जवाबदेही मांगता साल - प्रशांत भूषण

वर्ष 2007 न्यायपालिका के लिए घटनाओं से परिपूर्ण था, खासकर अगर उसे सुखयों में मिली जगह पर ध्यान दिया जाए। ऐसा शायद ही कोई दिन था जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को अखबारों में पहले पन्ने पर और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रमुख खबरों में जगह न दी गई हो। सप्रीम कोर्ट में हर कामकाज के दिन प्रमुख चैनलों के ओबी वैन नजर आते हैं। चाहे किसी महत्त्वपूर्ण मामले की सुनवाई या फैसले का दिन हो या न हो, समाचार माध्यमों के प्रतिनिधि अपने दर्शकों या पाठकों को सबसे पहले खबर पहुंचाने के लिए एक-दूसरे से होड़ लगाते हैं। यहां तक कि न्यायाधीशों के मामूली विचारों को प्रमुख खबर के रूप में पेश किया जाता है। मिसाल के तौर पर मुख्य न्यायाधीश ने हाल में कहा कि वे न्यायिक सक्रियता से संबंधित दो न्यायाधीशों की पीठ के विचार से बंधे नहीं हैं।
मैं यहां इस साल सप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमुख मामलों के फैसलों को नहीं गिनाऊंगा। इस साल न्यायपालिका में दिखे प्रमुख रुझनों के बारे में चर्चा ज्यादा सार्थक होगी। इस साल के शुरू में एक्टिविस्ट मुख्य न्यायाधीश वाई.के. सभरवाल पद से हटे और न्यायमूत के.जी. बालकृष्णन ने उनकी जगह ली। उन्होंने बार-बार स्पष्ट किया था कि न्यायिक सक्रियता के बारे में उनके विचार उनके पूर्ववतयों के विचार से काफी अलग हैं। उन्होंने अदालत में और उसके बाहर कहा कि अदालतें न केवल सरकार की नीतियों बल्कि उसके कामकाज में भी दखल नहीं कर सकतीं। इस तरह पुलिस सुधार से संबंधित न्यायमूत सभरवाल के फैसले उनके उत्तराधिकारी के कुछ हद तक उदासीन रवैये के कारण लटके हुए हैं। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के रवैये का पूरी न्यायपालिका पर निर्णायक असर पड़ा है। हालांकि अभी तक इससे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठों से उठने वाली न्यायिक सक्रियता पर पूरी तरह रोक नहीं लगी है।
सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने हालात सुधारने के लिए ही फैसला दिया था। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि कई अदालतें न्यायिक सक्रियता के नाम पर अपने हदों को लांघ रही हैं। न्यायमूत काटजू और माथुर ने कहा कि कई मुकदमों में न्यायाधीश सरकारी विशेषज्ञों की राय पर अपनी राय थोपने का प्रयास करके ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश स्पीड ब्रेकर के आकार, हवाई अड्डों पर विमानों के लिए प्रतीक्षा शुल्क, नर्सरी में दाखिले से पहले बच्चों के साक्षात्कार लिये जाने चाहिए या नहीं, संसद में किस तरह से मतदान कराना चाहिए इत्यादि जैसे मामलों के विशेषज्ञ नहीं हैं। इसके अलावा, जनता ने उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से चुना नहीं है न ही वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं या फिर कोई भी संस्था उनकी समीक्षा नहीं करती। न्यायिक आदेशों के जरिए कार्यपालिका या संसद पर अपने विचार थोपना न केवल उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है बल्कि किसी भी लोकतंत्र में यह खतरनाक हो सकता है। इन न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि अदालत कानून नहीं बना सकती या संसद को कानून बनाने के लिए किसी भी तरह से निर्देश नहीं दे सकती। यह भी खतरनाक होगा क्योंकि इस तरह के आदेश संसद जैसी किसी निर्वाचित संस्था की समीक्षा का विषय नहीं होंगे। अदालत ने कहा कि हाल में कई न्यायाधीश ऐसे व्यवहार करने लगे हैं मानो वे सम्राट हों और अगर यह रुझान जारी रहा तो इससे न केवल कार्यपालिका और संसद के साथ टकराव अवश्यंभावी है बल्कि इससे न्यायपालिका के अधिकार काफी कम हो सकते हैं।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों के कई विवादास्पद फैसले और आदेश आए जिन पर निर्वाचित विधायकों और सांसदों ने काफी नाराजगी जाहिर की तथा न्यायपालिका में ही काफी लोग आहत हुए। न्यायमूत काटजू और न्यायमूत माथुर के फैसले से न्यायपालिका की सक्रियता और न्यायपालिका के अधिकारों पर रोचक बहस छिड़ गई। इस फैसले की आलोचना में कहा गया कि इसने सप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के फैसले के विरुध्द टिप्पणी की और इस तरह यह फैसला स्वयं न्यायपालिका के अनुशासन के विरुध्द है। एक और आलोचना में कहा गया कि इसने उन मुकदमों के खिलाफ टिप्पणी की है जो उस अदालत के सक्षम नहीं हैं और उनमें अदालत ने दूसरे पक्ष की दलील नहीं सुनी है। वैसे, यह प्रक्रिया की आलोचना थी। लेकिन इस संक्षिप्त फैसले की एक महत्त्वपूर्ण आलोचना हो सकती है। हालांकि इसमें जो बातें कही गईं उनमें से अधिकांश न केवल सही हैं बल्कि वे स्वागत योग्य हैं और उनकी जरूरत थी। एक ओर जहां फैसले में कहा गया है कि अदालतें नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, वहीं अदालतों का अक्सर ऐसी परिस्थितियों से सामना होता है जिनमें सरकार की नीति बिना किसी सोच-समझ के लागू होती है और उनमें किसी विशेषज्ञ समिति की राय नहीं होती। कभी-कभी यह स्पष्ट होता है कि नीतिगत फैसला बाहरी कारकों के मद्देनजर किया गया है या ऐसे लोगों ने फैसला किया है जिनके बीच जबरदस्त हित संघर्ष है। मिसाल के तौर पर मौजूदा सरकार द्वारा परमाणु बिजली उत्पादन में इजाफा करने और अमेरिकी सरकार के साथ परमाणु करार करने के सरकार के नीतिगत फैसले के आलोचकों का कहना है कि इस तरह के फैसले से पहले ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की लागत और लाभ के बारे में कोई विश्लेषण नहीं किया गया। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष गोपालकृष्णन, प्रोफेसर एम.जी.के. मेनन जैसे लोग अकसर इस तरह की बातें करते रहे हैं। अगर कई परमाणु बिजली संयंत्र (जो कई वजहों से बेहद खतरनाक हैं) लगाने के लिए जनहित याचिका दायर की जाती है तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती और सरकार से पूछ सकती है कि क्या ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की लागत और लाभ के लिए अध्ययन करके ही इस तरह का फैसला किया गया है। दुर्भाग्यवश सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अदालत के अधिकारों और कामकाज के बारे में खुलासा नहीं होता।
एक और मामले को लें जो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है। सरकार आनुवांशिक रूप से संवर्ध्दित खाद्यान्न और ऑर्गेनिज्म (जो कई तरह से जहरीले, एलर्जीकारक और खतरनाक हो सकते हैं) का खुलकर आयात करती है। इसके लिए इन ऑर्गेनिज्म की जैव सुरक्षा या सूक्ष्म जीवों, जानवरों और इंसानों पर उनके प्रभाव का अध्ययन नहीं किया गया है। क्या अदालत इसमें हस्तक्षप कर सरकार से यह नहीं कह सकती कि इस तरह के खुद से उत्पन्न होने वाले खतरनाक ऑर्गेनिज्म को लाने से पहले जैव सुरक्षा की जांच और अध्ययन सुनिश्चित करने चाहिए। मान लीजिए, जैसा कि इस मामले में है, कि सरकार कहती है कि जैव सुरक्षा की जांच करने और मंजूरी देने के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर दी है। लेकिन अदालत को पता लगता है कि विशेषज्ञों की उस समिति में ऐसे लोग हैं जो कंपनियों और संगठनों से जुड़े हुए हैं और उन्हें पैसा मिल रहा है और आनुवांशिक रूप से संवर्ध्दित खाद्यान्न को मंजूरी दिलाने में उनका निहित स्वार्थ है। क्या अदालतें उनमें यह कहकर हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं कि विशेषज्ञों के स्वतंत्र समूह से पर्याप्त अध्ययन कराए बिना इन खतरनाक पदार्थों को देश के नागरिकों को न मुहैया कराया जाए। दुर्भाग्यवश, अदालत के आदेश से इन परिस्थितियों पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। यही वजह है कि इससे हाईकोर्टों और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी कुछ भ्रम पैदा हो सकता है।
लिहाजा यह स्वागत योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट की उच्च पीठ जनहित के मामलों में अदालत के अधिकारों के लिए व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने पर विचार कर रही है। लेकिन इस कसरत को उचित, विश्वसनीय और उपयोगी बनाने के लिए यह काम पांच सदस्यीय संविधान पीठ को करना चाहिए और इससे पहले देश के जनहित में सोचने वाले नागरिकों को इस बारे में राय रखने का मौका दिया जाना चाहिए। यह इतना महत्त्वपूर्ण कार्य है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की पीठ के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।
न्यायपालिका की ईमानदारी पर संदेह करने वाली एक महत्त्वपूर्ण घटना हुई। दिल्ली में कमशयल संपत्तियों की सीलिंग के संबंध में मुख्य न्यायाधीश वाई.के.सभरवाल पर आरोप लगाए गए। मुख्य न्यायाधीश वाई.के. सभरवाल के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में उन कमशयल संपत्तियों को सील करने के आदेश पारित किए जो पहले के मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय इलाकों पर बनाए गए थे। इसकी वजह से दिल्ली में दहशत और अराजकता फैल गई और लाखों दुकानों तथा दफ्तरों को नए शॉपिंग मॉल और कमशयल कांप्लेक्सों में स्थानांतरित करना पड़ा। हालांकि सरकार ने मास्टर प्लान में तब्दीली करके कई आवासीय इलाकों को कमशयल उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी फिर भी इस सीलिंग की मुहिम को जारी रखने का आदेश दिया गया। वैसे, बाद में पता चला कि एक ओर न्यायमूत सभरवाल इन आदेशों को पारित कर रहे थे और दूसरी ओर उनके बेटों ने शॉपिंग मॉल और कमशयल कांप्लेक्स के डेवलपरों से साझेदारी कर ली और इस तरह अपने पिता के आदेशों से उन्हें फायदा हो रहा था। यह भी पता चला कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें ऐसे समय में बड़े पैमाने पर कमशयल संपत्ति आवंटित कर दी जब न्यायमूत सभरवाल अमर सिंह के चचत टेपों के मामले की सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने उनके प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। संयोगवश, इन कमशयल भूखंडों को आवंटित करने का प्रभार अमर सिंह के पास ही था। इस मामले का खुलासा करने वाले अखबार मिड डे के पत्रकारों के खिलाफ सुओ मोटु नोटिस लेकर अदालत की अवमानना का मामला बनाया गया और उन्हें चार महीने कारावास की सजा सुनाई गई। इस फैसले पर मीडिया में काफी हंगामा खड़ा हो गया और फिर अवमानना के मामले में अदालत के अधिकारों की समीक्षा करके उन्हें सीमित करने की मांग उठने लगी। खासकर ''अवमानना की परिभाषा में से अदालत को विवादित करने या उसके अधिकार को कम करने'' वाले अंश को हटाने की मांग की जाने लगी। 2007 में कई संदिग्ध न्यायिक नियुक्तियों और प्रोन्नतियों का भी भंडाफोड़ हुआ। इसकी वजह से इस तरह की नियुक्तियों और प्रोन्नतियों में मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट में उनके कॉलेजियम के मनमानीे सिफारिशों से पर्दा हट गया। खासकर, चेन्नै हाईकोर्ट में न्यायमूत अशोक कुमार की नियुक्ति को इस आधार पर सप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई कि इस बारे में अकेले मौजूदा मुख्य न्यायाधीश ने सिफारिश की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों के मुताबिक दूसरे न्यायाधीशों के कॉलेजियम के साथ मशविरा नहीं किया था। इस तथ्य के बावजूद यह सिफारिश की गई कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों ने इससे पहले उनकी ईमानदारी के बारे में विपरीत रिपोर्टों के मद्देनजर उन्हें न्यायाधीश नियुक्त न करने की सिफारिश की थी। नियुक्तिप्रोन्नति का एक और संदिग्ध उदाहरण न्यायमूत जगदीश भल्ला से जुड़ा था, जिन्हें हिमाचल के मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रोन्नति दी गई। यह सिफारिश इस तथ्य के बावजूद की गई कि उन्हें गंभीर आरोपों के कारण केरल का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने के योग्य नहीं समझा गया। लेकिन अदालत की अपनी आंतरिक प्रक्रिया के मुताबिक इन आरोपों की जांच नहीं की गई। यह प्रक्रिया 1999 के मुख्य न्यायाधीशों के कॉन्फ्रेंस में तैयार कर दी गई थी। यह वही आंतरिक प्रक्रिया है जिसे न्यायाधीश जांच संशोधन विधेयक के जरिए संवैधानिक दर्जा दिए जाने की कोशिश की जा रही है। सभ्य समाज और संसद की स्थायी समिति की तीखी आलोचना के चलते यह विधेयक संकट में है। इस विधेयक को स्थायी समिति के हवाले किया गया था। एक आलोचना यह है कि न्यायाधीशों में भाईचारा होता है और ऐसे में न्यायाधीशों की समिति को अपने ही भाइयों के खिलाफ जांच करने का काम सौंपना मुनासिब नहीं होगा।
इन सारी घटनाओं और खुलासों के कारण न्यायपालिका और न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया की गंभीर आलोचना शुरू हो गई है और उस पर बहस छिड़ गई है। पहली बार देश में न्यायपालिका से जवाबदेही मांगी जाने लगी है, पहली बार मीडिया ने खुलेआम न्यायिक जवाबदेही की जरूरत पर बात शुरू कर दी है। 2007 में पहली बार न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया, जिसे न्यायपालिका ने सरकार से छीन लिया, पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे। 2007 में ही पहली बार देश में न्यायिक सक्रियता पर गंभीर बहस शुरू हो गई। उम्मीद है कि 2007 में शुरू हुई बहस आने वाले वर्षों में तेज होगी और इसकी वजह से उचित व्यवस्था और न्यायिक जवाबदेही के लिए संस्थाएं बनाई जाएंगी और देश के लोग न्यायपालिका पर भरोसा करने लगेंगे।

मुद्दे-स्तम्भकार