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''विश्व बैंक'' की खुली थैली। शर्त शर्त पर शर्त विषैली । - शिराज केसर

“विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण”
लोगों ने कहा ''विश्व बैंक'' की खुली थैली। शर्त शर्त पर शर्त विषैली।
वक्ताओं ने कहा 'विश्वबैंक के कर्मचारी ही परोक्ष रूप से भारत सरकार की नीतियां बना रहे हैं'

21-24 सितम्बर 2007 को सैकड़ों लोग 'विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' के लिए इकट्ठा हुए। 4 दिन के इस सत्र में दुनिया की सर्वाधिक शक्तिशाली संस्थाओं में से एक विश्वबैंक के खिलाफ अपने जीवन के हर क्षेत्र की शिकायतें दर्जनों न्यायधीशों के सामने रखा। गरीबों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और अन्य वंचित लोगों के अनुभवों और साक्ष्यों को उजागर करता हुआ यह न्यायाधिकरण विश्वबैंक के; आर्थिक और सामाजिक नीति के ज्ञान के) साधनों के खिलाफ सीधा संघर्ष है। उन्होंने विश्वबैंक की नीतियों के बारे में बताया, जिनके खेत, जंगल और घर छीन लिये गये हैं। उनकी बचत को खत्म कर दिया गया है, उनका स्वास्थ्य तक खराब कर दिया गया है, उनके परिवारों को तोड़ दिया गया है, उनसे पीने का पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा को छीन लिया गया है और उन्हें स्थानीय सूदखोरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ संघर्ष के अखाड़े में ला दिया है। उनकी व्यक्तिगत और सामूहिक कहानियां एक दूसरी ही सच्चाई बयां कर रही थीं 'विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' में। नई दिल्ली में, वे गरीब जिनके नाम पर विकास का तमाशा किया जा रहा है उनकी आवाज ने यही कहा ''विश्व बैंक'' की खुली थैली। शर्त शर्त पर शर्त विषैली । .............

विकास या विकास का आतंक -अमित भादुरी

चरम विकास के इस दौर में यह कोई चौंकाने वाला तथ्य नहीं है कि भारत के अंदर दो भारत हैं। एक वह भारत है जहां बड़ी-बड़ी इमारतें, शानो-शौकत, चमचमाते शॉपिंग माल्स और उच्च तकनीक से बने गगनचुम्बी पुल, जिन पर नजर आती हैं दूर तक, दौड़ती हुई नई-नई आधुनिक गाड़ियां। यह उस वैश्विक भारत की तस्वीर है जो प्रथम विश्व यानी विकसित विश्व के प्रवेश द्वार पर खड़ा है। दूसरा है दीन-हीन भारत, जहां नजर आते हैं निसहाय किसान, जो विवश हैं आत्महत्या करने के लिए, अवैधानिक रूप से मरते हुए दलित, अपनी ही कृषि भूमि और जीविका से बेदखल की हुई जनजातियां, चमचमाते शहरों की गलियों में भीख मांगते छोटे-छोटे बच्चे। इस दूसरे भारत के दीन-हीन व्यक्ति के विद्रोह के स्वर से आज देश के लगभग 607 में से 120-160 जिलों में उग्र नक्सलवादी ........

राष्ट्रीय नीतियों पर विश्वबैंक का दुष्प्रभाव : स्वतंत्र न्यायाधिकरण का फैसला

न्यायाधिकरण में नहीं पहुंचे विश्व बैंक के अधिकारी
नई दिल्ली।(पीएनएन) विश्व बैंक के कार्यों पर हो रहे चार दिवसीय 'स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण में चौथे दिन न्यायाधीशों ने अपना फैसला सुनाया। न्यायाधिकरण में भारत में बैंक की नीतियों और बढ़ते हस्तक्षेप को लेकर कई आरोप लगाए गए। हालांकि विश्व बैंक के भारतीय कार्यालय ने स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण में शामिल होने का दावा किया था और यह भी कहा था कि वे बैंक के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे, लेकिन पर्याप्त समय और स्थान दिए जाने के बावजूद भी वे अपने दावे को सिध्द करने के लिए नहीं पहुंचे।

विश्वबैंक के चाकरी कर रहे सरकारी भारतीय अफसरों के सपनों का भारत- आलोक मेहता

भारी होती जेब के साथ फटती कमीज
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्स के अनुसार वैश्वीकरण से अमेरिका सहित कई राष्ट्र अधिक संपन्न हो रहे हैं लेकिन उनकी जनता गरीब हो रही है। उनका मानना है कि वैश्वीकरण की प्रतियोगिता श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए नुकसानदेह साबित हुई है। उनके वेतन और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए दशकों से चल रही योजनाओं में कटौती हो रही है। अर्थशास्त्री स्टिगलिट्स किसी एशियाई अथवा लातीनी अमेरिकी देश के नहीं हैं। वह अमेरिकी हैं और अमेरिका में श्रमजीवी वर्ग की बिगड़ती हालत से चिंतित हैं। इसलिए उनकी बात पर गंभीरता के साथ ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत की नीति-निर्धारक और आला अफसर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रतियोगिता, विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का हवाला देकर भारतीय समाज का .........
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विश्वबैंक पर काबिज बहुराष्ट्रीय शक्तियां -शाल्मली गुत्तल

गरीबी हटाने और आर्थिक विकास के लिए विश्वबैंक विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 18-20 बिलियन अमरीकी डॉलर कर्ज और सहायता के रूप में देता है। बैंक अपनी एजेंसी अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के साथ मिलकर उन देशों में भी काम कर रहा है जो अब कोष के कर्जदार नहीं हैं। बैंक की सारी आर्थिक सहायता सरकारों को नहीं मिलती, बल्कि ज्यादातर हिस्सा प्राइवेट सेक्टर खासतौर पर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जाता है, जो कर्ज, तकनीकी सहायता और निवेश के खतरों को कम करने के रूप में होती हैं। अमीरों का समर्थन- पिछले 60 सालों में बैंक 'इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट' (आईबीआरडी) नाम की एक संस्था के स्वरूप से उठकर पांच संस्थाओं में विस्तृत हो गया है, ये पांचों संस्थाएं विशिष्ट कार्यक्षेत्र से संबंधित हैं। इनमें आर्थिक सहायता के........................
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विश्वबैंक और मानवाधिकार -एरिक टुसेन्ट

जब मैं बैंक में आया तब हमें corruption शब्द का उल्लेख करने की अनुमति नहीं थी, इसे ‘c’ शब्द कहा जाता था, लेकिन हमें ‘r’ यानी ‘right’ शब्द का उल्लेख करने की जरूरत है।- जेम्स बोल्फेन्सोह्न (1 मार्च, 2004)
मानव अधिकारों का सवाल कभी विश्वबैंक की प्राथमिक चिन्ता नहीं रहे हैं। बैंक द्वारा लगाई गई शर्तों में 'निजी संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार' का एक अधिकार अकेला ही सभी पर भारी पड़ रहा है जो व्यवहारिक रूप धन्ना-सेठों को मुनाफा पहुंचाने के लिए काम करता है, ये धन्ना सेठ कोई धनी व्यक्ति या राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां हो सकती हैं।
विश्वबैंक की शर्तों में जनता के सामूहिक अधिकारों का कोई जिक्र तक नहीं है। अगर विश्व बैंक में कहीं मानव अधिकारों पर जरा भी ध्यान दिया जाता है तो वह संयुक्त राष्ट्र के नीतिगत दस्तावेजों की तरह ही प्रगतिशील नहीं होता। अधिकार जैसी संकल्पनाओं की वह अपने ही तरीके से व्याख्या करता है।
जेन-फिलिप्पी पीमन्स ने बिल्कुल सही कहा है ''वर्तमान पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में मानव अधिकारों का संबंध हर हाल में निश्चित तौर पर कार्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी कार्यों में अहस्तक्षेप, अपनी संपत्ति की देखरेख के अधिकार से है और इन सबसे ऊपर है, किसी भी ऐसे कार्य को रोकने की राज्य की जिम्मेदारी; जो उत्पादन और विनिमय में समय, पूंजी और संसाधनों के निवेश की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करता है... नव उदारवारी सामाजिक और आर्थिक मांगे वैधानिक इच्छाएं तो कही जा सकती हैं, लेकिन अधिकार नहीं... नव उदारीकरण का विचार अधिकारों के किसी भी सवाल के सामूहिक सिध्दांत को नकारता है। केवल मात्र व्यक्ति ही अधिकारों की मांग कर सकता है और जो अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, वह भी अनिवार्य रूप से व्यक्ति ही हैं, अपने कार्यों के प्रति उनकी जवाबदेही भी होनी चाहिए। अधिकारों के उल्लंघन का संबंध किसी भी संगठन या निकाय से नहीं जोड़ा जा सकता है।''

आईएमएफ और विश्वबैंक क्या हैं?

आईएमएफ और विश्वबैंक दुनिया के सबसे अमीर जी-7 के देशों -अमरीका, ब्रिटेन,जापान,जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और इटली की सरकारों द्वारों नियंत्रित होते हैं, इन संस्थाओं के बोर्ड पर 40 फीसदी से भी ज्यादा नियंत्रण धनी देशों का ही रहता है। इनका काम तथाकथित 'तीसरी दुनिया' या ग्लोबल साऊथ के देशों और पूर्व सोवियत ब्लॉक की 'संक्रमणकालीन अर्थव्यवस्था' पर अपनी आर्थिक नीतियों को थोपना है।
एक बार देश इन बाहरी कंर्जो के चुंगल में फंस जाते हैं तो उन्हें फिर कहीं कोई क्रेडिट या कैश नहीं मिलता, जैसे अधिकांश अफ्रीका, एशिया, लातिन अमरीका और कैरेबियाई देश कर्जे में फंसे हैं तो वे इन्हीं अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास जाने के लिये मजबूर हो गए हैं नतीजतन उन्हें वे सब शर्तें माननी पड़ती है, जो बैंक करने के लिये कहता है कोई भी देश कर्जे की समस्याओं से उबर नहीं पाया है, बल्कि बहुत से देशों की हालत तो पहले से भी बदतर हो गई है, विश्वबैंक-आईएमएफ से सहायता लेने के बाद तो कर्ज और भी बढ़ गया है।

विश्वबैंक का 'रिवॉल्विंग डोर' -प्रशांत भूषण

विश्वबैंक के पूर्व चीफ इकॉनोमिस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज ने 'ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स डिसकंटेन्ट्स' में बैंक और आईएमएफ की खुली आलोचना करते हुए कहा है कि इन संस्थाओं पर केवल साहूकार औद्योगिक देश ही हावी नहीं हैं बल्कि उन देशों में निहित व्यापारिक और आर्थिक हित भी इन संस्थाओं पर हावी हैं; इनकी नीतियों से भी यही बात सामने आती है। उनका कहना है कि ऐसा इसीलिये होता है क्योंकि विश्वबैंक और उस जैसी अन्य बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाएं अमीर देशों द्वारा नियंत्रित की जा रही हैं और इन अमीर देशों के वित्तमंत्री और केन्द्रीय बैंक के गवर्नर ही अपने देशों का विश्वबैंक और आईएमएफ में प्रतिनिधित्व करते हैं। स्टिग्लिट्ज आगे कहते है, ''वित्तमंत्री और केन्द्रीय बैंक के गवर्नरों की वित्तीय समुदाय के साथ आमतौर पर साठगांठ होती है, वे इन्हीं वित्तीय फर्मों से ही आते हैं और सरकारी नौकरी का अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद इन्हीं फर्मों में दोबारा लौट जाते हैं। यही वजह है कि ये व्यक्ति दुनिया को पूंजीवादी समुदाय की नजर से ही देखते हैं। इसलिये किसी भी संस्था के फैसलों में फैसले बनाने वालों के हितों और नजरिये की झलक स्वाभाविक रूप से दिखाई पड़ती है। हैरानी की बात नहीं है कि अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं ही विकसित औद्योगिक देशों के व्यवसायिक और पूंजीवादी हितों से गहरे रूप से जुड़ी हुई हैं।''
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मुम्बई के पानी का निजीकरण करने का विश्वबैंक का प्रयास हुआ पानी-पानी - अफसर जाफरी

3 जून 2007 को ग्रेटर मुम्बई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन ने सभी भागीदारों की एक बैठक बुलाई, जिसमें (विश्वबैंक और पब्लिक प्राइवेट इन्फ्रास्ट्रक्वर एडवाइजरी फेसिलिटी) द्वारा मुम्बई के 'के-ईस्ट' वार्ड का अध्ययन करने के लिए नियुक्त न्यूजीलैण्ड के सलाहकार ग्रुप 'कास्टेलिया' ने एक साल के अध्ययन के बाद 'वाटर डिस्ट्रीब्यूशन इम्प्रूवमेंट प्रोग्राम' पर निष्कर्ष और सुझाव प्रस्तुत किए। बैठक में एमसीजीएम की लेबर यूनियन, के-ईस्ट वार्ड के स्थानीय निवासियों, आन्दोलनकारियों, जल-प्रबन्धन के विशेषज्ञ और कुछ चुने हुए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विश्वबैंक के श्यामल सरकार और पीपीआईएएफ की भावना भाटिया को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। स्थानीय नागरिकों, श्रमिक संघों और आन्दोलनकारियों की उपस्थिति कास्टेलिया और विश्वबैंक के लिए खतरनाक साबित हुई, क्योंकि इनकी उपस्थिति से दोनों संस्थाओं की पानी के निजीकरण के लिए प्रस्तुत की गई रिपोर्ट की सच्चाई सबके सामने आ गई। 2004 के मध्य में पीपीआईएएफ (एक समूह जिसमें विश्वबैंक शामिल है) ने 6,92.500 अमरीकी डालर की सहायता देना स्वीकार किया, यह धन जलापूर्ति सेवाओं में भागीदारी के लिए निजी क्षेत्र में अन्तरराष्ट्रीय अनुभव वाले सलाहकार ............

आईएमएफ-विश्वबैंक और दुनिया में गरीबी - माइकल परेंटी

हमें इस रहस्य को अवश्य जानना चाहिए कि लगभग पिछली आधी शताब्दी से दुनिया में गरीब देशों को अन्तरराष्ट्रीय कर्जे, विदेशी सहायता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का निवेश, जितना बढ़ा है, उतनी ही गरीबी बढ़ी है। ऐसा कैसे हो सकता है? दुनिया की जनसंख्या से ज्यादा तेज गति से गरीबों की संख्या बढ़ी है।
पिछली अर्ध्दशती के दौरान अमरीकी उद्योगों, बैंकों और पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने 'तीसरी दुनिया' के गरीब देशों- एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमरीका में ही निवेश किया है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां विशाल प्राकृतिक संसाधनों और ऊंचे मुनाफे से आकर्षित हुई हैं क्योंकि वहां न केवल सस्ता श्रम मिलता है बल्कि करों, पर्यावरणीय नियमों, कामगारों के लाभ और कार्य-सुरक्षा लागतों आदि में पूरी तरह से रियायत मिलती है। अमरीकी सरकार ने कंपनियों को समुद्रपारीय पूंजी निवेश के लिए न केवल करों में रियायतें दे रखी हैं बल्कि उन्हें नए स्थान पर बसने के लिए, खर्चे भी उठा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां घरेलू व्यापार को तीसरी दुनिया में बढ़ाती हैं और उनके बाजारों पर कब्जा कर लेती हैं।

21-24 सितम्बर 2007 को ''विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' पहली बार भारत में

देश के हितों को गिरवी रख, विश्वबैंक की चाकरी कर रहे हैं सरकारी अधिकारी- प्रशांत भूषण
विश्वबैंक के कर्मचारी ही परोक्ष रूप से भारत सरकार की नीतियां बना रहे हैं : प्रो. अरुण कुमार


नई दिल्ली (पीएनएन)। 21-24 सितम्बर 2007 को देश-विदेश के 150 से ज्यादा संगठनों के लोग ''विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' के लिए इकट्ठा होंगे। दुनिया की सर्वाधिक शक्तिशाली संस्थाओं में से एक -विश्वबैंक की नीतियों से दशकों से जीवन के हर क्षेत्र में प्रभावित लोग अपनी शिकायतें दर्जनों ज्यूरी-सदस्यों के सामने रखेंगे। ज्यूरी-सदस्यों में आबिद हसन मिंटो, एलेजेंड्रो नेडल, ब्रुस रिच, सुलक सिवरक्शा, जस्टिस पी वी सावंत, अरुणा राय, अरुंधति राय, प्रभाष जोशी, महाश्वेता देवी, प्रो अमित भादुरी आदि प्रमुख हैं। विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' के उद्देश्य पर प्रेस को संबोधित करते हुए ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क की निदेशक दीपिका डिसूजा ने कहा कि जन न्यायाधिकरण का उद्देश्य 'उदारीकरण और नव-आर्थिक नीति' के मुद्दे पर बहस को जगाना है। मुख्य रूप से यह विश्वबैंक और एलीट वर्ग की 'ज्ञान पर तानाशाही' के खिलाफ सीधा प्रहार है। गरीबों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और अन्य वंचित लोगों के अनुभवों और साक्ष्यों को उजागर करने के लिए हो रहा यह न्यायाधिकरण; विश्वबैंक के आर्थिक और सामाजिक नीतियों की प्रभुता के खिलाफ सीधा संघर्ष है।

प्रेस को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने विश्वबैंक, अमेरिका और अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के बीच का गंठजोड़ भारत के नीति-निर्धारकों के लिए लाल-कालीन बिछाकर बैठा हुआ है। नीति-निर्धारण की प्रक्रिया के वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों को विश्वबैंक ऊंचे पद-वेतनों का लालच देकर अपनी नीतियों को लागू करवा रहा है और ये सरकारी अधिकारी देश के हितों को गिरवी रख, विश्वबैंक की चाकरी कर रहे हैं। ऐसे लोगों को नीति-निर्धारण प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

प्रसिध्द अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार ने कहा सार्वजनिक वित्त के लिए हम पूरी तरह से विश्वबैंक के उपर निर्भर हो गये हैं। वही हमें निर्देशित कर रहा है कि हमें क्या करना है? हम स्वीकार भी कर लेते हैं, जैसे कि हमारे सामने कोई रास्ता ही नहीं बचा हो। विश्वबैंक, आईएमएफ और डब्लूटीओ की नीतियां एकतरफा लादी जा रही हैं, यह वैश्वीकरण का दूसरा चेहरा हमें देखने को मिल रहा है। आय में असामनता, बेरोजगारी तथा उत्पादन में कमी आई है।

अपने प्रेस संबोधन में खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा ने कहा कि विश्वबैंक ने अनेक तरीके से भारतीय खेती को प्रभावित किया है। हरित-क्रांति से लेकर अब तक लगातार कर्ज के बल पर खेती की पूरी दिशा को कॉरपोरेट-खेती बनाने में लगा हुआ है। प्रेस से ग्रामीण मजदूर यूनियन उत्तर प्रदेश के सचिव अशोक चौधरी ने कहा कि विश्वबैंक और उसकी संस्थाएं मिलकर परम्परागत आदिवासियों और वनवासियों की जीविका को नष्ट कर रहे हैं। परिवर्तन के अरविंद केजरीवाल ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वबैंक के कर्ज में फंसने के बजाए भारत को दूसरे विकल्पों की खोज करनी चाहिए।

''विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' : नील टैंग्री

21-24 सितम्बर 2007 को सैकड़ों लोग ''विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण' के लिए इकट्ठा होंगे। 4 दिन के इस सत्र में दुनिया की सर्वाधिक शक्तिशाली संस्थाओं में से एक विश्वबैंक के खिलाफ अपने जीवन के हर क्षेत्र की शिकायतें दर्जनों न्यायधीशों के सामने रखेंगे। भारत में विश्वबैंक पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन करने का प्रयास, अन्याय के खिलाफ विद्रोह मात्र नहीं है बल्कि उससे कहीं बढ़कर कुछ करने का प्रयास है। जन न्यायाधिकरण एक सुविचारित राजनीतिक विचारधारा है, जिसका उद्देश्य 'नव-उदारवाद और आर्थिक नीति' के मुद्दे पर बहस को जगाना है।
लेकिन मुख्य रूप से यह विश्वबैंक और एलीट वर्ग की 'ज्ञान पर तानाशाही' के खिलाफ सीधा प्रहार है। गरीबों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और अन्य वंचित लोगों के अनुभवों और साक्ष्यों को उजागर करता हुआ यह न्यायाधिकरण विश्वबैंक के अपने ही (आर्थिक और सामाजिक नीति के ज्ञान के) साधनों के खिलाफ सीधा संघर्ष है।
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छोटे किसानों और भारतीय जैवविविधता को नष्ट करना ही विश्वबैंक की नीति है - डॉ वंदना शिवा

वास्तव में भारत के किसान संकट से गुजर रहे हैं। व्यापारिक उदारीकरण के एक दशक में 150,000 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं और जहां किसान बचे हैं उनकी आय तेजी से गिर रही है। भारत अपने किसानों को बचाने में असमर्थ है लेकिन विश्व बैंक की किसान-विरोधी नीतियां तेजी से किसानों से न केवल उनकी आय छीन रही हैं, बल्कि कृषि संकट भी पैदा कर रही हैं। विश्वबैंक की नीतियों के तहत ही किसान के हाथ से सब कुछ छीनकर बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया जा रहा है। किसानों पर यह संकट दो रूपों में शुरू हुआ। एक तो 1965-90 में हरित क्रांति के नाम पर और दूसरा ढांचागत समायोजन और व्यापारिक उदारीकरण के नाम पर। विश्वबैंक ने गरीब किसानों को केमिकल इस्तेमाल करने को मजबूर किया और भारतीय खाद उद्योग पर विश्वबैंक और यूएसआईडी दोनों ने मिलकर उदारीकरण और घरेलू प्रतिबंध हटाने के लिए दबाव डाला। हरित क्रांति से समृध्दि का दिवास्वप्न 1980 में टूट गया और पंजाब के किसानों में रोष फैल गया। लेकिन फिर भी विश्व बैंक ने 1990 में नई शर्तें राज्य पर थोप दीं और हरित क्रांति में निभाई गई उसकी भूमिका से भी उसे बेदखल कर दिया।

जरूरी हो गया है विश्वबैंक की समीक्षा - शिराज केसर

भारत में विश्वबैंक के अंधाधुंध घुसने का रास्ता जब खुला, जब भारत सरकार ने वित्तीय संकट से अपने को बचाने के नाम पर ढांचागत समायोजन के बहाने 1991 से नयी आर्थिक नीतियों के जरिए नव-उदारवाद की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया। विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने विदेशी मुद्रा में ऋण देने के सरकारी अनुरोध पर इन नीतियों को तय किया था। यह महत्वपूर्ण बात है कि भारत में विश्वबैंक की परियोजना-आधारित भूमिका अब नीति आधारित हो गयी है। निश्चित रूप से हमें अब यह सवाल उठाना चाहिए कि राष्ट्रीय और सरकारी नीतियां भारत में बन रही हैं या वाशिंगटन में, जहां विश्वबैंक का मुख्यालय है।

विश्वबैंक परियोजनाओं और नीतियों से जो नुकसान हो रहा है उससे समाज का सबसे कमजोर वर्ग - वनवासी, मछुवारे, मजदूर, दलित, किसान, महिलाएं, बच्चे तथा शहरी और ग्रामीण गरीब - निरंतर प्रभावित हो रहे हैं। विश्वबैंक समूह की प्रसिध्दि बड़ी-बड़ी ढांचागत परियोजनाओं के लिए आर्थिक सहायता देने में है, जैसे बड़े बांधों के लिए (सरदार सरोवर इसका अच्छा उदाहरण है), बिजली परियोजनाओं के लिए और राजमार्गों आदि के लिए। अक्सर इसका परिणाम बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नुकसान, बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित करने और असहाय बना देने में (उनके प्राकृतिक संसाधनों से वंचित करके) होता है।

मुद्दे-स्तम्भकार