शन ब्यरो ने लगभग 9 करोड़ आंकी है. एक सब इंस्पेक्टर जिसकी सैलरी 12 हजार रुपये है, को दुबई के एक होटल का पार्टनर बना पाया गया है और कर्नाटक में 1 करोड़ की लागत से स्कूल भी है, जिसका उदघाटन सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने किया था. ऐसा नहीं है कि ऐसे केस सिर्फ मुंबई में ही हुए है. देश के अन्य शहरों में भी इस तरह की घटनाएं आम है.

जब तक न्यायिक प्रक्रिया को आसान और आम आदमी के पहुंच के लिहाज से नहीं बनाया जायेगा, तब तक सही न्याय नहीं मिलेगा.
प्रशांत भूषण (वरिष्ठ अधिवक्ता)
आये दिन पुलिस द्वारा किये गये फर्जी मुठभेड़ की खबर सुनने को मिलती है, लेकिन अजीब विडंबना है कि ऐसे मामलों में दोषी पुलिसवालों को दंड कम ही मिल पाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह हमारे सिस्टम में व्याप्त खामियां हैं. फर्जी मुठभेड़ की खबर जब सामने आती है, तब कोई जांच कमेटी या साधारण जांच गठित कर दी जाती है. लेकिन इसका निष्कर्ष सही दिशा में नहीं निकल पाता. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है जांच में पुलिसवालों का शामिल होना. निश्चित रूप से एकसाथ काम कर रहे पुलिसवालों को आपस में सांठ-गांठ बनी ही रहती है. यह बात स्पष्ट रूप से जांच में सामने आता है. गुजरात, कश्मीर, उत्तर पूर्वी राज्यों आदि में फर्जी मुठभेड़ की घटनाएं अक्सर सुनने में आती है. ऐसे मामलों में सभी की सामूहिक जवाबदेही तय होनी चाहिए. राजनीतिक पार्टियां भी अपने हित के लिए पुलिस का इस्तेमाल करती है और फर्जी एनकाउंटर करवाया जाता है.
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इराकी शासन में फैला भ्रष्टाचार: अमरीका उलझा

इराकी शासन में फैला भ्रष्टाचार, इराक में अमेरिका की कारगुजारियों पर पानी फेर रहा है, जब से ही अमेरिकी कांग्रेस ने जनरल डेविड पेट्रायस और अमरीकी राजदूत रेयान क्रोकर से इराक के बारे में रिपोर्ट लाने और इराकी युध्द के लिए जार्ज डब्ल्यू बुश की 50 बिलियन डालर की मांग पर संसदीय बहस की तैयारी की, तभी से इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल- मालिकी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज विवादों के केन्द्र में आ गए हैं। बगदाद के अमरीकी दूतावास द्वारा तैयार किए गए एक गुप्त-मसौदे के अनुसार मालिकी सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बुरी तरह फेल हुई है। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि मालिकी शासन ''भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को आंशिक रूप से भी लागू कर पाने में असमर्थ'' रहा है और रिपोर्ट में जो सबसे बुरी बात है कि 'मालिकी कार्यालय स्वयं ही शासन में भ्रष्टाचार, जालसाजी और अपराधों की जांच में अड़चनें पैदा कर रहा है।' . . . . . . . . . पूरा पढें

जेंडर मेंटर किट: बेटी तुम्हें मारने का एक और नया तरीका

मीनाक्षी अरोड़ा
कन्या-भ्रूणहत्या रोकने की हालिया कोशिशें: एक: भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी कहती हैं कि हम हर जिले में अनैच्छिक बेटियों के लिए कन्या-क्रच खोलेंगे, जो लोग बेटी पालना नहीं चाहते वे वहां अपनी बेटी छोड़ दें, ताकि बेटा-बेटी अनुपात संतुलित किया जा सके और कन्या-भ्रूणहत्या रोकी जा सके। दो: कन्या-भ्रूणहत्या रोकने के लिए मदुरै के पुलिस आयुक्त ए.सुब्रह्मण्यम स्वास्थ्य, राजस्व, समाज कल्याण विभाग और पुलिस को मिलाकर एक मिली-जुली एक्शन-टीम बनाई है, जो कन्या-भ्रूणहत्या को रोकने का काम करेगी।
तीन: केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की चेयरमैन रजनी पाटिल कहती हैं कि हम सभी राज्य सरकारों को कन्या-भ्रूणहत्या के खिलाफ़ स्टिंग-ऑपरेशन ग्रुप बनाने के लिए कह रहे हैं, जिसमें एनजीओ और खुफिया विभाग को जरूर शामिल किया जाए।
चार: गुजरात के मुख्यमंत्री ने 'बेटी बचाओ अभियान' चला रखा है और उनके स्वास्थ्यमंत्री अशोक भट्ट के चुनावक्षेत्र में हिन्दुस्तान का सबसे कम सेक्स-अनुपात है, 1000 पुरुष पर मात्र 767 महिलाएं।
पांच: चंडीगढ़ का एक गैर-सरकारी संगठन 'वीमेन पावर कनेक्ट' चंडीगढ़ स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर निजी क्लीनिक से निकालने वाले बायो-मेडिकल कचरे को चेक करेगा और सुनिश्चित करेगा कि कहीं उस कचरे में कोई कन्या-भ्रूण तो नहीं है।
और भी कोशिशें जारी हैं कन्या-भ्रूणहत्या और कन्या-भ्रूण पहचान की प्रक्रिया रोकने की। रैलियां, कन्या-दिवस मनाने, बालिका शिशु वर्ष, विज्ञापन, बेटियों के लिए लाडली, योजना, नकद प्रोत्साहन और केन्द्र और राज्यों की सैकड़ों योजनाएं; पर जारी है, कन्या-भ्रूणहत्या।

देश के लिए शर्मनाक
देश के लिए शर्मनाक ही है कि कन्या-भ्रूणहत्या प्रतिवर्ष 9 फीसदी की दर से लगातार बढ़ रही है। पिछले दो दशकों में एक करोड़ से ज्यादा कन्या-भ्रूणहत्या की गयी है। तमिलनाडु के सबू जॉर्ज, जो पिछले बीस सालों से इस मसले पर अध्ययन कर रहे हैं, का कहना है कि बेटी-क्रच खोलने जैसी योजनाओं का सीधा मतलब है कि हम कन्या-भ्रूणहत्या रोकने में असफल रहे हैं, क्योंकि बेटियां पैदा होने के बाद कम और गर्भ में ज्यादा मारी जाती हैं। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की चेयरमैन रजनी पाटिल स्वीकार करती हैं कि तेरह साल हो गए 'प्री-नेटल डाइग्नोस्टिक टेक्नोलाजी एक्ट'-1993 और 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑव प्रेगनेन्सी एक्ट' दोनों के तहत अब तक 4,000 मुकदमे दर्ज हुए हैं, पर सजा सिर्फ़ एक डॉक्टर को हुई है।
मुकदमा दर्ज कराने की जिम्मेदारी मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारियों की होती है, पर प्राय: उनके संबंध प्राइवेट क्लिनिक और डाइग्नोस्टिक सेंटर से हुआ करते हैं। इसलिए कन्या-भ्रूणहत्या कराने वाले क्लिनिक तथा अन्य लोगों के खिलाफ़ मुकदमे ही नहीं दर्ज हो रहे हैं। प्राइवेट क्लिनिक और डाइग्नोस्टिक सेंटर कन्या-भ्रूण पहचान और कन्या-भ्रूणहत्या के रोज नए-नए तरीके अपना रहे हैं। अभी तक यह सारा काम लोकल स्तर पर ही होता था, पर अब उनके साथ बड़ी-बड़ी कंपनियां जुट गयी हैं। अमेरिका की 'लॉवेल लैब' 'ममीज़ थिंकिन कंपनी' आदि ने 'जेंडर मेंटर किट' कन्या-भ्रूण पहचान का एक नया तरीका उपलब्ध कराया है, जिससे कन्या-भ्रूण की पहचान मात्र 5 हफ्ते के अंदर ही हो जाती है, यानी बेटी मारना और आसान.......।
दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब; पंजाब में तो 'जेंडर मेंटर किट' का क्रेज लोगों में इस कदर बढ़ रहा है कि देहात के लोग तो इसे 'जन्तर-मन्तर किट' ही कहने लगे हैं। मानो कि यह अनचाहे लिंग के भ्रूण से छुटकारा पाने का सबसे सुरक्षित मन्त्र हो। अल्ट्रासाउण्ड से लिंग का पता ऐसे स्टेज पर लगता है जहां 'अबॉर्शन' कराना खतरनाक हो जाता है, लेकिन 'जन्तर-मन्तर किट' से शुरूआती दौर में ही पता लग जाता है। इसलिए 'जेंडर मेंटर किट' का बाजार गर्माता जा रहा है। पंजाब मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष कुलदीप सिंह का कहना है ''अगर भारतीय बाजारों में यह किट चलता रहा तो बालिका भ्रूण-हत्याओं का सिलसिला और भी तेज होगा।''
गर्भाधान के दौरान लिंग परीक्षण ही मुख्य उत्तरदायी है, कन्या-भ्रूणहत्या का। तरह -तरह के परीक्षण होते हैं- गर्भाधान के दौरान लिंग जानने के लिए। यानी जन्म लेने वाला प्राणी लड़का होगा या लड़की, आप पहले ही जान सकते हैं। लड़का पाने की लालसा फिर कन्या-भ्रूण की मौत कराती है। वैसे इसे वैज्ञानिक तकनीक का एक नया करिश्मा कहें या अभिशाप? दिन-ब-दिन बढ़ते विज्ञान और तकनीकी ने जहां जीवन को सरल और सुविधासम्पन्न बनाया है, वहीं यह उतना ही ज्यादा जटिल और घातक बन रहा है।
इसी वैज्ञानिक तकनीक की एक नई ईजाद है 'जेंडर मेंटर किट- एक ऐसा 'ब्लड टेस्ट' जो गर्भवती स्त्रियों को गर्भाधान के प्रारम्भिक पांच सप्ताह के भीतर यह बता सकता है कि उनका जन्म लेने वाला बच्चा लड़का होगा या लड़की। 'लॉवेल लैब' में 'ब्लड टेस्ट' देने के बाद दो या तीन दिन के भीतर ही स्त्रियों को यह रिपोर्ट मिल जाती है। उसके बाद उन्हें देर नहीं लगती यह तय करने में कि उन्हें लड़की चाहिए या लड़का।
इस मौत के खेल को खेलने के लिए ऑनलाइन मार्केटिंग और लच्छेदार भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस खेल के लिए आवश्यक 'ब्लड टेस्ट' का ही व्यापारिक नाम 'बेबी जेंडर मेंटर' है जो अमरीका के मेसाच्यूसेट्स में लॉवेल की बायोटेक कंपनी- एक्यूजेन बायोलैब द्वारा खेला जा रहा है। एक ऐसी मानसिकता तैयार की जा रही है कि हर आदमी को यह महसूस होने लगे कि यह टेस्ट जरूरी है। इसके लिए अनेक तर्कों का सहारा लिया जा रहा है, जैसे- बच्चे के जन्म से पहले मां का मानसिक रूप से खुद को तैयार करना जरूरी है।
लड़का और लड़की के लिए आवश्यक खरीददारी, तैयारी और योजना बनाने के लिए, उसके लिंग के बारे में पहले से मालूम होना जरूरी है। इसी तरह कुछ बीमारियों आदि के तर्कों का इस्तेमाल कर भ्रामक प्रचार किए जा रहे हैं। इस टेस्ट किट की कीमत मात्र 25 अमरीकी डालर है और कंपनियों का दावा है कि यह किट दुनिया के किसी भी कोने में 24 घंटे के अंदर कहीं भी ऑनलाइन डिमांड पर उपलब्ध कराया जा सकता है। टेस्ट के लिए तैयार गर्भवती महिला की अंगुली से कुछ खून निकालकर टेस्ट किट में मौजूद कार्ड पर लगा दिया जाता है। फिर उसे एक्यूजेन लैब, अमेरिका भेज दिया जाता है, जहां 250 अमरीकी डालर अतिरिक्त फीस देनी होती है। उसके बाद टेस्ट का परिणाम 'पासवर्ड सिक्योरिटी' के साथ वेबसाइट पर डाल दिया जाता है।
'फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन' की टेस्ट को नियमित करने में कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि यह टेस्ट 'नॉन-मेडिकल' की श्रेणी में आता है और इसे किसी भी 'चिकित्सकीय इलाज' के नाम पर रोका नहीं जा सकता। इस तरह एफडीए के नियमों के अधीन न होने की वजह से 'बेबी जेंडर मेंटर टेस्ट' के रास्ते में 'फर्मास्यूटिकल' सम्बन्धी कोई बाधा नहीं है। इतना ही नहीं ये 'लैब' अपने ग्राहकों पर किए गए परीक्षणों का परिणाम बताने या न बताने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
कंपनी इस बात को स्वीकार करती है कि लैब की रिपोर्ट आने पर वे चार सम्भावित परिणाम बता सकते हैं- लड़का, लड़की, जुड़वां या कुछ नहीं। कंपनी टेस्ट के परिणाम 99.9 फीसदी सही होने का दावा करती है। पर बेलर कॉलेज ऑव मेडिसिन की प्रोफेसर सैंड्रा कार्सन का भी कहना है कि, ''जब तक एक्यूजेन अपना डाटा नहीं देती, तब तक टेस्ट की विश्वसनीयता नहीं आंकी जा सकती है। इसलिए तब तक के लिए इसे बाजार में नहीं उतारा जाना चाहिए।''
जबकि इसके ठीक विपरीत टेस्ट की मार्केटिंग करने वाली एक वेबसाइट ऐसी महिलाओं के सर्टिफिकेट दिखाती है, जिनको टेस्ट की सही रिपोर्ट दी गई। ' प्रेगनेंसी स्टोर डॉट कॉम' स्वयं को इसका सबसे बड़ा रिटेलर-डिस्ट्रीब्यूटर कहता है। इसकी सीईओ शेरी बोनेली कंपनी के पक्ष में तर्क देती हैं कि टेस्ट लैब के परीक्षणों पर जो वैज्ञानिक उंगली उठा रहे हैं वास्तव में वे सब इससे ईष्या करते हैं। उनके पास कंपनी के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं है।
खैर, यह एक अलग मुद्दा है कि कंपनी कितने सही परिणाम देती है। फिलहाल तो यह टेस्ट कन्या-भ्रूण पहचान और कन्या-भ्रूणहत्या को बढ़ावा दे रहा है। टेस्ट कराने के पीछे यूं तो तमाम तर्क दिए जा सकते हैं। महिलाएं यह टेस्ट क्यों करा रही हैं इसका सही आंकलन कर पाना भी कठिन है। लेकिन एनपीआर की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे मकसद सिर्फ भ्रूण हत्या का है। इसलिए बच्चे के जन्म से पहले ही लिंग जानने की कोशिश की जाती है।
जेनेटिक काउन्सलर डॉ. अनालिया बोर्ज का भी यही मानना है कि परीक्षणों का मकसद 'भ्रूण-हत्या' ही है, क्योंकि अगर माता-पिता को गर्भ में पल रहे भ्रूण से भिन्न लिंग चाहिए तो जल्दी ही 'अबॉर्शन' कराना महिलाओं के लिए सही होता है। देर से कराने पर खतरा बढ़ सकता है, इसलिए टेस्ट द्वारा प्रारम्भिक स्तर पर ही लिंग जानने की कवायद की जाती है। और इसी कारण से यह टेस्ट समाज के लिए विनाशक बन गया है।
पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के सेण्टर फॉर बायो इथिक्स के डायरेक्टर आर्थर कापलान ने बताया कि लिंग जानने का काम केवल अमरीका में ही नहीं, बल्कि भारत और चीन जैसे देशों में खूब धड़ल्ले से किया जा रहा है, क्योंकि यहां लड़की की बजाय लड़कों की चाह माता-पिता को ज्यादा रहती है। भारत में 2001 की जनगणना के आंकड़े देखने से पता चलता है कि यहां 1,000 लड़कों पर 818 लड़कियां हैं। जहां-जहां लिंग जानने के लिए टेस्ट का बाजार गर्म है, वहां तो यह असंतुलन और भी ज्यादा है। नई दिल्ली के एक क्षेत्र विशेष के अध्ययन के बाद 1,000 लड़कों पर 762 लड़कियां होने के तथ्य का खुलासा हुआ। बात करने पर पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री रमेशचन्द्र डोगरा कहते हैं कि वह भारत में इस टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने के लिए जल्दी ही कुछ करेंगे।

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