उत्पीड़न पर आदिवासी आंदोलन

उड़ीसा में निजी स्वार्थों के चलते गरीब आदिवासियों के आंदोलन को माओवादियों का संगठित विद्रोह घोषित कर दिया गया जिससे कि उनकी स्थिति में सुधार न हो सके.
संजय कपूर

दोपहर का समय है. फरवरी माह का सूरज काफी तेजी से चमक रहा है और धूप भी तेज है. इस क्षेत्र के बंजर लेकिन काफी व्यस्त भू भाग वाली लाल मिट्टी में इतनी गर्माहट है जितनी पहले कभी नहीं रही. आमतौर पर पारादीप बंदरगाह की ओर भीड़भाड़ वाली सड़क जनवरी २००६ की शुरूआत से ही आदिवासी प्रदर्शनकारियों द्वारा रास्ता बंद कर दिए जाने के कारण काफी शांत दिखाई दे रही है.
यह प्रदर्शन १२ आदिवासियों की हत्या के विरोध में किया जा रहा है. सड़कों को थोड़ी-थोड़ी दूर पर पत्थरों, पेड़ के तनों, कुर्सियों और हाथों से जो कुछ भी लाया जा सका उससे जाम कर दिया गया. यह प्रदर्शन तात्कालिक था और यह इसका प्रमाण है कि प्रतिदिन नए हथियार आजमाते हुए वे सड़क जाम तक पहुंच गए.
सुनसान सड़क के किनारे बेतरतीब ढ़ंग से चेवरोलेट, टोयोटा और अन्य छोटी कारें खड़ी हैं. गाड़ियों के मालिक अपने वाहनों को इस तरह से छोड़ने को लेकर बेफिक्र हैं क्योंकि सड़कों पर कोई यातायात नहीं है. हाईवे से सटी हुई कच्ची सड़क है जहां कुछ खाली जगह में शामियाना लगा है. पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों का अस्थि कलश इस शामियाने में तब तक रखा गया जब तक कि उनका विसर्जन नहीं हुआ. गाड़ियों के मालिक घटनास्थल पर जाकर आंदोलन कर रहे आदिवासियों के साथ सहानुभूति प्रकट करते.
वहां का दौरा कर रहे खद्दरधारी कांग्रेसी नेताओं में कैबिनेट मंत्री के बगल में बैठने के लिए होड़ लगी थी. शामियाने से कुछ दूर आंखों में थकान लिए स्थानीय आदिवासी पंक्ति में बैठे थे. बढ़ी हुई दाढ़ी और मैले कपड़ों में वे मंत्री की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे जो उड़िया भाषा में किसी भी कीमत पर समझौता न करने का भाषण दे रहे थे. यह उस गरीबी का चेहरा है जिसने उसे भूल जाने के लिए भारत का उदारीकरण किया है.
उनके उदास और अस्त व्यस्त हाव भाव से यह स्पष्ट है कि भारत के दो चेहरे हैं, एक तो वह जो अमीर और मेट्रो में रहते हैं और दूसरा वह जो आर्थिक रूप से गरीब राज्यों और झुग्गी झोपड़ियों में रहते हैं, और इन दोनों में कभी समानता नहीं हो सकती.
आदिवासियों का भी अपना प्रतिनिधि है जो मंत्री व अ‍न्य कांग्रेसी नेताओं के साथ बैठा था. वे राज्य सरकार और वहां के स्थानीय विधायक प्रफुल्ल कुमार घड़ेही पर आरोप लगा रहे थे जो कि राज्य के वित्त मंत्री भी हैं.
एक वक्ता जो कि वहां का जमींदार था और राज्य सरकार ने उसकी जमीन इस्पात कारखाने के लिए अधिग्रहित की है, कहा कि "उन्होंने फायरिंग के बाद यहां आने की भी औपचारिकता भी नहीं निभाई".
जमीनों के आदिवासी मालिक बहुत अधिक मुआवजे की मांग कर रहे थे. वह वक्ता जिसे स्थानीय कांग्रेसी नेता का समर्थन था, उसका कहना था कि सरकार उनकी जमीने ३.७ लाख प्रति एकड़ की दर से खरीद कर उसे १० गुनी कीमत, ३७,५०० लाख प्रति एकड़ के हिसाब से बेच रही है.
सरकार का कहना है कि कंपनियों से ज्यादा पैसे वसूलकर वे यहां की सड़क जैसी बुनियादी संरचनाओं का निर्माण करेंगे. वे सरकार से पूछते हैं कि सड़क कहां है? भाषण के बाद कांग्रेसी नेता अपने वातानुकूलित वाहनों से वापस लौट गए. आदिवासी टकटकी लगाए शामियाने में बैठे रहे और यह राजनीतिक प्रहसन उनके उपर कोई प्रभाव नहीं डाल सका.
इन आदिवासियों को मीडिया और सरकार के कुछ अधिकारी खतरनाक माओवादी साबित करने में लगे हुए हैं. यदि माओवादी ऐसे ही होते हैं तो अपनी जमीनों के लिए आंदोलन कर रहे लोग भी आंदोलनकारी गुरिल्ला हैं. लेकिन सत्य इससे काफी अलग है. इन गरीब आदिवासियों का किसी विचारधारा से कुछ लेना देना नहीं है. श्रम विभाग के एक अधिकारी के अनुसार "वे अच्छे पैसे के लिए सरकार और आदिवासियों के बीच सौदेबाजी कर रहे हैं. लेकिन कोई नहीं सुन रहा है".
२जनवरी २००६ की घटना का उदाहरण देखें जब टाटा स्टील कंपनी राज्य पुलिस के सहयोग से आदिवासियों की जमीन पर कब्जा के समय कुछ सरकारी अधिकारियों ने इसके विरोध के पीछे माओवादियों का हाथ बताया था. पिछले दो महीने से वे इनके खिलाफ सबूत और कहानी इकट्ठा कर रहे थे.
इसमें सबसे ज्यादा हलचल मचाने वाली बात यह थी कि कलिंगनगर की घटना में शामिल लोगों को भारतीय जनता पार्टी और कुछ स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का समर्थन था. यह तथ्य सत्ताधारी जनता दल के मुख्यमंत्री बिजू पटनायक के लिए काफी आसान है क्योंकि इससे पुलिस को विरोधियों के उपर वार करने के लिए एक बहाना मिल गया.
उद्योगों के एक खास वर्ग द्वारा माओवादियों के खिलाफ मानसिक रूप से उकसाया गया जो कोरिया कि पास्को जैसी विदेशी स्टील कंपनी के प्रवेश का रास्ता देख रहे हैं. वे अपने संसाधन तो यहां लगाना चाहते हैं लेकिन वे इस पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं कि उड़ीसा माओवादियों के कब्जे मे है इसलिए यहां बड़ा निवेश करना खतरे से खाली नहीं है.
कुछ आतंकवादियों पर दोषारोपण करने के बावजूद लगातार चल रहा आंदोलन समझ में नहीं आता है. २ जनवरी से शुरू हुए इस आंदोलन को लगभग दो महीने हो चुके हैं फिर भी कलिंगनगर में हो रहे प्रदर्शन में कोई कमी नहीं आई है.
पहले प्रशासन यह समझ रहा था कि जब मुख्यमंत्री उनके हित में कोई घोषणा कर देंगे तो पारादीप रास्ते का जाम विधानसभा के सत्र की समाप्ती के साथ ही खत्म हो जाएगा. इस मुद्दे पर बहस भी हुई लेकिन विरोधी पार्टियों और प्रदर्शनकारियों ने वापस लौटने से इनकार कर दिया.
एक युवा पत्रकार जेना के शब्दों में "यह मुद्दा समाप्त हो सकता था यदि नवीन पटनायक घटनास्थल पर जाते और लोगों को आश्वासन देते कि उनके हितों का ख्याल रखा जाएगा. लेकिन उन्होंने वहां जाने से इनकार कर दिया".
वित्तमंत्री घड़ेही के इस्तीफे की मांग भी उठी लेकिन मुख्यमंत्री इससे सहमत नहीं हुए. सहायता और पुनर्वास पैकेज में बदलाव जो कि काफी समय से लंबित है वह बजट सत्र की समाप्ती के बाद ही हो पाएगा जब अप्रैल में विधानसभा का सत्र समाप्त हो जाएगा.
कलिंगनगर की घटना ने उड़ीसा सरकार द्वारा खनन क्षेत्र में शुरू की गई उदारीकरण की प्रक्रिया में गतिरोध पैदा कर दिया है. इस्पात क्षेत्र में काफी आशंकाएं हैं जहां पेप्सीको इस्पात कारखाना जो कुछ महीनों से विवाद में रहा है उसे २०१० तक आसान रास्ता मिल जाएगा.
दक्षिण कोरियाई अधिकारियों को आशा है कि वे पटनायक सरकार के कार्यकाल में ही अपना काम पूरा कर लेंगे जिसने उनको उड़ीसा में निवेश के लिए आमंत्रित किया है और उनका कार्यकाल २००९ तक है.
हांलाकि राज्य सरकार भारतीय उद्यमियों की बजाय दक्षिण कोरियाई लोगों को ज्यादा से ज्यादा खदान देने के कारण विपक्ष की आलोचना का शिकार बनी है. पेप्सीको और अन्य कंपनियों के प्रवेश से स्थानीय खदान माफियाओं के लिए खतरा पैदा हो गया है जो वर्षों से यहां अवैध रूप से खुदायी कर सारा खनिज अन्य राज्यों में भेज रहे थे. राजनीतिज्ञों की मदद से यहां के ठेकेदार और अधिकारी राज्य की खदान कंपनी उड़ीसा माइनिंग कारपोरेशन का बेड़ा गर्क कर चुके हैं.
इस्पात, खदान सचिव और उड़ीसा माइनिंग कारपोरेशन के अध्यक्ष भाष्कर चटर्जी द्वारा इस पर निगरानी बैठाने से पहले ही कीमती धातुओं का अनियंत्रित खनन हो चुका है. इसमें से कुछ स्थानीय कंपनियों को बेच दिया गया तथा कुछ देश से बाहर चला गया.
वर्ष २००४ में सरकार की आडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि किस प्रकार से कई सालों से अवैध खनन हो रहा है. निश्चित तौर पर माओवादी ऐसा नहीं कर रहे हैं. आडिट रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि कैसे दैमित्री खदान से ठेकेदार खनिजों की चोरी करते हैं. इसमें केवल एक खदान से ४१२ चक्कर का घपला किया गया. इसी से पूरे मामले में हुए घोटाले का अनुमान लगाया जा सकता है.
माल ढ़ुलाई में घाटा होने के बहुत से मामले हैं. परचेज कमेटी द्वारा दिखाए गए .५ प्रतिशत घाटा के मुकाबले ठेकेदारों ने माल ढ़ुलाई में ३ से १३ प्रतिशत का घाटा दिखाया है. वास्तव में यह बहुत बड़ा घाटा है लेकिन सरकारी विभाग इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि उन्होंने इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.
यदि हम २००४ की आडिट रिपोर्ट को देखें तो इसमें सबसे बड़ी बात इसका खराब प्रदर्शन है. यदि हम ध्यान से देखें तो यह घाटा राजनीतिज्ञों, अधिकारियों व ठेकेदारों की मिलीभगत से संभव हो सका है. जहां कहीं भी निजी ठेकेदार हैं वहां पर यह अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सका है या फिर रेलवे तक जाने में ही गायब हो गया. एक अध्ययन में पाया गया है कि जिन्हें भी ये ठेके दिए गए वे या तो अधिकारियों के रिश्तेदार, राजनेता या फिर नौकरशाह थे. यदि सरकार संसाधनों में धनी होकर भी विकास में फिसड्डी है तो इसका सारा दोष राजनेताओं व नौकरशाहों के भ्रष्ट गठजोड़ को जाता है.
एक उदार खनिज नीति बिना किसी रोक टोक के फल फूल रही इस लाबी के कार्यप्रणाली पर रोक लगा सकती है. राउरकेला के अलावा उड़ीसा में कोई भी इस्पात कारखाना नहीं है. इसके अलावा निजी कंपनियां खनिजों को जापान, कोरिया और चीन जेसे देशों में निर्यात कर रही हैं. कलिंगनगर के एक पत्रकार के अनुसार "सभी कंपनियां खनिजों का दोहन कर उन्हें निर्यात कर रही हैं".
टाटा स्टील की भी यहां खदान है लेकिन उन्होंने पहले इसमें रूचि नहीं दिखाई. इसमें बाधा यह थी कि भारत की बड़ी कंपनियां यहां अपना कारखाना लगाने की इच्छुक नहीं थी. टाटा कंपनी के स्थानीय अधिकारियों ने इस आरोप से इनकार किया तथा कहा कि वे यहां कारखाना स्थापित करने इच्छुक थे.
आश्चर्यजनक रूप से ४३ कंपनियों ने उड़ीसा सरकार के साथ इस्पात कारखाना लगाने के लिए समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया है. उनमें से कुछ जैसे विसा और जिंदल जैसी कंपनियों ने बहुत अधिक निवेश किया है और वे इस पर फिर से विचार कर रहे हैं.
उनका कहना है कि यदि सरकार उन्हें नियमों के अनुसार जमीन प्रदान करे तो वे यहां धन लगाना जारी रखेंगे. बहुत सी कंपनियां प्रशासन की लापरवाही और उन्हें सड़क, जल व विद्युत जैसी मूलभूत आवश्यकताएं प्रदान करने में विफल रहे हैं.
कलिंगनगर के मसले पर उद्योगों व सरकार के बीच मतभेद हैं और संभवतः इसका प्रभाव पड़ रहा है. लगभग उद्योगों का प्रत्येक प्रतिनिधि इस संवाददाता से राज्य के बारे में कहने को उत्सुक दिखा जबकि राजनीतिक गलियारों व सरकार में विदेशी निवेश को खटाई में पड़ने को लेकर निराशा और भय का माहौल था.
कलिंगनगर ने यह साबित कर दिया कि सरकार को स्थानीय लोगों के हितों के प्रति जागरूक होना होगा. जिंदल स्टील के एक अधिकारी ने कहा कि "वे जैसा पहले करते रहे हैं उस तरह से अब उन्हें मिटा नहीं सकते".
जुलाई २००५ में सरकार के साथ एक बैठक में टाटा स्टील के अधिकारियों ने आदिवासियों की उपेक्षा की बात उठाई थी तथा सरकार पर आरोप लगाया कि उसकी एजेंसी के पास उन आदिवासियों के आंकड़े नहीं हैं जिनका इससे विस्थापन हुआ है. एक कंपनी का अधिकारी जानना चाहता था कि सरकार ने विस्थापितों को क्या सुविधाएं दी हैं. कंपनी के अधिकारी ने बताया कि हमने प्रति एकड़ ३.७ लाख का भुगतान किया है और हम विस्थापितों नौकरी देकर संतुष्ट करना चाहते हैं.
सरकार फिर से पुनर्रस्थापन और राहत पालिसी पर काम कर रही है और इसे जल्द से जल्द लागू करना चाहिए. इस्पात कंपनियों को आशा है कि इससे आदिवासी संतुष्ट होंगे तथा उन्हें भी अपनी योजना आगे बढ़ाने में आसानी होगी. पास्को जैसी कंपनियां कठिन मेहनत कर रही हैं जिससे स्थानीय लोगों को साथ लेकर चल सकें. इन कंपनियों में स्थानीय लोगों को नौकरी समेत बेहतर मुआवजा देने के बारे में उनमें काफी समंवय है.
खाद्यान्नों की प्रचुरता के कारण इस्पात कंपनियों को विश्वास है कि जब इस्पात बनना शुरू हो जाएगा तो यह शहर जर्मनी के रूर घाटी की तरह हो जाएगा. यह तथ्य इससे मजबूत होता है कि सरकार ने पेप्सीको जैसी कंपनी को उच्च स्तर का सड़क और रेलवे जैसी संरचना का निर्माण करने का जिम्मा सौंपा है. यदि ऐसा होता है तो राज्य के लोगों को ज्यादा से ज्यादा नौकरियां मिल सकेंगी और सही तौर पर यह उनकी जमीनों का मुआवजा होगा.
हालांकि माफियाओं द्वारा राजनीतिक दलों के माध्यम से इन गरीब आदिवासियों को खतरनाक माओवादी साबित करने और विदेशी निवेश से राज्य की संप्रभुता नष्ट होने जैसे मुद्दे उठाए जाने से ऐसा सोचना केवल सपना साबित होगा.

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