क्या जज कानून से ऊपर हैं? भ्रष्ट जजों को सजा दो

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाई के सब्बरवाल, ने अपने बेटों और उनके सहयोगियों के हित के लिए दिल्ली में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील करने का आदेश देकर अपने पद का दुरुपयोग किया। न्यायाधीश वाई के सब्बरवाल के बेटों ने उसके बाद 15 करोड़ रुपये का मकान खरीदा जबकि उस समय उनकी घोषित आय लाखों में ही थी। सरकार का कहना है कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के गलत कामों की जांच की जाए। इतना ही नहीं, मिडडे के जिन पत्रकारों ने इन काली करतूतों का पर्दाफाश किया उन्हें न्यायालय की अवमानना के जुर्म में उच्च न्यायालय ने जेल भेजने की सजा सुना दी।
न्यायाधीश जगदीश भल्ला के परिवार ने नोएडा में 7 करोड़ बाजार मूल्य की जमीन मात्र 5 लाख में एक ऐसे भू-माफिया से खरीदी, जिसके खिलाफ कई फौजादारी मामले उन्हीं की निचली अदालतों के तहत चल रहे थे। 'कमेटी फॉर ज्यूडिशियल एकांउटबिलिटि' द्वारा कई बार शिकायत किए जाने के बावजूद भी, कोई जांच नहीं की गई, उल्टे उन्हें हिमाचल प्रदेश में मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर दिया गया है।
पिछले दस सालों के दौरान जज नियुक्त करने की कमेटी से सलाह किये बिना और निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करके उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में कितने ही जजों की नियुक्ति, की गई है। कुछ जजों को तो, उनके खिलाफ खुफिया विभाग द्वारा भ्रष्टाचार की मजबूत रिपोर्टों के दिए जाने के बाद भी नियुक्त कर दिया गया है। सरकार कहती है कि जजों की नियुक्ति संबंधी फाइलें गुप्त हैं। तो क्या सरकार को भ्रष्ट न्यायपालिका की जरूरत है?
हाल में ही उजागर गाजियाबाद में प्रोविडेन्ट फंड घोटाले में सर्वोच्च न्यायालय के एक पीठासीन जज, उच्च न्यायालय के 13 जज और जिला अदालतों के 12 जज शामिल हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश प्रोविडेन्ट फंड में फंसे जजों से पुलिस को सीधे सवाल पूछने तक की इजाजत नहीं दे रहे हैं और पुलिस को केवल लिखित सवाल भेजने का निर्देश दे रहे हैं।
1991 में वीरास्वामी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की इजाजत के बिना किसी भी जज के खिलाफ कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। इस तरह न्यायपालिका ने किसी भी आपराधिक कार्रवाई से अपने को पूरी तरह मुक्त कर लिया है; फिर जज का अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों हो। जजों द्वारा कई बार घोर अपराध किए जाने के बावजूद मुख्य न्यायाधीश ने उनके खिलाफ एफआईआर दायर करने की इजाजत नहीं दी है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जजों की सम्पत्ति के ब्यौरे को भी सार्वजनिक करने से इंकार करते हैं। जबकि नेताओं और नौकरशाहों के लिए सम्पत्ति का खुलासा करना जरूरी होता है। फिर जजों के लिए क्यों नहीं? मुख्य न्यायाधीश का कहना है कि कोई भी स्वाभिमानी जज अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने के लिए राजी नहीं होगा, इतना ही नहीं वे तो यह भी कहते हैं कि मुख्य न्यायाधीश का पद सूचना के अधिकार के तहत नहीं आता। मजेदार बात यह है कि चुनाव लड़ने वाले नेताओं की सम्पत्ति का ब्यौरा देने का आदेश खुद सर्वोच्च न्यायालय ने दिया था। कई उच्च न्यायालयों ने सूचना के अधिकार के तहत अपने सुविधानुसार नियम बना दिये हैं, जिसमें प्रशासनिक और वित्तीय मामलों पर सूचना लेने की मनाही है। यही वजह है कि जजों या अन्य लोगों की नियुक्ति, लम्बित पड़े मामलों और यहां तक कि अदालतों के बजट के बारे में भी सूचना आम जनता को नहीं मिल रही है।

क्या न्यायपालिका की कोई जवाबदेही है?


हमारी मांगें
- एक जवाबदेह न्यायपालिका
-एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायिक आयोग, जिसे जजों को अनुशासित करने का अधिकार हो।
-आपराधिक मामलों के संदर्भ में जजों की भी जांच करने पर कोई बंधन हो। वीरास्वामी मामले में दिये गये फैसले को वापस लिया जाए।
-न्यायालय की अवमानना अधिनियम में संशोधन किया जाए।
- सूचना का अधिकार विधेयक पूरी तरह से न्यायायपालिका पर लागू हो - उनकी नियुक्तियां, पदोन्नति और सम्पत्ति सार्वजनिक किया जाए।
एक जवाबदेह न्यायपालिका के लिए हमसे जुड़ें . . क्योंकि न्याय की हम सबको जरूरत है।
कैम्पेन फॉर ज्यूडिशियल एकांउटबिलिटि एंड रिफॉर्म (न्यायिक जवाबदेही और सुधार के लिए अभियान)
वेबसाइट : www.judicialreforms.org ईमेल : judicialreforms@gmail.com

बढ़ती तोंद पिचकते पेट - गिरीश मिश्र

पूंजीवाद के विकास क्रम के वर्तमान मानदंड के तौर पर भारत आज विश्व में सबसे उर्वर माना जा रहा है। दुनिया भर में तैर रही करीब 300 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की सरप्लस पूंजी का मुंह भारत की ओर है लेकिन इस दौर में भी भारत में फैली दानवाकार सामाजिक विषमता का आकलन करता लेख
इस बात को शायद ही कोई विवेकशील व्यक्ति नकारेगा कि आजादी पाने के बाद छ: दशकों में भारत ने भारी तरक्की की है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था स्वतंत्र और काफी हद तक संतुलित है। वह उस स्थिति से निकल चुकी है जब वह ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का दुमछल्ला थी और उसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल और खनिज पदार्थ प्रदान करना तथा ब्रिटिश उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराना था। वह बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है। आर्थिक संवृद्धि की दर नौ प्रतिशत के वार्षिक आंकड़े को पारकर चुकी है और सब ठीक ठाक रहा तो वह दस प्रतिशत पर पहुंच जाएगी। आजादी के बाद से अब तक जनसंख्या में ढाई गुनी बढ़ोत्तरी के बावजूद खाद्यान्न उत्पादन लगभग चार गुना अधिक है। अकाल अतीत की बात बन चुका है। देश में भारी उद्योगों और पूंजीगत वस्तुएं बनाने वाले उद्यमों की कोई कमी नहीं है। देश महामारियों से लगभग मुक्त है तथा इलाज की बेहतर सुविधाएं मौजूद हैं। देश में तकनीकी शिक्षा प्राप्त लोगों की एक बड़ी जमात है। आधुनिकतम शिक्षण संस्थाएं पढ़ाई-लिखाई और शोधकार्य को लेकर विश्वभर में प्रशंसा पा रही हैं।
उपर्युक्त उपलब्धियों के बावजूद कतिपय खामियां हैं जिनको दूर करने के लिए जल्द कदम उठाए जाने चाहिए नहीं तो हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ सकती है। आजादी की लड़ाई के समय से ही यह वादा बार-बार दुहराया जाता रहा है कि स्वतंत्रता के बाद समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता तथा क्षेत्रीय असंतुलन को यथा संभव कम करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। कहना न होगा कि इस वादे को पूरा करने में हमारा गणतंत्र विफल रहा है और जब ये भूमंडलीकरण के तहत आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है तब से विफलता का रूप भयावह होता जा रहा है। नक्सली आंदोलन, 'मुंबई, मुंबई वालों के लिए' का नारा, असम में हिन्दी भाषी लोगों की हत्याएं आदि किसी न किसी तरह इसी विफलता को इंगित करते हैं। अपहरण, हत्या, डकैती, भ्रष्टाचार आदि में वृद्धि के पीछे भी यही तथ्य किसी न किसी रूप में है।
अभी चंद हफ्ते पहले एशियाई विकास बैंक की एक रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया है कि 1980 तक भारत की आर्थिक संवृद्धि की दर अपेक्षाकृत धीमी थी और सामाज में आर्थिक विषमता भी कम थी। इस आर्थिक विषमता में बहुत कम वृद्धि हो रही थी। किन्तु 1990 के दशक से आर्थिक संवृद्धि की दर के बढ़ने के साथ ही आर्थिक विषमता में तेजी से वृद्धि हो रही है। उसने रेखांकित किया है कि इस बढ़ती आर्थिक विषमता का आधार यह पारंपरिक मान्यता नहीं हैकि धनी पहले की अपेक्षा अधिक धनवान और गरीब अधिक निर्धन हो रहे हैं। वस्तुत: दोनों धनवानों और गरीबों को आर्थिक संवृद्धि का फायदा मिल रहा है मगर गरीबों की तुलना में धनवानों को आर्थिक संवृद्धि के फल में लगातार अधिकाधिक हिस्सा मिलता जा रहा है। इसका असर इस तथ्य से उजागर होता है कि जहां सबसे धनी बीस प्रतिशत भारतीय परिवारों के केवल पांच प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन वाले हैं वहीं सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों में यह अनुपात 28 प्रतिशत है। कहना न होगा कि इस अंतर का मुख्य कारण आय की विषमता है।
आज जब हम अपने गणतंत्र की महानता और जनतांत्रिक उपलब्धियों की चर्चा करते नहीं थकते हैं तब हमें नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार भी तीस करोड़ भारतीय गरीबी में जी रहे हैं और 40 करोड़ अपना नाम भी नहीं लिख सकते यानी पूरी तरह निरक्षर हैं।
प्रतिष्ठित अमेरिकी समाचार पत्र 'वाशिंगटन पोस्ट' (20 अगस्त) के अनुसार बहुराष्ट्रीय निगमों और आउटसोर्सिंग से जुड़ी भारतीय कंपनियों में 86 प्रतिशत प्रौद्योगिक कर्मी उच्च जातियों और धनी मध्यवर्ती जातियों के हैं। दलित जातियों तथा अति पिछड़े वर्गों के इक्के-दुक्के ही हैं। इतना ही नहीं, अमेरिका और ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों में भी उच्च जातियों का वर्चस्व है क्योंकि साधन संपन्न होने के कारण वे ही आधुनिक शिक्षा सुविधाओं का लाभ उठाते हैं और कार्य एवं शिक्षा के लिए जरूरी वीजा तथा हवाई यात्रा का खर्च उठा पाते हैं। इसी पत्र ने यह शोचनीय तथ्य उजागर किया है कि वर्ष 2006 में पाया गया कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मी देश के एक तिहाई दलित गांवों में नहीं जाते और 24 प्रतिशत दलितों को डाकिए चिट्ठी आदि नहीं पहुंचाते।
आर्थिक विषमता को मापने के लिए सांख्यिकी में 'गिनी गुणांक' का इस्तेमाल किया जाता है। यदि यह गुणांक 100 है तो पूर्णतया आर्थिक समानता और शून्य है तो पूर्णतया आर्थिक विषमता होती है। शून्य में सौ की और ज्यों-ज्यों बढ़ते हैं त्यों-त्यों विषमता कम होती जाती है। जहां तक भारत का सवाल है, वर्ष 1993 में गिनी गुणांक 32.9 था जो 2004 में बढ़कर 36.2 हो गया। कहना न होगा कि हमारे यहां आय की विषमता काफी है और उसमें ग्यारह वर्षों में मामूली सी कमी आई। इस स्थिति को तभी बदला जा सकता है जब सरकार की भूमिका कारगर हो और वह धनवानों से पैसे करों के जरिए प्राप्त कर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर पैदा करने पर खर्च करे। ऐसा हो सकेगा इसमें संदेह है क्योंकि वाशिंगटन आम राय पर आधारित भूमंडलीकरण के तहत वर्ष 1991 से लागू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रम राज्य की भूमिका को बढ़ाए जाने के विपरीत हैं।
हमारे यहां आर्थिक विषमता कई रूपों में दिखती है। शहरों और गांवों के बीच विषमता है। शहरी लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं ग्रामीण जन की अपेक्षा कहीं अधिक प्राप्त हैं। इतना ही नहीं, बल्कि शहरों में रोजगार के अवसर विविध रूपों में विद्यमान हैं जबकि गांवों में रोजगार के अवसर कृषि कार्य से मुख्यरूप से जुडे होते हैं जिससे वे न तो पूरा वक्री होते हैं और न ही मजदूरी की दर ऊंची होती है। इसके अतिरिक्त गांवों में जातिगत भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है जब कि शहरों में इस प्रकार के भेदभाव बहुत कम दिखते हैं। साथ ही धनी और गरीब राज्यें के बीच आय की विषमता के चरित्र में फर्क होता है। हरियाणा, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि में बसने वाले गरीब इतने बेहाल नहीं हैं जितने उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में रहने वाले। पूर्वोतर राज्यों में नए देशी-विदेशी निवेश आ रहे तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन की क्षमताओं का निर्माण होने से रोजगार के नए अवसर खुल रहे हैं। इतना ही नहीं, वहां प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षण संस्थाओं की स्थिति बेहतर है तथा स्वास्थ्य सेवाएं भी सार्वजनिक क्षेत्र में अच्छी स्थिति में हैं। राज्य द्वारा नए सार्वजनिक उपक्रमों को लगाने से हाथ खींचने तथा अनेक स्थापित उपक्रमों को बेचने के कारण रोजगार के अवसरों की उपलब्धता घटी है। सेवाओं के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर आए या आ रहे हैं उनका लाभ उन्हें ही मिल रहा है जिनके पास उच्च शिक्षा और कौशल है जिन्हें धनवानों के बच्चे ही आमतौर से प्राप्त कर पाते हैं।

आर्थिक भूमंडलीकरण और न्याय तक पहुंच - उपेंद्र बख्शी

एक ऐसे दौर में जब राजनीति बाजार को बढ़ावा दे रही है और न्यायपालिका भी खुद को उसी सांचे में ढाल रही है, ऐसे में गरीबों के लिए तो कोई अवसर हीं नहीं बचा है। राजनीति और न्यायपालिका बाजार अर्थव्यव्यवस्था की जरूरतें पूरी कर रही हैं ताकि अरबपतियों के और ज्यादा अमीर बनने के 'अधिकारों' की रक्षा हो सके तो दूसरी ओर गरीब और ज्यादा गरीब बने रहें। 'बाजार अर्थव्यवस्था में समान भागीदारी और समानता' पर इंडियन लॉ इंस्टीटयूट के गोल्डन जुबली समारोह में उपेंद्र बख्शी का व्याख्यान ................

'बाजार अर्थव्यवस्था' जैसी है, वैसी दिखती नहीं है। इसे पूरी तरह समझने के लिए हमें उत्पादन और प्रलोभन में अंतर समझना होगा। उत्तर आधुनिक काल के फ्रांसीसी विचारक ज्यां ब्रादिया ने अपने एक निबंध 'द मिरर ऑव प्रोडक्शन' में इस अंतर को स्पष्ट किया है : उत्पादन अदृश्य वस्तुओं को दृश्य बनाता है और लालच दृश्य वस्तुओं को अदृश्य कर देता है, हमें निश्चित रूप से यह सवाल उठाना चाहिए कि आज के 'सुधारों के युग' में भारतीय संविधान ने क्या बनाया, जिसे लालच ने बिगाड़ दिया।
संविधान निर्माताओं ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के बीच कई अंतर्विरोधों को पठनीय बना दिया, आंबेडकर ने भी 'विरोधाभासों से भरा जीवन' पर अपने भाषण में सर्वोच्च न्यायालय की भरपूर प्रशंसा की। उपनिवेशी शासन से मुक्त होने के बाद भारत में अन्तर्विरोधों से भरे समान सामाजिक विकास के मूल्यों की ञेषणा के साथ संविधान में अनुच्छेद 31 के तहत 'संपत्ति का अधिकार' भी जोड़ दिया गया।
अगर हम संविधान में किये गए 1 से 44 तक के संशोधनों और न्यायालय द्वारा की गई व्याख्याओं पर नजर डालें तो हमें यह साफ दिखाई देगा कि किस तरह राज्यों के नियमों के तहत भागीदारी और समानता के नाम पर उत्पादन के साधनों पर निजी संपत्ति अधिकार लागू कराने की कोशिशें की गईं। पर अन्त में 44वें संविधान संशोधन द्वारा इसे समाप्त कर दिया गया, सच में खत्म हुआ या फिर इसे संवैधानिक अधिकार के स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। यहां मैं यह पूरी कहानी बयां करने नहीं जा रहा हूं, बल्कि यह याद दिलाने की कोशिश कर रहा हूं कि संवैधानिक व्याख्या के पहले दशकों में सर्वोच्च न्यायालय ने जो कुछ भी कहा था अब वह अपने ही दिये गए फैसलों से मुकर रहा है। पहले दिये गए फैसलों में मौलिक अधिकारों के सामने सभी करारों और संपत्ति को नगण्य बताया था। मैं ऐसे पांच उदाहरण दे सकता हूं, जिसमें न्यायालय का बदला हुआ रूप साफ दिखाई देता है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मूल्य, गरीब और पिछड़े लोगों के मौलिक अधिकार, नीति-निर्देशक तत्व और नागरिकों के मूल कर्तव्य सब कुछ नीति-निर्माताओं और न्यायाधीशों ने मिलकर खत्म कर दिया है। हमारे नीति- निर्देशक तत्व खासतौर पर संवैधानिक विकास की तस्वीर बनाने के लिए संविधान में रखे गए थे जो आज के आर्थिक सुधारों के दौर में फिट नहीं हो रहे हैं।
एक समारोह में भाग लेते समय, बहुत से लोगों ने हमारे से यह सवाल पूछा कि क्या भारतीय कानूनी शिक्षा, शोध, व्यवसाय और यहां तक कि न्यायपालिका वैश्विक बाजार की जरूरतों को पूरा कर पाएगी?
सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहूंगा कि 'न्याय तक पहुंच' (एक्सेस टू जस्टिस) शब्द उतना ही रहस्यवादी है जितना कि 'वैश्विक अर्थव्यवस्था'। जिन लोगों ने डब्ल्यूटीओ की विफल हुई दोहा वार्ताओं को देखा है वे जरूर इस बात से सहमत होंगे। इस वार्ता में 'नॉन एग्रीकल्चर मार्केट एक्सेस' (नामा)भी शामिल था, जिसका मुख्य लक्ष्य था कि मुक्त बाजार पर सभी प्रकार के शुल्क संबंधी और गैर शुल्क सम्बंधी प्रतिबंधों को सभी देश हटा लें। जैसा कि हम सभी को पता है कि 'अमेरिका की जीरो टैरिफ कोएलिशन' जिसके एक कर्मचारी डॉव केमिकल्स से थे, ने मांग की कि बहुत से क्रूशियल सेक्टरों में जीरो टैरिफ कर दिया जाए। इनमें खेल का सामान, खिलौने, लकड़ी की मशीनें और लकड़ी का सामान भी शामिल था। कुछ आलोचकों ने नामा को कंपनियों के लिए एक ऐसा स्वप्निल वाहन बताया जो पूरी दुनिया में करों और नियमों को कुचल रहा है। जैसा कि हमें पता है जी-90 ने भी खतरे के लिए भय व्यक्त किया था कि कहीं मुक्त अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता छोटे उद्योगों और छोटी फर्मों को खत्म न कर दे। उन्हें यह भी डर था कि जीरो टैरिफ आगे चलकर अनौद्योगीकरण, बेकारी और गरीबी जैसे संकट पैदा कर देगा। वैश्विक पूंजी से प्रोत्साहित होकर 'नामा' की प्राकृतिक संसाधनों की खोज विनाश का मिशन न बन जाए।
असल में 'वैश्विक अर्थव्यवस्था' की धारणा 'वैश्विक पूंजी' द्वारा लूट के नये तरीकों को परिभाषित करती है। भूमंडलीकरण का मतलब नए तरह का उपनिवेशवाद है, इसके पुराने रूप में प्रदेशों, साधनों और लोगों पर हुकूमत साफ तौर पर दिखाई तो देती थी, लेकिन अब नए रूप में तो कुछ भी दिखाई नहीं देता, सब कुछ अदृश्य रूप से हो रहा है, जो और भी ञतक है।
वर्तमान भूमंडलीकरण के कई रूप हैं, लेकिन इनमें कानूनी और न्यायिक भूमंडलीकरण की मुख्य भूमिका है। कानूनी भूमंडलीकरण में कई बाते हैं। यह कानूनी नौकरियों के लिए विश्व बाजार में एक 'प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बनाता है और महानगरीय कानूनी व्यवसाय को आधुनिक भी बनाता है। इस प्रक्रिया में कुछ प्रतिष्ठत राष्ट्रीय लॉ स्कूलों के वाइस-चांसलर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे संवैधानिक बदलाव, आर्थिक नीति और कानून में सुधार आदि के मामलों में सलाह देने के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों को कॉरपोरेट ढंग से काम करने के लिए भी तैयार करते हैं।
कानूनी भूमंडलीकरण नए कानूनी सुधार के एजेंडे को भी व्यक्त करता है जो आर्थिक भूमंडलीकरण के तीन 'डी' डीनैशनलाइजेशन (विराष्ट्रीयकरण), डिस-इंवेस्टमेंट (विनिवेश) और डीरेग्युलेशन (विनियमन) को साकार कर रहा है। इस एजेंडे में खासतौर पर नई कार्यान्वयन संस्थाओं, प्रक्रियाओं, और संस्कृतियों को अपने ढंग से मोड़ना, विवादों के वैकल्पिक निर्णय पर जोर देना, निवेश और व्यावसायिक कानूनों को सरल बनाना है। इसका झुकाव 'श्रम बाजार' के लचीलेपन को बढ़ावा देने की ओर है। कानूनी सुधारों में न्यायिक प्रशासन की कार्यकुशलता खासतौर पर नई आर्थिक नीति का यंत्र नजर आती है। 'फॉर ग्लोबलाइजेशन' नाम की इस प्रक्रिया ने कई महत्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन किये हैं, जैसे- रोजगार गारंटी योजना अधिनियम, बाल श्रम कानूनों को लागू करना, उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा-व्यवस्था और सूचना का अधिकार। संक्षेप में कहें तो कानूनी भूमंडलीकरण्ा भारत के नए उभरते मध्य वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ जरूरतों को बढ़ावा भी दे रहा है।
मुझे यकीन है कि इस नए विषैले न्याय की वैश्विक सामाजिक उत्पत्ति पर सवाल जरूर उठेंगे कि वैश्विक स्तर पर न्याय पर बात करने वाले कौन से दबाव, मैनेजर और एजेंट हैं? हम उनकी असली मंशा कैसे जान सकते हैं? मुझे तो यह बिल्कुल साफ नजर आ रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय और प्रांतीय वित्तीय संस्थाएं, अमेरिका, यूरोपीय संञ्, जापान और बुरी तरह से ञयल हुआ डब्ल्यूटीओ, इनका एक ही मकसद है कि तीसरी दुनिया के श्रम और पूंजी बाजार में ञ्ुसपैठ करना ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के लिए साफ-सुरक्षित रास्ता तैयार हो सके।
न्यायिक भूमंडलीकरण के संदर्भ में मैं 'एक्सेस' शब्द के दु:खद पहलू पर रोशनी डालना चाहता हूं। न्यायिक भूमंडलीकरण विषय पर उपलब्ध थोड़े बहुत साहित्य से यह पता चलता है कि यह दुनिया के शीर्ष न्यायालयों और न्यायाधीशों के बीच सौहार्द और सहयोग की नयी व्यवस्था है। पहली नजर में, इस बात पर प्रश्न उठता है कि शीर्ष न्यायाधीशों को एक दूसरे के साथ मिलकर उनकी उपलब्धियों को जानना चाहिए या फिर उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक न्याय के कामों का पालन करते हुए 'सहकारी समाज' बन जाना चाहिए। अक्सर साधारण सी दिखने वाली बातों में कुछ बड़ा एजेंडा छिपा होता है। न्यायिक सौहार्द अक्सर आधिपत्य और कभी-कभी तो सामान्य प्रभुत्व में रंगा होता है।
उदाहरण के तौर पर भोपाल गैस कांड में जज कीनान ने कहा कि यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के कारण हुए महाविनाश की इस जटिल परिस्थिति के बारे में निर्णय लेने में 'भारतीय न्यायालय' सक्षम नहीं है। इस सारे प्रकरण्ा में खास बात यह थी कि हानि के लिए भरपाई 'शेष प्रक्रिया' पूरी होने पर ही की जाएगी और यह कार्रवाई भारत के 'स्माल कॉजिज कोर्ट' निचली अदालतों की बराबरी करने वाले 'न्यूयॉर्क' कोर्ट द्वारा की जाएगी और उसी कोर्ट को कहा गया है कि वह निर्णय ले कि इस सबके लिए भारतीय सर्वोच्च न्यायालय योग्य है या नहीं? संक्षेप में, न्यायिक भूमंडलीकरण का मतलब है दक्षिण के सर्वोच्च न्यायालयों पर उत्तर के न्यायालयों का प्रभुत्व।
'गुड गवर्नेंस' की धारणा भी न्यायिक भूमंडलीकरण का ही रूप है, जिसमें सरकारी और अंतर्शासकीय सहायता और विकास एजेंसियों के तहत निर्णय में सुधार शामिल है। ऐसी खास एजेंसियां अक्सर कानूनी सुधारों और न्यायिक प्रशासन को अपने हाथ में ले लेती हैं और उन्हें अपनी ही आर्थिक और स्ट्रेटेजिक जरूरतों के मुताबिक ढाल लेती हैं। खासतौर पर व्यापारिक उदारीकरण, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, कम्पनी टाउन की स्थापना, मुक्त व्यापार आर्थिक क्षेत्र और लचीला श्रम बाजार जैसे मामलों में न्यायिक रूप से स्वयं को नियंत्रित करने को बढ़ावा देती हैं।
'ढांचागत समायोजन' एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं सहारा लेकर उन देशों की आजादी को निगल रही हैं जो कभी साम्राज्यवादी ताकतों के गुलाम रह चुके हैं। यह व्यवस्था न्यायिक शक्ति सामर्थ्य और प्रक्रिया से भी परे है। मुझे तो लगता है कि विश्व बैंक अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, यूएनडीपी और इनसे जुड़े 'गुड गवर्नेंस' के कार्यक्रम सभी 'न्यायिक सक्रियतावाद' को बढ़ावा दे रहे हैं। ये सभी न्यायिक व्याख्याओं फैसलों और शासन के सभी रूपों को बाजार सहयोगी और व्यापार-संबंधी बनाना चाहते हैं। न्यायिक नीति की आधार 'मैक्रो-इकॉनोमिक पॉलिसी' से जुड़े न्यायिक प्रतिबंधनों को पहले से ही 'हाइपर- ग्लोबलाइज' हुए 'इंडियन एपिलेट बार' ने अपने ढंग से ढाल दिया है। न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया का जो हाल है उसने तो 'भारतीय भूमंडलीकरण के आलोचकों' के मनों से न्यायपालिका के प्रति सम्मान ही खत्म कर दिया है।
संक्षेप में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि न्याय सुलभता (न्याय तक पहुंच विषय पर विचार) समस्या बनी रहेगी, समाधान नहीं। इसका हल ढूंढने के लिए कुछ सवालों के जवाब खोजने होंगे- हम ज्यूडिशियल एक्सेस को ही डी-ग्लोबलाइज कैसे कर सकते हैं, जबकि देश में समुद्रपारीय पूंजी से कामगार वर्ग की जीविका और सम्मान के अधिकारों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता? हम यह कैसे मान सकते हैं कि नए ग्लोबल शहरों और सेज जैसे एंक्लेव को बनाकर विस्थापित और पीड़ित शहरी लोगों को पहले जैसे ही मानव अधिकार बहाल किये जाएंगे? हम अपने लोकतंत्र और संविधान में गुड गवर्नेंस' जैसी बाहरी उधार ली हुई धारणा को कैसे अपना सकते हैं? निर्वाचित और गैर- निर्वाचित (न्यायाधीश) अधिकारियों के शासन में नई आर्थिक नीति निष्पक्ष मानव अधिकारों को लागू करने में कितनी प्रभावशाली साबित होगी, हम कैसे न्यायपालिका की गरिमा को फिर से वापस ला सकते हैं? अंत में मैं ज्याँ फ्रास्वाँ ल्योता के शब्दों को दोहराना चाहूंगा। उन्होंने कहा था : ''हम इतिहास के उन सबसे बुरे प्रभावों को खोजने के लिए जरूरतों के आधार में गिरावट को कैसे समझ सकते हैं, जो सच्चाई की पूरी और कठोर तस्वीर के निर्माण का विरोध करते हैं... (जो केवल सुनते हैं)... अस्पष्ट भावनाओं, नेताओं के दम्भ, कामगारों का दुख, किसानों का अपमान और शासित लोगों का गुस्सा और विद्रोह की ञ्बराहट, यही ञ्बराहट फिर से वर्गीय अव्यवस्था को दावत देती है। ''जस्टिस गोस्वामी ने एक बार सर्वोच्च न्यायालय के बारे में कहा था कि यह ञ्बराए और सताए लोगों का आखिरी सहारा है। शायद ग्लोबलाइज हुए भारतीय न्यायालय को फिर से अपनी खोई न्यायिक गरिमा को बरकरार रखने की जरूरत है। (पीएनएन- काम्बैट लॉ)

न्यायपालिका में सुधार जरूरी -प्रशांत भूषण

आज का एक बड़ा सच है कि हमारी न्याय व्यवस्था अमीर पक्षधर हो गयी है, ऐसे में गरीबों को न्याय बमुश्किल ही मिल पाता है। यही कारण है कि आज गरीबों के अधिकार छीने जा रहे हैं और देश के धनी कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। देश के ज्यादातर लोगों के लिए न्यायपालिका, न्याय के माध्यम के रूप में काम नहीं कर रही है. ऐसा लगता है कि न्यायपालिका का एक बड़ा हिस्सा इसके उलट उन व्यापारिक हितों के पक्ष में काम कर रहा है जो सरकार को अपने इशारों पर नचा रहे हैं। यही वजह है कि जब शक्तिशाली लोगों या सरकार द्वारा गरीबों के अधिकार कुचले जाते हैं तो न्यायपालिका के आदेश भी अक्सर उन अधिकारों को बहाल करने की बजाय गरीबों को अधिकारों से वंचित करते हैं। हाल में हुए कुछ फैसलों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अदालतों का दृष्टिकोण तो कॉरपोरेट हितों के हिसाब से चल रही सरकार के रवैये से भी ज्यादा तंग हो गया है, गरीबों पर रोज होने वाले जुल्म और अन्याय से न्यायपालिका को कोई फर्क नहीं पड़ता।
देश की बड़ी आबादी गरीब है और जिसकी न्यायिक व्यवस्था तक पहुंच ही नहीं है। जटिल न्याय व्यवस्था, बड़े खर्चे के चलते हमारी न्याय व्यवस्था देश के आधे से अधिक गरीबों की पहुंच से बाहर है। न्यायाधीश वकीलों के बिना कानून की भाषा भी नहीं समझ सकते और वकीलों को देने के लिए उनके पास मोटी रकम भी नहीं होती। आज की शासन व्यवस्था में कोई गरीब न तो अपना बचाव कर सकता है और न ही माफी की उम्मीद कर सकता है। यही कारण है कि ट्रायल के दौरान जितना समय वह सलाखों के पीछे गुजार देता है, वह सजा वास्तविक गुनाह की सजा से कहीं ज्यादा होती है।
न्यायाधीशों की गरीब विरोधी विचारधारा और एक समूह विशेष के हितों का ध्यान रखने वाली नीति, कानून तक गरीबों के न पहुंच पाने से भी ज्यादा शर्मनाक है। कभी-कभी तो इनके फैसले इतने गरीब विरोधी होते हैं कि उद्योग घरानों के एजेंट के रूप में काम कर रही सरकार को भी पीछे छोड़ देते हैं। जब-जब गरीबों की अस्मिता को खतरा होता है, न्यायालय इन मामलों में सुनवाई नहीं करता और दूर से ही तमाशा देखता है। जब गरीब की रोटी (आजीविका) को छीन लिया जाता है तो न्यायालय पुनर्वास के लिए कोई आदेश नहीं देता और न ही उनके मामलों की सुनवाई करता है। न्यायालय के पास झुग्गियों को उजाड़ने के बहाने कई होते हैं, कभी तो इन्हें गैरकानूनी बताकर उजाड़ा जाता है और कभी यह कहकर कि ये यमुना के किनारे हैं, या इनसे पर्यावरण को खतरा है गरीबों को बेघर कर दिया जाता है। दूसरी ओर जब इन्हीं यमुना के किनारों पर 'शॉपिंग मॉल' व 'अक्षरधाम मंदिर' बनाए जाते हैं तो न्यायालय सभी फिल्मी डायलॉग भूल जाता है। इसी तरह फेरीवालों और रिक्शा चालकों के प्रति न्यायालय हमेशा बेरहम ही रहा, उनकी रोजी-रोटी का कोई इंतजाम किए बिना न्यायालय ने इन्हें गैरकानूनी करार दे दिया।
न्यायपालिका ने 'श्रम सुरक्षा कानून' को धीरे-धीरे खत्म कर डाला और उसने 'कॉन्ट्रेक्ट श्रम अधिनियम' को लागू करने से मना कर दिया। इन्हीं अधिनियमों में चतुराई के साथ व्यावसायियों के हित में फेरबदल कर लागू कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने तो एक फैसले में यहां तक कहा कि श्रम कानून को सरकार द्वारा बनाई गई आर्थिक नीतियों के अनुसार ही होना चाहिए। ऐसा कह कर सर्वोच्च न्यायालय ने वह कर दिखाया जो संसद में अपना चेहरा बचाने को ही सरकार शायद कभी नहीं कर पाती।
इसी तरह का एक और पक्षपात भरा रवैया गरीबों के प्रति भी देखने को मिला जब हमने नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में कोर्ट के आदेशों का विश्लेषण किया। अक्सर गरीब और कमज़ोर तबके के लोगों की ज़मानत याचिकाओं पर सालों सुनवायी नहीं होती जबकि शक्तिशाली और पैसेवालों के मामले, जिनकी पैरवी बड़े वकील कर रहे होते हैं, पर तुरंत कोर्ट की नज़रें इनायत हो जाती हैं। यहां तक कि विनायक सेन जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रति भी कोर्ट का रवैया ढुलमुल रहा और उनकी ज़मानत याचिका रद्द कर दी गयी जबकि तस्करों और सफेदपोशों को ज़मानत देने में कोई हिचक नहीं दिखाई।
देश के नागरिकों के लिए वक्त आ गया है कि वे अपने न्यायिक तंत्र की फिर से समीक्षा करें. एक जनप्रिय न्यायिक तंत्र वह है जिसकी आम नागरिक तक पहुंच बिना किसी पेशेवर वकील की मध्यस्थता के हो सके। क़ानून और इसकी प्रक्रियाएं सरल होनी चाहिए ताकि ये आम लोगों की समझ में आसानी से आ सके और लोगों तक इसकी पहुंच भी बढ़ सके। कोर्ट की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग होनी चाहिए और इसके आंकड़े सूचना का अधिकार क़ानून के तहत आम नागरिक को सुलभ होना जरूरी हो। हाल ही में प्रस्तावित ग्राम न्यायालय इस दिशा में सही क़दम प्रतीत होता है।
सबसे महत्वपूर्ण है जन अदालतों को संचालित करने वाले जजों की नियुक्तियों में पारदर्शिता, जिसमें जनता की सहभागिता सबसे ज्यादा हो। यह देखना होगा कि जिस व्यक्ति की नियुक्ति की जानी है उसका सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण हमारे संविधान के सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से मेल खाता है या नहीं और साथ ही उसके मन में गरीबों के प्रति गहरी समझ और संवेदना भी होनी चाहिए। इसके लिए हमें एक न्यायिक नियुक्ति आयोग की दरकार है जिसके सदस्य जज न हों। इसमें जनता की पूर्ण भागीदारी की इजाजत हो जो कि लोकतंत्र का मूलभूत आधार भी है।
न्यायाधीशों के आचरण, अपराध, मूल्यांकन, मामलों से निपटने के तरीकों आदि पर पैनी नजर रखने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए। एक ऐसे स्वतंत्र न्यायाधिकरण की स्थापना करनी पड़ेगी जो न्यायाधीशों के बर्ताव की जांच करे और इन पर कड़ी नजर रखे। अक्सर सरकार के आधिकारिक सम्मेलनों में भी स्वीकार किया जाता है कि न्यायिक व्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर है। बहरहाल सिर्फ निर्णय देने की गति को बढ़ा कर गरीबों के लिए प्रभावी न्यायिक तंत्र नहीं बनाया जा सकता. इसके लिए हमें पूरी व्यवस्था को फिर से खड़ा करना होगा. ऐसे क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए देश में एक सशक्त जन आंदोलन की आवश्यकता होगी. यद्यपि यह अभी काफी दूर की बात है लेकिन इस मुद्दे पर जनता के बीच बहस-विचार की शुरुआत होनी चाहिए। अब तो वर्तमान न्यायिक तंत्र की बड़ी शल्य क्रिया की आवश्यकता है। (पीएनएन)

माकपा को नंगा करती केरल में चेंगेरा की जमीनी लड़ाई -मीनाक्षी अरोरा

केरल के पतनमदित्ता जिला के ब्लाक कोनी में चेंगेरा प्लांटेशन क्षेत्र में 5000 दलित परिवारों ने सत्तारूढ़ सीपीएम सरकार के 'भूमि सुधार' कार्यक्रमों के ऊपर सवाल उठाते हुए 'हेरीसेन मलयालम' को दी गयी प्लान्टेशन की हजारों एकड़ भूमि पर अगस्त 2007 में अपना कब्जा कायम कर लिया है। आखिर इतने वर्षो से इन दलित परिवारों के बीच यह आस बनी हुई थी कि केरल में हुए बेहतरीन भूमि सुधार कार्यक्रमों का लाभ उन्हेें भी मिलेगा। परन्तु यह ख्वाब, ख्वाब ही रह गया तथा खेतिहर मजदूरों और प्लान्टेशन मजदूरों को भूमि सुधार कार्यक्रमों से सुनियोजित ढंग से बाहर रखा गया।
चेंगेरा के हेरीसन मलयालम एस्टेट, जिसे लाहा एस्टेट भी कहा जाता है, में पिछले चार महीनों से जमीनी हक के लिए संघर्ष चल रहा है। यह संघर्ष उन 5,000 परिवारों का है जो खेती की जमीनों पर अपना हक मांग रहे हैं। इन सबने मिलकर लाहा एस्टेट में एक प्रतिज्ञा ली है, जिसे 'चेंगेरा प्रतिज्ञा' का नाम दिया है। केरल के पथनमदित्ता जिले के चेंगेरा में बेघर दलितों और आदिवासियों ने 4 अगस्त 2007 को यह संघर्ष शुरू किया था।
बंगाल में नन्दीग्राम और केरल में चेंगेरा, दोनों ही प्रदेशों में सीपीएम की हुकूमत और दोनों ही प्रदेशों में दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं की जमीन पाने के लिए भूमि सुधार की मांग जंग के साथ जारी है। जहाँ एक ओर नन्दीग्राम में वाम सरकार ने अपने ही सिध्दान्तों, नीतियों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास बतौर गिरवी रख दिया है तथा विकास की नई परिभाषा ''कृषि नहीं औद्योगिक विकास'' की व्याख्या की है, वहीं चेंगेरा में दलितों ने भूमि पर दखल कर ठीक इसके विपरीत विकास को पुन: परिभाषित किया है।
जमीन के मालिकाना हक के लिए सरकार की वादा खिलाफी की वजह से आंदोलनरत 20,000 से ज्यादा लोगों ने हेरीसन मलयालम प्राइवेट लिमिटेड एस्टेट में घुसकर रहना शुरू कर दिया है। उनकी मांग है कि खेती की जमीनों का मालिकाना हक हेरीसन कंपनी से लेकर उन्हें दिया जाए। 'साधुजन विमोचना संयुक्तवेदी संघर्ष समिति' संघर्ष का नेतृत्व कर रही हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ता रोमा कहतीं हैं कि इन दलित परिवारों ने राजसत्ता को सीधे-सीधे चुनौती दे दी है कि या तो हमें जमीन दो, नहीं तो गोली। इस आन्दोलन में बड़ी तेज़ी से और भी दलित परिवार शामिल होते जा रहे हैं जो ''हेरीसन मलयालम'' कम्पनी को लीज पर दी गयी रबर प्लान्टेशन वाली भूमि को लेकर सवाल उठा रहे हैं। ये दलित परिवार भूखे, प्यासे मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से भी जुझते हुए अपने सर्ंञ्ष को जारी रखे हुए हैं। इनके सर्ंञ्ष को रोकने के लिए पुलिस ने चारों ओर से नाकेबंदी कर दी है। बीमार लोग अपना इलाज कराने अस्पताल तक नहीं जा सकते। बच्चे संघर्ष के चलते अपने बुनियादी मौलिक-अधिकार यानि शिक्षा से भी वंचित है, अन्य मूलभूत सुविधाओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
केरल देश का ऐसा प्रदेश है जहां प्रति व्यक्ति आय रु 25,764 है, यही एक ऐसा प्रदेश है जहां पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 1058 है जो कि देश में सबसे ज्यादा बेहतर है। जीडीपी 9.2.फीसदी है जो कि देश में सबसे ज्यादा है। लेकिन क्या केरल के दलित, आदिवासी एवं अन्य गरीब तबके भी इस तथाकथित 'केरल शाइनिंग' की गिनती में कहीं आते हैं ? चेंगेरा में आकर ऐसा बिल्कुल प्रतीत नहीं होता। 1966 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार केरल में 10 लाख एकड़ भूमि आबंटन हेतु उपलब्ध थी, परन्तु अभी तक 4 लाख एकड़ भूमि ही भूमिहीनों को आबंटित हो पायी है, दलितों के पासभूमि औसतन0.43 एकड़ है जबकि अन्यों के पास 0.86 एकड़ है।
यह आंदोलन अभी तक हमलों, धमकियों, अकाल, आपदाओं और भूख की मार झेल रहा है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और एस्टेट के कामगारों की धमकियों के बावजूद भी बेघर दलित और आदिवासी परिवार एस्टेट में डटे हुए हैं। हैरीसन कंपनी ने यह जमीन 99 सालों के लिए पट्टे पर ली थी। अब उसकी समय सीमा खत्म होने के बावजूद भी कंपनी जमीन पर अपना कब्जा जमाए हुए है। इसीलिए स्थानीय लोग तुरंत उस जमीन को वापस लेना चाहते हैं। इतना ही नहीं कंपनी ने असल में जितनी जमीन पट्टे पर ली थी उससे 1048 एकड़ से भी ज्यादा पर कब्जा कर लिया है। एसजेवीएसबी के अध्यक्ष लाहा गोपालन ने बताया कि यह जमीन वहां के स्थानीय जमींदार ने एक परिवार को केले की खेती के लिए34 सालों के लिए पट्टे पर दी थी। जब इस परिवार ने हैरीसन कंपनी को यही जमीन 99 सालों के लिए पट्टे पर दे दी तो पहले वाला समझौता खत्म हो गया था। कंपनी ने 6000 हेक्टेयर के लगभग अतिरिक्त जमीन अपने कब्जे में ले ली है।
बड़े अफसोस की बात है कि हाल में सामाजिक विकास के क्षेत्र में केरल की लोक प्रसिध्द उपलब्धियों पर जब बड़ी-बड़ी चर्चाएं की गर्इं तो गंदी, अस्थायी झोपड़ियों, फुटपाथों पर रहने वाले बेघर लोगों का कहीं कोई जिक्र तक नहीं आया। भूमि सुधार अधिनियम, जिसे बनने के 15 साल बाद लागू किया गया था, के बावजूद भी ये बेबस लोग जमीनों से बेदखल हैं। जबकि लोगों को यही बताया जा रहा है कि केरल में जमीन के सवाल को लेकर होने वाली समस्या को सुलझा लिया गया है। 1970 के भूमि सुधार का केंद्र भी छोटे किसान और खेतिहर मजदूर थे, लेकिन इन दलितों और आदिवासियों को तो उससे भी कुछ फायदा नहीं हुआ।
अब तो आलम यह है कि जमीन सहित सभी संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना कब्जा जमाए हुए हैं। पिछले दस सालों में बनी नीतियों और कानूनों ने जमीन पर कंपनियों को कब्जा देने में विशेष भूमिका निभाई है, अगर जमीन के सवाल को दलितों और आदिवासियों के इज्जत से जीने के अधिकार से जोड़कर देखा जाए तो तथ्य साफ तौर पर उभरकर आते हैं कि राज्य कहां खड़ा है?
चेंगेरा के दलित लोगों को सत्तारूढ़ वामदल के एक्टिविस्ट लगातार धमकियां दे रहे हैं। इनमें सीपीआई-एम की व्यापार संघ संगठन सीटू (सीआईटीयू) भी शामिल है। सीटू ने दावा किया है कि अगर पुलिस इन लोगों को यहां से न निकाल पाई तो वह इन्हें बाहर निकाल देगा। सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार की इस संघर्ष के संदर्भ में केरल हाईकोर्ट में क्या प्रतिक्रिया होगी? यह भी कि सदियों से जो लोग अलगाव और मानव अधिकारों का हनन झेल रहे हैं, हक की लड़ाई की परिस्थितियों में सरकार उनके लिए क्या कर सकती है? संघर्ष को गैर-कानूनी, हिंसक और राज्य विरोधी कहने के बजाय भूमि अधिनियम को लोगों की मांगों के हिसाब से कैसे बदला जा सकता है?
चेंगेरा का यह संघर्ष कोई नया नहीं है बल्कि इसकी जड़े इतिहास तक फैली हैं। अय्यनकली ने 1907 में दलितों और आदिवासियों के लिए खेती की जमीन की मांग की थी, 90 के दशक में भी दलितों के भूमि अधिकार के लिए आंदोलन किया गया था। अब आंदोलन ने अधिकारों की परिभाषा के लिए नई राजनीति और प्रत्यक्ष कार्रवाई का रास्ता अपना लिया है।(पीएनएन)

पॉस्को नहीं हक चाहिए -सिराज केसर

सरकारों का बहुररष्ट्रीय कंपनियों के आगे झुकने का इससे गंदा उदाहरण कम ही मिलेगा। उड़ीसा सरकार ने जगतसिंहपुर जिले में 'उत्कल दिवस' (उड़ीसा के निर्माण दिवस) 1 अप्रैल को पॉस्को निर्माण दिवस के रूप में मनाने का कार्यक्रम तय किया था। 'उत्कल दिवस' को इस तरह का रूप देना लोगों को नागवार गुजरा। पॉस्को के खिलाफ आन्दोलन कर रहे लोगों ने साफ शब्दों में चेताया कि सत्तारूढ़ सरकार का यह प्रयास बिल्कुल गलत है, क्योंकि इससे मातृभूमि के जन्मदिवस की पवित्रता भंग होती है और आन्दोलनकारी इसे किसी कीमत पर सम्भव नहीं होने देगें। पॉस्को विरोधी ताकतों ने 'उत्कल दिवस' 1 अप्रैल को एकजुट होने और पॉस्को भगाने का संयुक्त संकल्प का कार्यक्रम 'बिकल्प समाबेस' के रूप में आयोजित किया।
उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले के ढिनकिया, गड़कुजंगा और नवगांव गांवों के लोगों के साथ 'बिकल्प समाबेस' के लिए राज्य के अलग- अलग हिस्सों से हजारों लोग बालितुथा में इकट्ठा हुए, जहां प्रशासन ने कई हफ्तों से धारा 144 लगा रखी थी। प्रशासन ने राज्य सरकार को साफ तौर पर यह संकेत दे दिया था कि ज्यादातर स्थानीय लोग अभी भी पॉस्को परियोजना का विरोध कर रहे हैं। 'बिकल्प समाबेस' कार्यक्रम में भाग लेने वालों को जगह-जगह रोका गया। लौह अयस्क प्रभावित झरसुगुड़ा क्षेत्र से आने वाले लगभग 300 लोगों को रोक दिया गया था, इनमें ज्यादातर लोग किसान थे। बावजूद प्रशासन की रोकथाम के सुकिंडा, बेरहामपुर, कालाहांड़ी, झारखंड और अन्य स्थानों से हजारों लोग वहां पहुंचे और पुलिस के सभी बैरिकेड को तोड़ दिया। उन्होंने बालितुथा तक एक बड़ी रैली निकाली और ढिनकिया, गड़कुजंगा और नवगांव के लोगों से जा मिले, जो पिछले दो साल से 'पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति' के झंडे तले पॉस्को के लिए प्रस्तावित परियोजना का विरोध कर रहे हैं। पॉस्को परियोजना से प्रभावित गांवों को प्रशासन ने पिछले दो वर्ष से अघोषित कारागर जैसा बना रखा है। उन गांवों के चारों तरफ जगह-जगह पर पुलिस की चौकियां और आने-जाने के रास्तों पर बैरिकेड लगे हुए हैं। पॉस्को परियोजना से प्रभावित गांवों को अलग-थलग करके उनकी जमीन पॉस्को को दिलवाने के लिए प्रशासन ऐसा कर रहा है।
पॉस्को विरोधी ताकतों की रैली ने पुलिस द्वारा लगाए गए बांस के बैरिकेड को हर जगह हटा दिया और प्रशासन को 'उत्कल दिवस' को पॉस्को निर्माण दिवस के रूप में मनाने के कार्यक्रम को खत्म करने पर मजबूर कर दिया तब पुलिस ने अपनी मशीनगनों से पॉस्को विरोधी रैली के पांच हजार से भी ज्यादा लोगों को डराने की कोशिश की। लेकिन इससे लोग और गुस्से में आ गए और रैली में आई महिलाओं ने पुलिस को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और 'बिकल्प समाबेस' के लिए रास्ता बनाया। उस समय ऐसा लगा कि जैसे यहां भी एक बार फिर से कलिंगनगर जैसी विनाश लीला होगी, लेकिन प्रशासन ने समझदारी दिखाई और पुलिस पीछे हट गई।
समाबेस में कई संगठनों के लोग और बहुत से कार्यकर्ता सम्मिलित हुए और अपने भाषणों में गांव वालों की प्रशंसा की जो कई महीनों से राज्य और पॉस्को के माफिया के दबाव का सामना कर रहे थे। समाबेस को संबोधित करते हुए पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के अभय साहू ने यह भी घोषणा की कि धारा 144 की अवज्ञा और 'बिकल्प समाबेस' की सफलता इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि पॉस्को वहां नहीं बन पाएगा। उन्होंने सरकार को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार पॉस्को परियोजना को जारी रखती है तो इससे भी बड़ा विरोध होगा।
झारखंड और दूसरे राज्यों से आए लोगों ने भी वादा किया कि पूरा देश इरसमा ब्लॉक के उन लोगों के साथ है, जो पॉस्को का विरोध कर रहे हैं। कोरिया के मानवाधिकार आयोग और कोरियाई स्टील श्रमिक संघ भी अपने पत्रों के जरिये लगातार इस विरोध का साथ दे रहे है। उन्होंने अपने पत्रों में न केवल राज्य के दमन की निंदा की बल्कि उन सब कामों का भी खुलासा किया है, जिसमें पॉस्को ने ताकत और रिश्वत के बल पर कोरिया में भी ठीक ऐसे ही काम किए, जैसे भारत में चल रहे हैं।
'बिकल्प समाबेस' को कवर करने के लिए अलग-अलग प्रेस के लोग भी शामिल थे, यहां तक कि कुछ विदेशी पत्रकार भी शामिल थे। पर पत्रकारों का झुकाव पॉस्को के पक्ष में ही रहा। उड़ीसा के एक मुख्य समाचार पत्र ने इस बात की झूठी सूचना छापी कि महिला माओवादियों का एक दल रात में गांव में घुसा, जबकि दूसरी ओर टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे बड़े अखबारों ने इस 'बिकल्प समाबेस' को अप्रैल फूल जैसी कारस्तानी बताया और उड़ीसा निर्माण दिवस पर एक विदेशी कंपनी के मुनाफे के लिए किए जा रहे राज्य के आंतक को सही करार दे दिया। गौरतलब है कि पॉस्को द्वारा सभी बड़े प्रकाशन समूहों के पत्रकारों को विदेशी टूर पर ले जाया गया था, इसलिए इस तरह की एकतरफा रिपोर्टिंग होना जाहिर सी बात है।
लगता है नंदीग्राम और सिंगूर में हुए घटनाक्रमों से देश की तथाकथित लोकतान्त्रिक सरकारों ने कुछ सीखा नहीं है। पॉस्को जैसी परियोजनाओं का लगातार विरोध हो रहा है; वहीं केंद्र तथा राज्य सरकारें, डब्लूटीओ के दबाव में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए रास्ते और आसान कर रही हैं। उड़ीसा सरकार तथा पॉस्को के बीच जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं, उसके अनुसार दक्षिण कोरियाई स्टील कम्पनीे 51 हजार करोड़ रुपए के निवेश करने जा रही है। उड़ीसा सरकार किसी भी कीमत पर इस सौदे को हाथ से नहीं जाने देना चाहती है। उड़ीसा में जिस एमओयू पर नवीन पटनायक सरकार द्वारा 22 जून 2005 को हस्ताक्षर किया गया वह एक स्टील संयंत्र और एक बन्दरगाह के लिए था। प्रस्तावित संयंत्र जगतसिंहपुर में और कच्चे लोहे की खदानें क्ेयोंझर में होंगी। इसके अतिरिक्त बन्दरगाह जटाधारी में विकसित किया जाएगा। इस समझौते में ऐसी अनेक बातें शामिल हैं जिनका सीधा असर देश की सम्प्रभुता और सुरक्षा पर पड़ता है। लेकिन विरोध की मुख्य वजह भूमि ही है। पॉस्को को अपनी परियोजना के लिए 8000 एकड़ जमीन चाहिए। परन्तु साथ ही इससे अप्रत्यक्ष रूप से 20,000 एकड़ उपजाउ जमीन, जो खनिज अयस्कों की खुर्दाई तथा कम्पनी से निकलने वाले अपशिष्ट और मशीनी गतिविधियों की वजह से प्रभावित होगी। राज्य सरकार ने पहले ही कम्पनी को 25,000 रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से 1135 एकड़ जमीन देने का वादा किया है। इस तरह सरकार आदिवासियों की बहुमूल्य जमीन कौड़ियों के दाम पॉस्को को दे रही है। सदियों से जिस जमीन पर आदिवासी रहते आए हैं। उसे वे इतनी आसानी से सरकार को दे देंगे, इसकी संभावना कम ही लगती है। पर सरकार के अड़ियल रुख की वजह से उड़ीसा में एक और बड़ा नंदीग्राम बनने वाला है। इस संयंत्र के लगने से जिले की तीन पंचायतों नवगांव, ढिनकिया, गडकुजंगा और इरसमां ब्लाक के 30,000 लोग विस्थापित होंगे और लगभग एक लाख लोग देर-सबेर विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर होंगे।
पॉस्को तथा उड़ीसा सरकार की मिलीभगत से हो रहे इस कुकृत्य का वहाँ के आदिवासियो,ं किसानों तथा मछुआरों द्वारा जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। युवा भारत, भारत जन आंदोलन, नवनिर्माण समिति-इरासमा, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सहित अनेक संगठनो के विरोध में शामिल हो जाने से 'पॉस्को भगाओ' आंदोलन में तेजी आ गई है। (पीएनएन)

समानता के लिए संघर्ष ही रास्ता - प्रो. अरुण कुमार

(प्रो. अरुण कुमार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उन्होंने देश में हो रहे आर्थिक-सामाजिक बदलाव पर पैनी नजर रखी है। देश में व्यवस्था परिवर्तन के लिए चल रहे आन्दोलनों से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। उनका यह विचारोत्तोजक लेख वर्तमान परिस्थितियों को और उनको बदलने के लिए आन्दोलनों और संघर्षों की जरूरतों को समझने में मददगार होगा-सम्पादक)
सभी महत्वपूर्ण धर्म और दर्शन मानव के बीच समानता की बात करते हैं। परन्तु इन धर्मों और दर्शन के आधार पर चलने वाले समाजों में भी समानता नहीं दिखायी देती। वास्तव में ज्यादातर समाज यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि अब उन्हें बढ़ती असमानताओं के साथ ही जीना है। पिछले 30 वर्षों में भौतिक विषमताएं बढ़ कर उस स्तर पर पहुंच गयी हैं जैसी कि 1930 के दशक में दिखायी पड़ती थी। इस सम्बन्ध में भारत तो चरम विरोधाभासों की धरती है जहां अरबपतियों की संख्या के मामले में यह दूसरे नम्बर पर है वहीं गरीबों की संख्या के मामले में विश्व में अव्वल है।
अमीर समाजों ने भी गरीबी की निरन्तरता देखी है हालांकि उनके पास इससे मुक्ति पाने के साधन उपलब्ध हैं। इसके बावजूद चूंकि इन समाजों के नागरिक अपने संगी नागरिकों को मानवीय अस्तित्व के निचले स्तर पर जीते हुए देख कर भी कोई आपत्ति नहीं करते, इसलिये वहां विषमता की स्वीकार्यता आसान हो जाती है।
विकासशील समाजों में असमानता का विचार और ज्यादा स्वीकार्य हो जाता है क्योंकि वहां के शासक गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण असहाय होने का तर्क जो दे देते हैं। इन समाजों का उच्च वर्ग जिसका जीने का तौर तरीका गरीबों पर और बढ़ती विषमता पर ही जीवित रहता है, इसके बारे में कुछ नहीं करता। वे सुझाव देते हैं कि 'रिसन का सिध्दान्त' से भविष्य में यह समस्या अपने आप सुलझ जायेगी इसलिये अभी कुछ करने की जरूरत नहीं है। वे तर्क देते हैं कि उच्च वृध्दि से यह लक्ष्य जल्दी हासिल किया जा सकेगा परन्तु उच्च वृध्दि के लिये उन्हें और ज्यादा छूट/सहूलियतें चाहिये जिससे वे और अमीर हो जायँ। जल्दी से अमीर बनने के अपने ही स्वार्थ में डूबे ये लोग इसमें कुछ भी गलत नहीं मानते। इसलिये गरीबी और विषमता की समस्याएं संरचनात्मक हैं और इन्हें केवल समग्र परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है जिसे यहां दिया जा रहा है।
दार्शनिक अन्दाज में कहें तो सभी नागरिक जन्म से समान होते हैं, जिनमें एक जैसी समर्थताएं मौजूद रहती हैं लेकिन सामाजिक अस्तित्व के पैमाने पर लोग असमान हो जाते हैं। यदि विभिन्न लोगों में प्राकृतिक भिन्नताएं मौजूद हैं तो भी समाज ही तय करता है कि उनके साथ बराबरी का सलूक किया जाय या यदि गैरबराबरी का किया जाय तो कितनी गैरबराबरी का। उच्चवर्ग/बड़े लोग ही यह तय करते हैं कि किसको कैसा स्टेट्स मिले और अपने फायदे के लिये ये लोग सामाजिक सोपानों ;ैवबपंस ीपमतंतबीलध्द की रचना करते हैं। उनकी इस सामाजिक दृष्टि को समाज की स्वाभाविक स्थिति कह कर जायज ठहरा दिया जाता है। इन लोगों की न्यायदृष्टि भी इसी सोपानीकृत समाज दृष्टि से परिभाषित होती है।
क्या समाज स्वयमेव पक्षपातहीनता या समानता का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है ? क्या यह समाज की स्वाभाविक गति मानी जा सकती है ? इन प्रश्नों के उत्तर समाज की प्रकृति/अवस्था से, इसकी संस्थाओं से और इसकी न्याय चेतना से जुड़े हुए हैं। किसी समाज में प्रचलित न्यायदृष्टि उस समाज के शासकों के वैचारिक प्रभुत्व से ही उपजती है और यह ऐसी होती है कि जो व्यवस्था पर उनकी पकड़ को और मजबूत करें। यहां तक कि पीड़ित या व्यवस्था से सताये लोग भी इसी न्याय दृष्टि को उचित मानने और स्वीकार करने लगते हैं। उदाहरण के लिये, वर्तमान पुरुष प्रधान दुनिया में सफल महिलायें भी पुरुष केन्द्रित मूल्यों को अपना रही हैं और इसी को स्वाभाविक अवस्था मान रही हैं।
समाज की समानता की समझ को प्रभावित करने वाले लक्षण केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, भाषागत, परिस्थितिकीगत आदि भी होते हैं। इसलिये समानता के प्रति समाज के दृष्टिकोण में किसी बदलाव के लिये इन सभी क्षेत्रों में व्यापक और बुनियादी बदलाव होना जरूरी है और इसका अर्थ होता है सामाजिक चेतना में ही सम्पूर्ण बदलाव। ऐसा बदलाव केवल आंदोलनों और संघर्ष से ही आ सकता है। केवल शासकों की भलमनसाहत से कुछ नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये, पिछले दशकों में चले पर्यावरण आन्दोलन की असफलता के पीछे यह बात है कि यह आन्दोलन उपभोक्तावाद पर अंकुश लगाने में विफल रहा है। शिक्षा इस बदलाव में महत्वपूण्र् भूमिका निभा सकती है वर्तमान शिक्षा तो जमी हुई असमानताओं और चालू व्यवस्था को मजबूत करने में ही लगी हुई हैं। यह स्पष्ट है कि यदि परिवर्तन आना है तो सत्तासम्पन्न लोग क्या चाहते हैं उसके बावजूद भी इसे आना है। इसलिये बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के केन्द्र में संघर्ष और प्रतिरोध के आन्दोलन ही हैं।
बढ़ती असमानताओं की प्रकृति
असमानता के कई आयाम हैं। आज इसे मुख्यतया भौतिक आयाम के सम्बन्ध में ही समझा जाता है। दुनियाभर में भौतिक विषमताएं कम भी हुई हैं और बढ़ी भी हैं। प्रति व्यक्ति आमदनी के आधार पर देशों के बीच असमानता कम हुई है। खासतौर से पूर्व उपनिवेशों द्वारा 70 के दशक के बाद अच्छी प्रगति करने के कारण। किन्तु दुनिया के अधिकांश देशों में वितरण की समस्या बिगड़ गयी है। दोनों तथ्यों को एक साथ लेकर देखा जाय तो असमानता अवश्यम्भावी नहीं लगती और इसका सामाजिक आधार दिखायी पड़ता है। उदाहरण के लिये, उपनिवेशकाल में, असमानता का कारण मौजूदा परिस्थितियां थीं, इसके कोई प्राकृतिक कारण नहीं थे। वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के प्रभाव में विश्व में नई उदारवादी नीतियां चलायी जा रही हैं उनके कारण ये असमानताएं हैं।
पूंजीवाद का यह एक लक्षण है कि असमानता के कारण यह और फलता फूलता है। चूंकि, प्रगति बड़े लोगों के क्रियाकलापों पर निर्भर दिखायी पड़ती है, इसलिये वे अपने लिये समाज से ज्यादा से ज्यादा छूटों की मांग करते हैं और जब वे ये छूटें प्राप्त कर लेते हैं तो असमानता और बढ़ जाती है। अब कल्याणकारी राज्य में विश्वास खत्म हो गया है और उसके स्थान पर विकास का अनन्य और उच्चवर्गीय मॉडल स्थापित हो गया है। इस स्थिति को डॉलर वोट के 'बाजार कट्टरवाद' ने मजबूत किया है और बाजार द्वारा हाशिये पर पड़े लोगों को और किनारे धकेलने के कारण यह स्थिति विकट हो गयी है। पूंजीवाद में सबसे बड़ी असमानता मजदूरी और मुनाफे के बीच है। जैसे-जैसे पूंजी कुछ हाथों में सिमटती जाती है या/और श्रमिक कमजोर होता जाता है वैसे-वैसे एकाधिकार का अंश बढ़ता जाता है। ऐसा ही वर्तमान समय में हो रहा है। परिणाम है बढ़ती असमानता।
'बाजार' और 'समाज के बाजारीकरण' के बीच महत्वपूर्ण भेद को रेखांकित करना जरूरी है। बाजार तो बहुत पहले से मौजूद है, परन्तु समाज का बाजारीकरण नयी घटना है। इसके परिणामस्वरूप लोगों में भावना का अहसास, सामुदायिकता और एकजुटता की चेतना कमजोर पड गयी और अलगाव और अकेले रहने की भावना स्थापित हो गयी है। लोग एक मशीन मात्र बन कर रह गये हैं। उदाहरण के लिये, चिकित्सा के आधुनिक पेशे में मनुष्य को सम्पूर्ण मान कर इलाज नहीं किया जाता बल्कि उसे अलग-अलग हिस्सों में बांट कर देखा जाता है। आधाुनिक शिक्षा लोगों को खनिजों की तरह एक संसाधन मानती है जिन्हें उत्पादन के लिये इस्तेमाल किया जा सके। शिक्षा को अब मानव संसाधन विकास के तरीके से लिया जाता है।
मुनाफे को अधिकतम करने वाली व्यवस्था में अपराधबोध और स्वसंदेह की भावनाएं उभरती हैं जिन्हें कम से कम करने की जरूरत पड़ती है। इसीलिये उच्च वर्गों को गरीबी या असमानता के अस्तित्व के लिये जिम्मेदार होने या उसके लिये बुरा महसूस करने की आवश्यकता नहीं है। जब 'अधिक अच्छा है' का विचार मान लिया गया तो फिर त्याग करना तो मूर्खता ही माना जायेगा। इसलिये कोई भी शर्मनाक रूप से स्वकेन्द्रित हो सकता है। किन्तु, परिवार-समाज आदि ऐसी संस्थाएं र्हैं जिन्हें बनाये रखने के लिये त्याग की जरूरत पड़ती है और चूंकि त्याग का मूल्य पिट चुका है इसलिये ये संस्थाएं संकट से घिर गयी हैं। जो यह कहते हैं कि मनुष्य मजबूत प्राणी है वे वही हैं जो मनुष्य को कमजोर करने के सबसे ज्यादा उपक्रम करते हैं। समाज की दखलन्दाजी को कम करने और लोगों का ज्यादा शोषण करने की भूमिका बांधने के लिये इस तर्क को बार-बार दोहराया जाता है।
बढ़ती काली अर्थव्यवस्था और अवैधानिकता का चरित्र समाज विरोधी है। ये समाज के अन्दरूनी अंगों को दीमक की तरह चट कर रही हैं। आंकलन किया गया है कि भारत में जी.डी.पी. के 50 प्रतिशत के बराबर काली अर्थव्यवस्था मौजूद है। यह इतनी विशाल है कि व्यवस्थागत और व्यवस्थामूलक दोनों है। यह केवल 3 प्रतिशत भारतीयों के हाथ मेंं केन्द्रित है और विशाल विषमता को जन्म देती हैं। यह व्यक्तियों के अलगाव को बढ़ा कर अपने खिलाफ समाज के हस्तक्षेप को मुश्किल बना देती हैं।
क्या भौतिक तरक्की ही तरक्की का एकमात्र पैमाना है ? बाजार लोगों में संतुष्टि और संतृप्ति की भावना को प्रोत्साहित नहीं करता। इसलिये जीवन का भौतिक पक्ष अक्सर सुखानुभूति से अलग रह जाता है। और फिर समाज की अर्थशास्त्रीय दृष्टि भी एक छोटी सी परिभाषा 'अभी और यही' में परिलक्षित हो कर रह है जबकि समाज को दूरगामी सोच रखनी चाहिये। समाज की दूरगामी सोच और व्यक्ति के 'अभी और यही' के बीच का विशाल अन्तराल मानवजाति के लिये खतरनाक साबित हो रहा है।
वर्तमान विज्ञान और टेक्नोलाजी के बहुत से विशिष्ट रूप समाज में फैली असमानता के संबंध में हमारे वर्तमान मनोभावों के आर्थिक पक्षों को और मजबूत करते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि विज्ञान और तकनीक ने भौतिक सम्पन्नता बढ़ायी है परन्तु इसने लोगों में असमानता को भी बढ़ाया है क्योंकि अलग-अलग लोगों की इस तक अलग-अलग पहुंच होती है। सूचना तकनीक और डिजिटल तकनीक की विभाजित पहुंच ऐसा ही मामला है। बायो टेक्नालाजी से लोगों को असमान बनाने की नई सम्भावनाएं निकल रही हैं और ये खतरनाक संकेत हैं। आज तकनीक का मनुष्य के ऊपर ऐसा प्रभुंत्व जम गया है जैसा पहले कभी नहीं था और इसने लोगों के इस विश्वास को मजबूत किया है कि यह हर मर्ज की दवा है और अब सामाजिक स्तर पर किसी भी प्रकार के एक्शन की जरूरत नहीं है। कई तरीकों से यह दृष्टि को संकीर्ण कर रहा है।
बढ़ती हुई सांस्कृतिक दरार भी असमानता को पुष्ट कर रही हैं। लोक संस्कृति गिनी-चुनी कम्पनियों और वाणिज्यिक हितों द्वारा निर्देशित हो रही हैं और बहुसंख्यक लोग किनारे खिसक कर निष्क्रिय दर्शक मात्र बन कर रह गये हैं। इससे सामान्य आदमी की सृजनशीलता सीमित होती जा रही है और निष्क्रियता की वजह से उनकी स्वत:स्फूर्तता घट रही है। यहां तक कि जो चीजें अब तक पवित्र मानी जाती थी वे भी अब वैसी नहीं रहीं। पवित्र गंगा और गोदावरी भयंकर प्रदूषित हैं परन्तु लोगों को अब उनकी कोई चिन्ता नहीं है। आधुनिक मनुष्य, वाणिज्य और पैसे के अलावा, किस निश्चित चीज में विश्वास करता है ?
असमानता का भाषायी आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आज हमें अंग्रेजी का प्रभुत्व और इसके द्वारा अंग्रेजी शिक्षित उच्च वर्ग और बाकी लोगों के बीच बनी गहरी खांई स्वीकार हो गयी है। विश्व में अनेकानेक भाषायें तो अब विलुप्ति के कगार पर हैं और इस कारण इन भाषा बोलने वालों की अस्मिता और संस्कृति पर गहरा संकट है।
बिगड़ता पर्यावरण विषमता को चौड़ा करने और अमीरी के टापुओं के बीच बढ़ती गरीबी की तरफ ले जा रहा है। प्रजातियां खतरनाक दर से विलुप्त हो रही हैं और निकट आती जा रही प्राकृतिक विपदा की ओर इशारा कर रही हैं। वैश्विक गर्मी, प्राकृतिक आपदा और नई बीमारियां बढ़ने पर हैं। इन सभी का असर गरीबों पर ही ज्यादा पड़ रहा है।
समाज और विशेष कर उनमें रहने वाले अमीर पृथ्वी के संसाधनों का बड़ा हिस्सा चट कर जा रहे है। इस कारण विभिन्न प्रकार के झगड़े (खास कर प्राकृतिक संसाधनों के ऊपर नियंत्रण को लेकर) खड़े हो गये हैं। कुछ लोग केवल तभी तक ज्यादा उपभोग कर सकते हैं जब तक कि बहुसंख्यक लोग वंचित रहें। इसलिये शासक कमजोरों को दबाने के लिये अधिाकारवादी बनते जा रहे हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नजर विकासशील देशों के सस्ते खनिजों और सस्ते श्रमिकों पर गड़ी हुई है। लोगों का उनके लिये कोई अर्थ नहीं है। इनके ऊपर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिये कुछ भी बेचा जा सकता है। लोगों-आदिवासी और स्थानीय- का कोई मतलब नहीं है। बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ लोगों के प्रतिरोध को तोड़ने के लिये राज्य की मदद जरूरी है। कार्पोरेट सेक्टर संसाधनों (जैसे-सेज के लिये जमीन) पर कब्जा करने के लिये राज्य का उपयोग कर रहा है। सरकार इण्डिया प्राइवेट लि. बन गयी है।
किसी भी परिवर्तन का ऐतिहासिक आयाम महत्वपूर्ण होता है। लोग कोई रोबोट तो होते नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से मर्यादित होते हैं। इसलिये सामाजिक परिवर्तन की गति धीमी होती है और फिर विकासशील देशों के समाज तो तितर-बितर हो चुके समाज हैं। आजकल ईराक और अफगानिस्तान में ऐसा हो रहा है। पहले सम्पूर्ण उपनिवेश ऐसी ही स्थिति में थे। इस विध्वंस के दूरगामी असर हुए क्योंकि गुलाम देशों का उच्च वर्ग शासक देशों के साथ मिल गया था। बाहरी शक्तियां/प्रभाव असरकारी हो गये और इन समाजों ने अपनी गतिशीलता खो दी। अपना ज्ञान और सामाजिक समझ उससे तय होने लगी जो कुछ विकसित दुनिया में हो रहा है और हमारे विचारक व्युत्पन्न बुध्दिजीवी बन गये हैं। व्यवस्था बाहरी संस्थाओं (जैसे-आईएमएफ और विश्वबैंक) के प्रति उत्तरदायी हैं न कि अपने लोगों के प्रति और इसलिये राजनीतिक आजादी हासिल कर लेने के बावजूद शासक और शोषित के बीच की खांई विशाल बनी हुई है।
संक्षेप में, असमानता अपने चरित्र और कारणों की दृष्टि से केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि बहुआयामी है। हालांकि सामाजिक अस्तित्व के हर क्षेत्र में आर्थिक आयाम की घुसपैठ से तस्वीर पहले के मुकाबले और जटिल हो गयी है।
आज के आन्दोलनों और प्रतिरोधों की प्रकृति
क्या आन्दोलन स्वत:स्फूर्त होते हैं ? वे कब और कैसे खड़े होते हैं ? उनकी क्या प्रकृति होती है ? इन सबको समझने के लिये सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक अध्ययन होना जरूरी है। समाज की चेतना के परिवर्तन में आन्दोलन द्वि-विधि कड़ी बनते हैं। उदाहरण के लिये-आधुनिक समय में कम्युनिस्ट, समाजवादी, राष्ट्रवादी, नारी आन्दोलन, अमरीका में काले लोगों के आन्दोलन, भारत में दलितों के आन्दोलन, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी आन्दोलन, नाभिकीय अस्त्र विरोधी, पर्यावरण और धार्मिक आन्दोलनों ने लोगों के मानस पर असर डाला।
आन्दोलनों में सम्भावित पदानुक्रम को पहचानना चाहिये। कुछ ने समाज के बुनियादी उसूलों को बदल दिया, कुछ ने नहीं। समाज में उपस्थित संकट सफल आन्दोलन को जन्म दे भी सकता है नहीं भी दे सकता। परिणामस्वरूप समस्याएं लम्बे समय तक उबलती रह सकती हैं। कोई जरूरी नहीं है कि बदलाव हो ही। इसलिये लोगों द्वारा सफल आन्दोलनों के लिये अविचल कार्य करने की जरूरत रहती है।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ बीत चुकी है और आजादी प्राप्त किये हुंए भी 60 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी सेज और विस्थापन के खिलाफ नन्दीग्राम में और नर्मदा घाटी में आंदोलन हो रहे हैं। माओवादी आन्दोलन भी जोर पकड़ता जा रहा है और प्रधानमंत्री को यह स्वीकार करने के लिये मजबूर होना पड़ा है कि यह भारतीय राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
राजनीतिक व्यवस्था में उत्तरदायित्व की कमी के कारण भी विरोध और आन्दोलन खड़े हो जाते हैं। न्यायपालिका की असफलता और इसके दक्षिापंथी रुझान के कारण बढ़ती अन्याय की भावना से यह समस्या और जटिल हो गयी है। परन्तु महिला और दलित आन्दोलनों से अभी भी आशा की किरण दिखायी दे रही है। हालांकि बढ़ते भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं में क्षरण के कारण इस आशावाद में थोड़े और सुधार की जरूरत है। और फिर ये आंदोलन कैसा समाज बनाना चाहते हैं, इसकी कोई समझदारी उनमें न होने के कारण और भी जटिलताएं हैं।
आज, राजनीतिक पार्टियां लोकतंत्र में सुधार के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा दिखायी पड़ती है। वे निहित स्वार्थों के साथ जुड़ी हुई देखी जाती है। लोकतंत्र औपचारिक हो चुका है। वोट देने से लोगों की प्रामाण्0श्निाक पसंद सामने नहीं आ रही है। अमरीका या इंग्लैण्ड का दो-पार्टी सिस्टम या भारत का सिस्टम लोगों को प्रामाणिक विकल्प नहीं दे रहे हैं। पार्टियां वोट लेने की मशीन भर हैं भारत में भी और बाहर भी। लोकतंत्र की साख को क्षति पहुंचाने वाले ये कारक आन्दोलन शुरू करने में मुश्किलें खड़ी कर देते हैं। पार्टियों और उनके नेताओं में लोगों की कोई आस्था नहीं है। यदि इस स्थिति को बदलना है तो भविष्य के विकल्प को स्पष्ट करना पड़ेगा। इस तरह से लोकतांत्रिक परिवर्तन और विकल्प एक दूसरे से घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं।
आन्दोलन, सामूहिक कार्यक्रम और प्रतिरोध को संगठित करने में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। ऐसा संकीर्णता के फैलाव, व्यक्ति के परमाणुकरण की प्रक्रिया में तेजी और सामाजिक प्रक्रियाओं के बाजारीकरण के कारण हो रहा है। समाज को चूंकि 'सब्जेक्टिव' और मार्केट को 'आब्जेक्टिव' बताया जा रहा है, इसलिये समाज धीरे-धीरे पीछे हटता जा रहा है और बाजारीकरण आगे बढ़ता जा रहा है।
आज लोगों के सामने आ रही एक विशेष मुसीबत है कि वैश्वीकरण के इस दौर में वैश्विक आन्दोलन खड़ा करने वाला कोई वैश्विक समाज नहीं है। इसलिये विश्व सामाजिक मंच जैसे आन्दोलनों की भी शक्ति सीमित ही है। 90 के दशक की शुरूआत में विकासशील देशों में डब्लूटीओ को बनाने वाले डंकल ड्राफ्ट के खिलाफ चला आन्दोलन असफल हो गया। पर्यावरण विनाश को रोकने के लिये चल रहे आन्दोलन को भी सीमित सफलता मिली। वैश्विक समाज अमीर और गरीब की विभिन्न श्रेणियों में बंटा हुआ है। उदाहरण के लिये, श्रमिक आन्दोलनों को वैश्विक स्तर पर श्रमिक निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता का सामना करना पड़ रहा है या फिर संगठित और असंगठित क्षेत्रों के बीच की खांई से।
आज पूंजी तो चलायमान है परन्तु श्रम नहीं। इसके कारण पूंजी मजबूत हुई है और श्रम कमजोर। श्रमिक आन्दोलन अब हर जगह कमजोर पड़ गया है। अमरीका में 80 के दशक में निजी क्षेत्र के 25 प्रतिशत श्रमिक इन संगठनों के सदस्य थे अब ये घट कर 7 प्रतिशत रह गये हैं।
लोगों को अब विकास का अपना रास्ता चुनने का अधिकार नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय पूंजी अब विकास का रास्ता तय करती है। स्थानीय उच्चवर्ग इसमें उसकी मदद करता है और उसके एजेन्ट की भूमिका निभाता है। यह राष्ट्र की सम्प्रभुता को भी दांव पर लगाने के लिये तैयार है क्योंकि अब इसे संप्रभुता में कोई फायदा नजर नहीं आता। इस दिशा में इस वर्ग ने कई कदम उठाये हैं जैसा कि 1991 के बाद से मनमोहन सिंह के क्रियाकलाप सिध्द करते हैं। इनका परिणाम हुआ है कि कटा-छटा लोकतन्त्र। विधायिका, न्यायपालिका, नौकरशाही और पुलिस सब इस क्षरण की प्रक्रिया के हिस्से हैं। सामाजिक इकरारनामे बिखर चुके हैं। हिंसा के ऊपर एकाधिकार रखने वाला राज्य अब इसका प्रयोग जम कर आन्दोलनों और संघर्षों को तोड़ने के लिये कर रहा है।
निष्कर्ष
समाज का एक सभ्य बनाने वाला पक्ष भी होता है और यदि व्यक्तियों के बीच प्राकृतिक मतभेद हैं तो भी समाज अपने विचारों और संगठनों के कारण उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। सभ्य समाज अपने निर्बलों की रक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताओं का अंदाज रहता है। 'बाजारीकरण' जो समाज को विपरीत दिशा में ले जा रहा है और आन्दोलनों और सामुहिक कार्यों के रास्ते में रूकावट पैदा कर रहा है, का आज समाज के इसी सभ्यकारी विचार से मुकाबला है।
परोपकार मनुष्य का बुनियादी गुण है। प्रतिस्पधर्ाा की दौड़ में इसको नकारा जा रहा है। युवा के सर्वोत्तम जीवन वर्ष छीने जा रहे हैं और उसका परमाणुकरण किया जा रहा है। समाज के वे अंग जो मनुष्य को मजबूत होने की और उसे मुक्त छोड़ने की घोषणा करते हैं वही हैं जो अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिये उसे सबसे कमजोर बनाने पर तुले हुए हैं। ऐसा केवल आर्थिक स्तर पर ही नहीं बल्कि संस्कृति, विज्ञान और तकनीक, मीडिया आदि अनेक स्तरों पर हो रहा है जिससे कि असमानता विभिन्न आपस में जुड़े हुए तरीकों से और पुष्ट हो। इन सभी स्तरों पर लड़ाई लड़नी होगी।
बढ़ती हुई निराशा और विचारों की संकीर्णता से समाज की निश्चलता समाप्त होती जा रही है और व्यक्तियों को ऐसे खोलों में बदलती जा रही है जिनमें भावनात्मक गइराई न हो और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे वे एक जटिल मशीन मात्र हों। संक्षेप में, जिन कारणों से असमानता बढ़ रही है, वे ही कारण समानता प्राप्त करने के आन्दोलनों को संगठित करने में मुश्किलात खड़ी कर रहे हैं।
समानता के लिये विकल्प आधारित आन्दोलनों और संघर्षों की जरूरत है। गांधी ने इसके लिये 'अन्तिम व्यक्ति को पहले रखने' का रास्ता सुझाया है। गांधी आज की भौतिकवादी दुनिया में भी प्रासंगिक है। लोगों के बीच काम करने वाले समूहों को इस बिन्दु पर एकजुट होना होगा।
(एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में आयोजित 31वीं भारतीय समाज विज्ञान कांग्रेस में प्रो. अरुण कुमार की प्रस्तुति पर आधारित)

उत्पीड़न पर आदिवासी आंदोलन

उड़ीसा में निजी स्वार्थों के चलते गरीब आदिवासियों के आंदोलन को माओवादियों का संगठित विद्रोह घोषित कर दिया गया जिससे कि उनकी स्थिति में सुधार न हो सके.
संजय कपूर

दोपहर का समय है. फरवरी माह का सूरज काफी तेजी से चमक रहा है और धूप भी तेज है. इस क्षेत्र के बंजर लेकिन काफी व्यस्त भू भाग वाली लाल मिट्टी में इतनी गर्माहट है जितनी पहले कभी नहीं रही. आमतौर पर पारादीप बंदरगाह की ओर भीड़भाड़ वाली सड़क जनवरी २००६ की शुरूआत से ही आदिवासी प्रदर्शनकारियों द्वारा रास्ता बंद कर दिए जाने के कारण काफी शांत दिखाई दे रही है.
यह प्रदर्शन १२ आदिवासियों की हत्या के विरोध में किया जा रहा है. सड़कों को थोड़ी-थोड़ी दूर पर पत्थरों, पेड़ के तनों, कुर्सियों और हाथों से जो कुछ भी लाया जा सका उससे जाम कर दिया गया. यह प्रदर्शन तात्कालिक था और यह इसका प्रमाण है कि प्रतिदिन नए हथियार आजमाते हुए वे सड़क जाम तक पहुंच गए.
सुनसान सड़क के किनारे बेतरतीब ढ़ंग से चेवरोलेट, टोयोटा और अन्य छोटी कारें खड़ी हैं. गाड़ियों के मालिक अपने वाहनों को इस तरह से छोड़ने को लेकर बेफिक्र हैं क्योंकि सड़कों पर कोई यातायात नहीं है. हाईवे से सटी हुई कच्ची सड़क है जहां कुछ खाली जगह में शामियाना लगा है. पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों का अस्थि कलश इस शामियाने में तब तक रखा गया जब तक कि उनका विसर्जन नहीं हुआ. गाड़ियों के मालिक घटनास्थल पर जाकर आंदोलन कर रहे आदिवासियों के साथ सहानुभूति प्रकट करते.
वहां का दौरा कर रहे खद्दरधारी कांग्रेसी नेताओं में कैबिनेट मंत्री के बगल में बैठने के लिए होड़ लगी थी. शामियाने से कुछ दूर आंखों में थकान लिए स्थानीय आदिवासी पंक्ति में बैठे थे. बढ़ी हुई दाढ़ी और मैले कपड़ों में वे मंत्री की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे जो उड़िया भाषा में किसी भी कीमत पर समझौता न करने का भाषण दे रहे थे. यह उस गरीबी का चेहरा है जिसने उसे भूल जाने के लिए भारत का उदारीकरण किया है.
उनके उदास और अस्त व्यस्त हाव भाव से यह स्पष्ट है कि भारत के दो चेहरे हैं, एक तो वह जो अमीर और मेट्रो में रहते हैं और दूसरा वह जो आर्थिक रूप से गरीब राज्यों और झुग्गी झोपड़ियों में रहते हैं, और इन दोनों में कभी समानता नहीं हो सकती.
आदिवासियों का भी अपना प्रतिनिधि है जो मंत्री व अ‍न्य कांग्रेसी नेताओं के साथ बैठा था. वे राज्य सरकार और वहां के स्थानीय विधायक प्रफुल्ल कुमार घड़ेही पर आरोप लगा रहे थे जो कि राज्य के वित्त मंत्री भी हैं.
एक वक्ता जो कि वहां का जमींदार था और राज्य सरकार ने उसकी जमीन इस्पात कारखाने के लिए अधिग्रहित की है, कहा कि "उन्होंने फायरिंग के बाद यहां आने की भी औपचारिकता भी नहीं निभाई".
जमीनों के आदिवासी मालिक बहुत अधिक मुआवजे की मांग कर रहे थे. वह वक्ता जिसे स्थानीय कांग्रेसी नेता का समर्थन था, उसका कहना था कि सरकार उनकी जमीने ३.७ लाख प्रति एकड़ की दर से खरीद कर उसे १० गुनी कीमत, ३७,५०० लाख प्रति एकड़ के हिसाब से बेच रही है.
सरकार का कहना है कि कंपनियों से ज्यादा पैसे वसूलकर वे यहां की सड़क जैसी बुनियादी संरचनाओं का निर्माण करेंगे. वे सरकार से पूछते हैं कि सड़क कहां है? भाषण के बाद कांग्रेसी नेता अपने वातानुकूलित वाहनों से वापस लौट गए. आदिवासी टकटकी लगाए शामियाने में बैठे रहे और यह राजनीतिक प्रहसन उनके उपर कोई प्रभाव नहीं डाल सका.
इन आदिवासियों को मीडिया और सरकार के कुछ अधिकारी खतरनाक माओवादी साबित करने में लगे हुए हैं. यदि माओवादी ऐसे ही होते हैं तो अपनी जमीनों के लिए आंदोलन कर रहे लोग भी आंदोलनकारी गुरिल्ला हैं. लेकिन सत्य इससे काफी अलग है. इन गरीब आदिवासियों का किसी विचारधारा से कुछ लेना देना नहीं है. श्रम विभाग के एक अधिकारी के अनुसार "वे अच्छे पैसे के लिए सरकार और आदिवासियों के बीच सौदेबाजी कर रहे हैं. लेकिन कोई नहीं सुन रहा है".
२जनवरी २००६ की घटना का उदाहरण देखें जब टाटा स्टील कंपनी राज्य पुलिस के सहयोग से आदिवासियों की जमीन पर कब्जा के समय कुछ सरकारी अधिकारियों ने इसके विरोध के पीछे माओवादियों का हाथ बताया था. पिछले दो महीने से वे इनके खिलाफ सबूत और कहानी इकट्ठा कर रहे थे.
इसमें सबसे ज्यादा हलचल मचाने वाली बात यह थी कि कलिंगनगर की घटना में शामिल लोगों को भारतीय जनता पार्टी और कुछ स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का समर्थन था. यह तथ्य सत्ताधारी जनता दल के मुख्यमंत्री बिजू पटनायक के लिए काफी आसान है क्योंकि इससे पुलिस को विरोधियों के उपर वार करने के लिए एक बहाना मिल गया.
उद्योगों के एक खास वर्ग द्वारा माओवादियों के खिलाफ मानसिक रूप से उकसाया गया जो कोरिया कि पास्को जैसी विदेशी स्टील कंपनी के प्रवेश का रास्ता देख रहे हैं. वे अपने संसाधन तो यहां लगाना चाहते हैं लेकिन वे इस पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं कि उड़ीसा माओवादियों के कब्जे मे है इसलिए यहां बड़ा निवेश करना खतरे से खाली नहीं है.
कुछ आतंकवादियों पर दोषारोपण करने के बावजूद लगातार चल रहा आंदोलन समझ में नहीं आता है. २ जनवरी से शुरू हुए इस आंदोलन को लगभग दो महीने हो चुके हैं फिर भी कलिंगनगर में हो रहे प्रदर्शन में कोई कमी नहीं आई है.
पहले प्रशासन यह समझ रहा था कि जब मुख्यमंत्री उनके हित में कोई घोषणा कर देंगे तो पारादीप रास्ते का जाम विधानसभा के सत्र की समाप्ती के साथ ही खत्म हो जाएगा. इस मुद्दे पर बहस भी हुई लेकिन विरोधी पार्टियों और प्रदर्शनकारियों ने वापस लौटने से इनकार कर दिया.
एक युवा पत्रकार जेना के शब्दों में "यह मुद्दा समाप्त हो सकता था यदि नवीन पटनायक घटनास्थल पर जाते और लोगों को आश्वासन देते कि उनके हितों का ख्याल रखा जाएगा. लेकिन उन्होंने वहां जाने से इनकार कर दिया".
वित्तमंत्री घड़ेही के इस्तीफे की मांग भी उठी लेकिन मुख्यमंत्री इससे सहमत नहीं हुए. सहायता और पुनर्वास पैकेज में बदलाव जो कि काफी समय से लंबित है वह बजट सत्र की समाप्ती के बाद ही हो पाएगा जब अप्रैल में विधानसभा का सत्र समाप्त हो जाएगा.
कलिंगनगर की घटना ने उड़ीसा सरकार द्वारा खनन क्षेत्र में शुरू की गई उदारीकरण की प्रक्रिया में गतिरोध पैदा कर दिया है. इस्पात क्षेत्र में काफी आशंकाएं हैं जहां पेप्सीको इस्पात कारखाना जो कुछ महीनों से विवाद में रहा है उसे २०१० तक आसान रास्ता मिल जाएगा.
दक्षिण कोरियाई अधिकारियों को आशा है कि वे पटनायक सरकार के कार्यकाल में ही अपना काम पूरा कर लेंगे जिसने उनको उड़ीसा में निवेश के लिए आमंत्रित किया है और उनका कार्यकाल २००९ तक है.
हांलाकि राज्य सरकार भारतीय उद्यमियों की बजाय दक्षिण कोरियाई लोगों को ज्यादा से ज्यादा खदान देने के कारण विपक्ष की आलोचना का शिकार बनी है. पेप्सीको और अन्य कंपनियों के प्रवेश से स्थानीय खदान माफियाओं के लिए खतरा पैदा हो गया है जो वर्षों से यहां अवैध रूप से खुदायी कर सारा खनिज अन्य राज्यों में भेज रहे थे. राजनीतिज्ञों की मदद से यहां के ठेकेदार और अधिकारी राज्य की खदान कंपनी उड़ीसा माइनिंग कारपोरेशन का बेड़ा गर्क कर चुके हैं.
इस्पात, खदान सचिव और उड़ीसा माइनिंग कारपोरेशन के अध्यक्ष भाष्कर चटर्जी द्वारा इस पर निगरानी बैठाने से पहले ही कीमती धातुओं का अनियंत्रित खनन हो चुका है. इसमें से कुछ स्थानीय कंपनियों को बेच दिया गया तथा कुछ देश से बाहर चला गया.
वर्ष २००४ में सरकार की आडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि किस प्रकार से कई सालों से अवैध खनन हो रहा है. निश्चित तौर पर माओवादी ऐसा नहीं कर रहे हैं. आडिट रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि कैसे दैमित्री खदान से ठेकेदार खनिजों की चोरी करते हैं. इसमें केवल एक खदान से ४१२ चक्कर का घपला किया गया. इसी से पूरे मामले में हुए घोटाले का अनुमान लगाया जा सकता है.
माल ढ़ुलाई में घाटा होने के बहुत से मामले हैं. परचेज कमेटी द्वारा दिखाए गए .५ प्रतिशत घाटा के मुकाबले ठेकेदारों ने माल ढ़ुलाई में ३ से १३ प्रतिशत का घाटा दिखाया है. वास्तव में यह बहुत बड़ा घाटा है लेकिन सरकारी विभाग इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि उन्होंने इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.
यदि हम २००४ की आडिट रिपोर्ट को देखें तो इसमें सबसे बड़ी बात इसका खराब प्रदर्शन है. यदि हम ध्यान से देखें तो यह घाटा राजनीतिज्ञों, अधिकारियों व ठेकेदारों की मिलीभगत से संभव हो सका है. जहां कहीं भी निजी ठेकेदार हैं वहां पर यह अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सका है या फिर रेलवे तक जाने में ही गायब हो गया. एक अध्ययन में पाया गया है कि जिन्हें भी ये ठेके दिए गए वे या तो अधिकारियों के रिश्तेदार, राजनेता या फिर नौकरशाह थे. यदि सरकार संसाधनों में धनी होकर भी विकास में फिसड्डी है तो इसका सारा दोष राजनेताओं व नौकरशाहों के भ्रष्ट गठजोड़ को जाता है.
एक उदार खनिज नीति बिना किसी रोक टोक के फल फूल रही इस लाबी के कार्यप्रणाली पर रोक लगा सकती है. राउरकेला के अलावा उड़ीसा में कोई भी इस्पात कारखाना नहीं है. इसके अलावा निजी कंपनियां खनिजों को जापान, कोरिया और चीन जेसे देशों में निर्यात कर रही हैं. कलिंगनगर के एक पत्रकार के अनुसार "सभी कंपनियां खनिजों का दोहन कर उन्हें निर्यात कर रही हैं".
टाटा स्टील की भी यहां खदान है लेकिन उन्होंने पहले इसमें रूचि नहीं दिखाई. इसमें बाधा यह थी कि भारत की बड़ी कंपनियां यहां अपना कारखाना लगाने की इच्छुक नहीं थी. टाटा कंपनी के स्थानीय अधिकारियों ने इस आरोप से इनकार किया तथा कहा कि वे यहां कारखाना स्थापित करने इच्छुक थे.
आश्चर्यजनक रूप से ४३ कंपनियों ने उड़ीसा सरकार के साथ इस्पात कारखाना लगाने के लिए समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया है. उनमें से कुछ जैसे विसा और जिंदल जैसी कंपनियों ने बहुत अधिक निवेश किया है और वे इस पर फिर से विचार कर रहे हैं.
उनका कहना है कि यदि सरकार उन्हें नियमों के अनुसार जमीन प्रदान करे तो वे यहां धन लगाना जारी रखेंगे. बहुत सी कंपनियां प्रशासन की लापरवाही और उन्हें सड़क, जल व विद्युत जैसी मूलभूत आवश्यकताएं प्रदान करने में विफल रहे हैं.
कलिंगनगर के मसले पर उद्योगों व सरकार के बीच मतभेद हैं और संभवतः इसका प्रभाव पड़ रहा है. लगभग उद्योगों का प्रत्येक प्रतिनिधि इस संवाददाता से राज्य के बारे में कहने को उत्सुक दिखा जबकि राजनीतिक गलियारों व सरकार में विदेशी निवेश को खटाई में पड़ने को लेकर निराशा और भय का माहौल था.
कलिंगनगर ने यह साबित कर दिया कि सरकार को स्थानीय लोगों के हितों के प्रति जागरूक होना होगा. जिंदल स्टील के एक अधिकारी ने कहा कि "वे जैसा पहले करते रहे हैं उस तरह से अब उन्हें मिटा नहीं सकते".
जुलाई २००५ में सरकार के साथ एक बैठक में टाटा स्टील के अधिकारियों ने आदिवासियों की उपेक्षा की बात उठाई थी तथा सरकार पर आरोप लगाया कि उसकी एजेंसी के पास उन आदिवासियों के आंकड़े नहीं हैं जिनका इससे विस्थापन हुआ है. एक कंपनी का अधिकारी जानना चाहता था कि सरकार ने विस्थापितों को क्या सुविधाएं दी हैं. कंपनी के अधिकारी ने बताया कि हमने प्रति एकड़ ३.७ लाख का भुगतान किया है और हम विस्थापितों नौकरी देकर संतुष्ट करना चाहते हैं.
सरकार फिर से पुनर्रस्थापन और राहत पालिसी पर काम कर रही है और इसे जल्द से जल्द लागू करना चाहिए. इस्पात कंपनियों को आशा है कि इससे आदिवासी संतुष्ट होंगे तथा उन्हें भी अपनी योजना आगे बढ़ाने में आसानी होगी. पास्को जैसी कंपनियां कठिन मेहनत कर रही हैं जिससे स्थानीय लोगों को साथ लेकर चल सकें. इन कंपनियों में स्थानीय लोगों को नौकरी समेत बेहतर मुआवजा देने के बारे में उनमें काफी समंवय है.
खाद्यान्नों की प्रचुरता के कारण इस्पात कंपनियों को विश्वास है कि जब इस्पात बनना शुरू हो जाएगा तो यह शहर जर्मनी के रूर घाटी की तरह हो जाएगा. यह तथ्य इससे मजबूत होता है कि सरकार ने पेप्सीको जैसी कंपनी को उच्च स्तर का सड़क और रेलवे जैसी संरचना का निर्माण करने का जिम्मा सौंपा है. यदि ऐसा होता है तो राज्य के लोगों को ज्यादा से ज्यादा नौकरियां मिल सकेंगी और सही तौर पर यह उनकी जमीनों का मुआवजा होगा.
हालांकि माफियाओं द्वारा राजनीतिक दलों के माध्यम से इन गरीब आदिवासियों को खतरनाक माओवादी साबित करने और विदेशी निवेश से राज्य की संप्रभुता नष्ट होने जैसे मुद्दे उठाए जाने से ऐसा सोचना केवल सपना साबित होगा.

न्यायपालिका और गरीब

‘कैंपेन फॉर ज्युडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म’, न्यायपालिका की जवाबदेही और इसमें सुधारों के लिए अभियान चलाने वाले प्रतिष्ठित न्यायविदों और बुद्धिजीवियों का संगठन है. हाल ही न्यायपालिका और गरीब विषय पर इस गैरसरकारी संस्था की एक गोष्ठी हुई जिसके बाद जारी बयान पवित्र गाय मानी जाने वाली देश की महाशक्तिशाली न्यायपालिका पर करारी चोट करने की हिम्मत करता है.
देश के ज्यादातर लोगों के लिए न्यायपालिका, न्याय के माध्यम के रूप में काम नहीं कर रही है. ऐसा लगता है कि न्यायपालिका का एक बड़ा हिस्सा इसके उलट उन व्यापारिक हितों के पक्ष में काम कर रहा है जो सरकार को अपने इशारों पर नचा रहे हैं. यही वजह है कि जब शक्तिशाली लोगों या सरकार द्वारा गरीबों के अधिकार कुचले जाते हैं तो न्यायपालिका के आदेश अक्सर उन अधिकारों को बहाल करने की बजाय गरीबों को उन अधिकारों से ही वंचित कर देते हैं.
हाल में हुए कुछ फैसलों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अदालतों का दृष्टिकोण तो कॉरपोरेट हितों के हिसाब से चल रही सरकार के रवैये से भी ज्यादा संकुचित है. गरीबों पर रोज होने वाले जुल्म और अन्याय से न्यायपालिका को कोई फर्क नहीं पड़ता.
जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो गरीब है और जिसकी देश की न्यायिक व्यवस्था तक पहुंच ही नहीं है. दूरी, खर्च और प्रक्रियाओं की जटिलता इसके कारण हैं. वकीलों के बिना इस व्यवस्था तक पहुंचा नहीं जा सकता और गरीब के पास वकीलों को देने के लिए पैसा होता नहीं. अगर कोई गरीब किसी आरोप में फंस जाए तो वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में अपने बचाव के लिए उसके पास कोई उम्मीद नहीं होती. यही वजह है कि कई ऐसे लोग सुनवाई के इंतजार में अपराध के लिए निर्धारित सज़ा से भी ज्यादा वक्त जेल में काट देते हैं.
इससे भी बुरा है ज्यादातर (खासकर सुप्रीम कोर्ट के) जजों में बढ़ता गरीब विरोधी दृष्टिकोण. हाल में हुए कुछ फैसलों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अदालतों का दृष्टिकोण तो कॉरपोरेट हितों के हिसाब से चल रही सरकार के रवैये से भी ज्यादा संकुचित है. गरीबों पर रोज होने वाले जुल्म और अन्याय से न्यायपालिका को कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए जब व्यापारिक हितों के लिए गरीबों को उनकी जमीन और संसाधनों से बेदखल कर दिया गया तो कुछेक अपवादों को छोड़कर अदालतों ने ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया. इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए अक्सर अदालतों ने ही पुनर्वास के बिना गरीब झुग्गीवासियों को हटाने के निर्देश दिए. और ऐसा उनका पक्ष सुने बिना किया गया जो कि उनके आश्रय के अधिकार और निष्पक्ष न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है. कई बार ये इस आधार पर किया गया कि झुग्गीवालों ने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया है और कई बार ये कहकर कि ये झुग्गियां पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाके यानी यमुना के किनारे बनी हुई हैं. मगर जब रिज इलाके में शॉपिंग माल बना या उसी यमुना तट पर अक्षरधाम मंदिर बना तो इनकी राह में कोई ऐसे तर्क आड़े नहीं आए.
अदालतों ने कई शहरों की गलियों से हॉकरों को हटाने का हुक्म भी दिया है. इसमें भी अदालत ने पुनर्वास के मुद्दे पर ध्यान दिए बिना और दूसरे पक्ष की बात सुने बगैर ही फैसला सुना दिया. ये फैसला उनकी आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है. इसी तरह दिल्ली की सड़कों से रिक्शाचालकों को हटाने का निर्देश दिया गया. ये ऐसे कदम थे जिन्हें उठाने में सरकार भी अपने लोकतांत्रिक दायित्वबोध के चलते हिचक रही थी मगर पूरी तरह से गैरजिम्मेदार न्यायपालिका को ऐसा करने में कोई हिचक नहीं हुई.
हाल के दिनों में हमने न्यायपालिका के हाथों श्रम संरक्षण क़ानूनों की धीमी मौत होते देखी है. इसने अनुबंध आधारित श्रम क़ानूनों को लागू करने से इनकार कर दिया और बहुत सफाई से तमाम श्रम क़ानूनों की परिभाषा बड़े व्यापारियों के फायदे के हिसाब से तय कर दी. एक फैसले में तो न्यायपालिका सारी हदें लांघ गई. उसने कहा कि श्रम क़ानूनों की परिभाषा सरकार की आर्थिक नीतियों के मुताबिक तय होनी चाहिए. इस तरह से उसने सरकार के लिए वो काम कर दिया जो सरकार संवैधानिक रूप से नहीं कर सकती थी क्योंकि इसके लिए आम सहमति बनाना मुश्किल होता.
इसी तरह का पक्षपात भरा रवैया गरीबों के प्रति भी देखने को मिला जब हमने नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में कोर्ट के आदेशों का विश्लेषण किया. अक्सर गरीब औऱ कमज़ोर तबके के लोगों की ज़मानत याचिकाओं पर सालों सुनवायी नहीं होती जबकि शक्तिशाली और पैसेवालों के मामले, जिनकी पैरवी बड़े वकील कर रहे होते हैं, पर तुरंत कोर्ट की नज़रें इनायत हो जाती हैं. यहां तक कि बिनायक सेन जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रति भी कोर्ट का रवैया ढुलमुल रहा और उनकी ज़मानत याचिका रद्द कर दी गयी जबकि तस्करों और सफेदपोशों को ज़मानत देने में कोई हिचक नहीं दिखाई दी.
ये देखना होगा कि जिस व्यक्ति की नियुक्ति की जानी है उसका सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण हमारे संविधान के सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से मेल खाता है या नहीं और साथ ही उसके मन में गरीबों के प्रति गहरी समझ और संवेदना भी होनी चाहिए।
देश के नागरिकों के लिए वक्त आ गया है कि वो अपने न्यायिक तंत्र की फिर से समीक्षा करें. एक जनप्रिय न्यायिक तंत्र वो है जिसकी आम नागरिक तक पहुंच बिना किसी पेशेवर वकील की मध्यस्थता के हो सके. इसमें सबकी हिस्सेदारी होना और पारदर्शी तरीके से काम करना जरूरी है। क़ानून और इसकी प्रक्रियाएं सरल होनी चाहिए ताकि ये आम लोगों की समझ में आसानी से आ सके और लोगों तक इसकी पहुंच भी बढ़ सके। कोर्ट की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग होनी चाहिए और इसके आंकड़े सूचना का अधिकार क़ानून के तहत आम नागरिक को सुलभ होना जरूरी हो। हाल ही में प्रस्तावित ग्राम न्यायालय इस दिशा में सही क़दम प्रतीत होता है। इनकी पर्याप्त संख्या में स्थापना की जाय ताकि ये कम से कम हर ब्लॉक पर लोगों को उपलब्ध हो सके। सरल क़ानूनी प्रक्रियाओं के साथ मिलकर ये योजना न्याय प्रक्रिया को तेज़ करने में सहायक सिद्ध होगी। हम यहां जन न्यायालय का विस्तृत खाका खींच सकते हैं लेकिन इसका संपूर्ण ब्लूप्रिंट तैयार किए जाने की जरूरत है।
सबसे महत्वपूर्ण है इन जन अदालतों को संचालित करने वाले जजों की नियुक्तियों में पारदर्शिता, जिसमें जनता की सहभागिता सबसे ज्यादा हो। ये देखना होगा कि जिस व्यक्ति की नियुक्ति की जानी है उसका सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण हमारे संविधान के सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से मेल खाता है या नहीं और साथ ही उसके मन में गरीबों के प्रति गहरी समझ और संवेदना भी होनी चाहिए। इसके लिए हमें एक न्यायिक नियुक्ति आयोग की दरकार है जिसके सदस्य जज न हों। इसमें जनता की पूर्ण भागीदारी की इजाजत हो जो कि लोकतंत्र का मूलभूत आधार भी है।
इसके साथ ही एक ऐसे पारदर्शी और सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने वाले तंत्र की भी जरूरत है जो जजों के प्रदर्शन और दुराचरण पर नजर रखे. जजों को भ्रष्टाचार के अलावा और भी दूसरी वजहों जैसे संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप काम करने और न करने के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. एक पूर्णकालिक, स्वतंत्र, न्यायिक प्रदर्शन आयोग को, जो कि जांचने की क्षमता भी रखता हो, नियमित रूप से जजों के प्रदर्शन की समीक्षा करनी चाहिए.
अक्सर और यहां तक कि आधिकारिक सम्मेलनों में भी कहा जाता है कि यहां की न्यायिक व्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर है, क्योंकि न्याय देने की गति बहुत धीमी है. बहरहाल सिर्फ निर्णय देने की गति को बढ़ा कर गरीबों के लिए प्रभावी न्यायिक तंत्र नहीं बनाया जा सकता. इसके लिए हमें पूरी व्यवस्था को फिर से खड़ा करना होगा. ऐसे क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए देश में एक सशक्त जन आंदोलन की आवश्यकता होगी. यद्यपि यह अभी काफी दूर की बात है लेकिन इस मुद्दे पर जनता के बीच बहस-विचार की शुरुआत हो जानी चाहिए. वर्तमान न्यायिक तंत्र में लगे पैबंद को ढंकने के लिए लगाई गई किसी भी रकम का कोई सार्थक नतीजा नहीं निकलने वाला. बड़ी शल्य क्रिया की आवश्यकता है
साभार - http://www.tehelkahindi.com/InDinon/470.html

जवाबदेही मांगता साल - प्रशांत भूषण

वर्ष 2007 न्यायपालिका के लिए घटनाओं से परिपूर्ण था, खासकर अगर उसे सुखयों में मिली जगह पर ध्यान दिया जाए। ऐसा शायद ही कोई दिन था जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को अखबारों में पहले पन्ने पर और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रमुख खबरों में जगह न दी गई हो। सप्रीम कोर्ट में हर कामकाज के दिन प्रमुख चैनलों के ओबी वैन नजर आते हैं। चाहे किसी महत्त्वपूर्ण मामले की सुनवाई या फैसले का दिन हो या न हो, समाचार माध्यमों के प्रतिनिधि अपने दर्शकों या पाठकों को सबसे पहले खबर पहुंचाने के लिए एक-दूसरे से होड़ लगाते हैं। यहां तक कि न्यायाधीशों के मामूली विचारों को प्रमुख खबर के रूप में पेश किया जाता है। मिसाल के तौर पर मुख्य न्यायाधीश ने हाल में कहा कि वे न्यायिक सक्रियता से संबंधित दो न्यायाधीशों की पीठ के विचार से बंधे नहीं हैं।
मैं यहां इस साल सप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमुख मामलों के फैसलों को नहीं गिनाऊंगा। इस साल न्यायपालिका में दिखे प्रमुख रुझनों के बारे में चर्चा ज्यादा सार्थक होगी। इस साल के शुरू में एक्टिविस्ट मुख्य न्यायाधीश वाई.के. सभरवाल पद से हटे और न्यायमूत के.जी. बालकृष्णन ने उनकी जगह ली। उन्होंने बार-बार स्पष्ट किया था कि न्यायिक सक्रियता के बारे में उनके विचार उनके पूर्ववतयों के विचार से काफी अलग हैं। उन्होंने अदालत में और उसके बाहर कहा कि अदालतें न केवल सरकार की नीतियों बल्कि उसके कामकाज में भी दखल नहीं कर सकतीं। इस तरह पुलिस सुधार से संबंधित न्यायमूत सभरवाल के फैसले उनके उत्तराधिकारी के कुछ हद तक उदासीन रवैये के कारण लटके हुए हैं। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के रवैये का पूरी न्यायपालिका पर निर्णायक असर पड़ा है। हालांकि अभी तक इससे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठों से उठने वाली न्यायिक सक्रियता पर पूरी तरह रोक नहीं लगी है।
सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने हालात सुधारने के लिए ही फैसला दिया था। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि कई अदालतें न्यायिक सक्रियता के नाम पर अपने हदों को लांघ रही हैं। न्यायमूत काटजू और माथुर ने कहा कि कई मुकदमों में न्यायाधीश सरकारी विशेषज्ञों की राय पर अपनी राय थोपने का प्रयास करके ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश स्पीड ब्रेकर के आकार, हवाई अड्डों पर विमानों के लिए प्रतीक्षा शुल्क, नर्सरी में दाखिले से पहले बच्चों के साक्षात्कार लिये जाने चाहिए या नहीं, संसद में किस तरह से मतदान कराना चाहिए इत्यादि जैसे मामलों के विशेषज्ञ नहीं हैं। इसके अलावा, जनता ने उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से चुना नहीं है न ही वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं या फिर कोई भी संस्था उनकी समीक्षा नहीं करती। न्यायिक आदेशों के जरिए कार्यपालिका या संसद पर अपने विचार थोपना न केवल उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है बल्कि किसी भी लोकतंत्र में यह खतरनाक हो सकता है। इन न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि अदालत कानून नहीं बना सकती या संसद को कानून बनाने के लिए किसी भी तरह से निर्देश नहीं दे सकती। यह भी खतरनाक होगा क्योंकि इस तरह के आदेश संसद जैसी किसी निर्वाचित संस्था की समीक्षा का विषय नहीं होंगे। अदालत ने कहा कि हाल में कई न्यायाधीश ऐसे व्यवहार करने लगे हैं मानो वे सम्राट हों और अगर यह रुझान जारी रहा तो इससे न केवल कार्यपालिका और संसद के साथ टकराव अवश्यंभावी है बल्कि इससे न्यायपालिका के अधिकार काफी कम हो सकते हैं।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों के कई विवादास्पद फैसले और आदेश आए जिन पर निर्वाचित विधायकों और सांसदों ने काफी नाराजगी जाहिर की तथा न्यायपालिका में ही काफी लोग आहत हुए। न्यायमूत काटजू और न्यायमूत माथुर के फैसले से न्यायपालिका की सक्रियता और न्यायपालिका के अधिकारों पर रोचक बहस छिड़ गई। इस फैसले की आलोचना में कहा गया कि इसने सप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के फैसले के विरुध्द टिप्पणी की और इस तरह यह फैसला स्वयं न्यायपालिका के अनुशासन के विरुध्द है। एक और आलोचना में कहा गया कि इसने उन मुकदमों के खिलाफ टिप्पणी की है जो उस अदालत के सक्षम नहीं हैं और उनमें अदालत ने दूसरे पक्ष की दलील नहीं सुनी है। वैसे, यह प्रक्रिया की आलोचना थी। लेकिन इस संक्षिप्त फैसले की एक महत्त्वपूर्ण आलोचना हो सकती है। हालांकि इसमें जो बातें कही गईं उनमें से अधिकांश न केवल सही हैं बल्कि वे स्वागत योग्य हैं और उनकी जरूरत थी। एक ओर जहां फैसले में कहा गया है कि अदालतें नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, वहीं अदालतों का अक्सर ऐसी परिस्थितियों से सामना होता है जिनमें सरकार की नीति बिना किसी सोच-समझ के लागू होती है और उनमें किसी विशेषज्ञ समिति की राय नहीं होती। कभी-कभी यह स्पष्ट होता है कि नीतिगत फैसला बाहरी कारकों के मद्देनजर किया गया है या ऐसे लोगों ने फैसला किया है जिनके बीच जबरदस्त हित संघर्ष है। मिसाल के तौर पर मौजूदा सरकार द्वारा परमाणु बिजली उत्पादन में इजाफा करने और अमेरिकी सरकार के साथ परमाणु करार करने के सरकार के नीतिगत फैसले के आलोचकों का कहना है कि इस तरह के फैसले से पहले ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की लागत और लाभ के बारे में कोई विश्लेषण नहीं किया गया। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष गोपालकृष्णन, प्रोफेसर एम.जी.के. मेनन जैसे लोग अकसर इस तरह की बातें करते रहे हैं। अगर कई परमाणु बिजली संयंत्र (जो कई वजहों से बेहद खतरनाक हैं) लगाने के लिए जनहित याचिका दायर की जाती है तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती और सरकार से पूछ सकती है कि क्या ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की लागत और लाभ के लिए अध्ययन करके ही इस तरह का फैसला किया गया है। दुर्भाग्यवश सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अदालत के अधिकारों और कामकाज के बारे में खुलासा नहीं होता।
एक और मामले को लें जो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है। सरकार आनुवांशिक रूप से संवर्ध्दित खाद्यान्न और ऑर्गेनिज्म (जो कई तरह से जहरीले, एलर्जीकारक और खतरनाक हो सकते हैं) का खुलकर आयात करती है। इसके लिए इन ऑर्गेनिज्म की जैव सुरक्षा या सूक्ष्म जीवों, जानवरों और इंसानों पर उनके प्रभाव का अध्ययन नहीं किया गया है। क्या अदालत इसमें हस्तक्षप कर सरकार से यह नहीं कह सकती कि इस तरह के खुद से उत्पन्न होने वाले खतरनाक ऑर्गेनिज्म को लाने से पहले जैव सुरक्षा की जांच और अध्ययन सुनिश्चित करने चाहिए। मान लीजिए, जैसा कि इस मामले में है, कि सरकार कहती है कि जैव सुरक्षा की जांच करने और मंजूरी देने के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर दी है। लेकिन अदालत को पता लगता है कि विशेषज्ञों की उस समिति में ऐसे लोग हैं जो कंपनियों और संगठनों से जुड़े हुए हैं और उन्हें पैसा मिल रहा है और आनुवांशिक रूप से संवर्ध्दित खाद्यान्न को मंजूरी दिलाने में उनका निहित स्वार्थ है। क्या अदालतें उनमें यह कहकर हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं कि विशेषज्ञों के स्वतंत्र समूह से पर्याप्त अध्ययन कराए बिना इन खतरनाक पदार्थों को देश के नागरिकों को न मुहैया कराया जाए। दुर्भाग्यवश, अदालत के आदेश से इन परिस्थितियों पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। यही वजह है कि इससे हाईकोर्टों और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी कुछ भ्रम पैदा हो सकता है।
लिहाजा यह स्वागत योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट की उच्च पीठ जनहित के मामलों में अदालत के अधिकारों के लिए व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने पर विचार कर रही है। लेकिन इस कसरत को उचित, विश्वसनीय और उपयोगी बनाने के लिए यह काम पांच सदस्यीय संविधान पीठ को करना चाहिए और इससे पहले देश के जनहित में सोचने वाले नागरिकों को इस बारे में राय रखने का मौका दिया जाना चाहिए। यह इतना महत्त्वपूर्ण कार्य है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की पीठ के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।
न्यायपालिका की ईमानदारी पर संदेह करने वाली एक महत्त्वपूर्ण घटना हुई। दिल्ली में कमशयल संपत्तियों की सीलिंग के संबंध में मुख्य न्यायाधीश वाई.के.सभरवाल पर आरोप लगाए गए। मुख्य न्यायाधीश वाई.के. सभरवाल के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में उन कमशयल संपत्तियों को सील करने के आदेश पारित किए जो पहले के मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय इलाकों पर बनाए गए थे। इसकी वजह से दिल्ली में दहशत और अराजकता फैल गई और लाखों दुकानों तथा दफ्तरों को नए शॉपिंग मॉल और कमशयल कांप्लेक्सों में स्थानांतरित करना पड़ा। हालांकि सरकार ने मास्टर प्लान में तब्दीली करके कई आवासीय इलाकों को कमशयल उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी फिर भी इस सीलिंग की मुहिम को जारी रखने का आदेश दिया गया। वैसे, बाद में पता चला कि एक ओर न्यायमूत सभरवाल इन आदेशों को पारित कर रहे थे और दूसरी ओर उनके बेटों ने शॉपिंग मॉल और कमशयल कांप्लेक्स के डेवलपरों से साझेदारी कर ली और इस तरह अपने पिता के आदेशों से उन्हें फायदा हो रहा था। यह भी पता चला कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें ऐसे समय में बड़े पैमाने पर कमशयल संपत्ति आवंटित कर दी जब न्यायमूत सभरवाल अमर सिंह के चचत टेपों के मामले की सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने उनके प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। संयोगवश, इन कमशयल भूखंडों को आवंटित करने का प्रभार अमर सिंह के पास ही था। इस मामले का खुलासा करने वाले अखबार मिड डे के पत्रकारों के खिलाफ सुओ मोटु नोटिस लेकर अदालत की अवमानना का मामला बनाया गया और उन्हें चार महीने कारावास की सजा सुनाई गई। इस फैसले पर मीडिया में काफी हंगामा खड़ा हो गया और फिर अवमानना के मामले में अदालत के अधिकारों की समीक्षा करके उन्हें सीमित करने की मांग उठने लगी। खासकर ''अवमानना की परिभाषा में से अदालत को विवादित करने या उसके अधिकार को कम करने'' वाले अंश को हटाने की मांग की जाने लगी। 2007 में कई संदिग्ध न्यायिक नियुक्तियों और प्रोन्नतियों का भी भंडाफोड़ हुआ। इसकी वजह से इस तरह की नियुक्तियों और प्रोन्नतियों में मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट में उनके कॉलेजियम के मनमानीे सिफारिशों से पर्दा हट गया। खासकर, चेन्नै हाईकोर्ट में न्यायमूत अशोक कुमार की नियुक्ति को इस आधार पर सप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई कि इस बारे में अकेले मौजूदा मुख्य न्यायाधीश ने सिफारिश की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों के मुताबिक दूसरे न्यायाधीशों के कॉलेजियम के साथ मशविरा नहीं किया था। इस तथ्य के बावजूद यह सिफारिश की गई कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों ने इससे पहले उनकी ईमानदारी के बारे में विपरीत रिपोर्टों के मद्देनजर उन्हें न्यायाधीश नियुक्त न करने की सिफारिश की थी। नियुक्तिप्रोन्नति का एक और संदिग्ध उदाहरण न्यायमूत जगदीश भल्ला से जुड़ा था, जिन्हें हिमाचल के मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रोन्नति दी गई। यह सिफारिश इस तथ्य के बावजूद की गई कि उन्हें गंभीर आरोपों के कारण केरल का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने के योग्य नहीं समझा गया। लेकिन अदालत की अपनी आंतरिक प्रक्रिया के मुताबिक इन आरोपों की जांच नहीं की गई। यह प्रक्रिया 1999 के मुख्य न्यायाधीशों के कॉन्फ्रेंस में तैयार कर दी गई थी। यह वही आंतरिक प्रक्रिया है जिसे न्यायाधीश जांच संशोधन विधेयक के जरिए संवैधानिक दर्जा दिए जाने की कोशिश की जा रही है। सभ्य समाज और संसद की स्थायी समिति की तीखी आलोचना के चलते यह विधेयक संकट में है। इस विधेयक को स्थायी समिति के हवाले किया गया था। एक आलोचना यह है कि न्यायाधीशों में भाईचारा होता है और ऐसे में न्यायाधीशों की समिति को अपने ही भाइयों के खिलाफ जांच करने का काम सौंपना मुनासिब नहीं होगा।
इन सारी घटनाओं और खुलासों के कारण न्यायपालिका और न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया की गंभीर आलोचना शुरू हो गई है और उस पर बहस छिड़ गई है। पहली बार देश में न्यायपालिका से जवाबदेही मांगी जाने लगी है, पहली बार मीडिया ने खुलेआम न्यायिक जवाबदेही की जरूरत पर बात शुरू कर दी है। 2007 में पहली बार न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया, जिसे न्यायपालिका ने सरकार से छीन लिया, पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे। 2007 में ही पहली बार देश में न्यायिक सक्रियता पर गंभीर बहस शुरू हो गई। उम्मीद है कि 2007 में शुरू हुई बहस आने वाले वर्षों में तेज होगी और इसकी वजह से उचित व्यवस्था और न्यायिक जवाबदेही के लिए संस्थाएं बनाई जाएंगी और देश के लोग न्यायपालिका पर भरोसा करने लगेंगे।

न्यायपालिका और गरीब - प्रशांत भूषण

अगर किसी से भी यह पूछा जाए कि देश की न्यायपालिका के दरवाजे तक सही मायने में कितने लोग पहुंच पाते हैं? तो नि:संदेह ! उत्तर होगा ''आधे से भी कम''। वजह- हमारी न्यायिक व्यवस्था। जिसे गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया था। अंग्रेजों की न्यायिक व्यवस्था ने हमेशा से आम आदमी को इंसाफ दिलाने के बजाय अंग्रेजों का साथ दिया ताकि भारतीय उनके गुलाम बने रहें। यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया के लिए न केवल अंग्रेजी भाषा इस्तेमाल की गई बल्कि उसे इतना जटिल बना दिया गया है कि आम आदमी वकीलों की मदद के बिना तो वहां तक पहुंच ही नहीं सकता। ड्रेस कोड भी जानबूझकर आम आदमी के दिलों में व्यवस्था के लिए खौफ पैदा करने के लिए बनाया गया था। किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए आदमी के लिए खुद को बचा पाना नामुमकिन है। वह पूरी तरह से पुलिस और न्यायपालिका की दया पर निर्भर है, क्योंकि उसे तो कोर्ट की भाषा समझ में आती नहीं, तो 'कोर्ट' अकेले ही सारी प्रक्रिया निपटा लेता है। इससे भी कड़वा सच तो यह है कि देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए बनाई गई न्यायिक व्यवस्था केवल कागजों पर ही नजर आती है। ऐसी व्यवस्था गरीबों को इंसाफ दिलाने का साधन हो ही नहीं सकती।
70 के दशक के उत्तरार्ध्द में जब जस्टिस भगवती-कृष्ण अय्यर ने जनहित याचिका की परम्परा बनाई; तक यह सोचा गया था कि एक ऐसा यंत्र है जो गरीब की रोजी-रोटी और अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयं नागरिकों द्वारा ही सर्वोच्च अदालत की भूमिका निभाई जाए और न्यायालय गरीबों के अधिकारों की रक्षा के लिए आम जनता की ओर से काम करे। तभी सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को विस्तार से परिभाषित किया। यह परिभाषा खासकर संविधान के अनुच्छेद-21 में दिये गए 'जीवन के अधिकार' के संबंध में थी। अनुच्छेद 21- में 'सम्मान से जीने का अधिकार' शामिल किया गया और सम्मानपूर्वक जीने के लिए भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए।
इसलिए 80 के दशक में लीक से हटकर भी कुछ फैसले लिए गए। बेगार पर रोक, कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, बंदीकरण सुरक्षा के अधिकार, पागलखानों में सुरक्षित परिस्थितियां, बेघर-फुटपाथियों के अधिकार आदि कई मुद्दों पर न्यायालय ने सकारात्मक रवैया अपनाया। लेकिन 90 के दशक में उदारीकरण के युग में गरीबों के प्रति उच्च न्यायालयों का रूख धीरे-धीरे बदलता गया। अब तो यह आलम है कि न्यायालय आम आदमी के लिए जीविका, आवास, आजादी आदि सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार को निर्देश देने से भी पीछे हट रहे हैं। यहां तक कि अपने ही दिये हुए पुराने निर्णयों को ही नकार रहे हैं। वे निर्णय जो गरीबों के लिए आवास, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के कोई प्रबंध न होने की वजह से पूर्व में न्यायपालिका द्वारा दिऐ गए थे।
आज गरीब आदमी 'नव आर्थिक उदारीकरण' की नीतियों की मार झेल रहा है। उसकी जमीन, पानी और रोजी-रोटी राज्य द्वारा कब्जाई जा रही हैं ताकि सबकुछ बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धन्ना-सेठों की खनन, सेज और दूसरे बड़े-बड़े प्रोजेक्टों, आदि के लिए दी जा सकें। ऐसे में न्यायालयों को उन गरीबों की मदद के लिए आगे आना चाहिए था, जिनके अधिकार छीने जा रहे हैं। गरीबों के लिए कुछ करना तो दूर, न्यायालय उन संस्थाओं और लोगों की आवाज भी नहीं सुन रहे हैं, जो इन गरीबों के लिए न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
न्यायालयों में आजकल गरीब विरोधी निर्णयों का तो फैशन ही चल पड़ा है। मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग द्वारा दायर किए जनहित मुकद्मों में जो न्यायालय गरीब-पक्षधर सकारात्मक रूख अपनाते थे, दुर्भाग्यवश आज वे ही अपने फैसलों से गरीबों से आवास, व्यवसाय, रोजी और यहां तक कि आजादी भी छीन रहे हैं। बहुत से मामलों में तो देखा यह जा रहा है कि कोर्ट गरीबों को नोटिस तक देने की जहमत नहीं उठा रहे हैं, जिनके घरों को उनके फैसले पर उजाड़ दिया गया, रोजी छीन ली गई है और आजीविका एक ही पल में मिट्टी कर दिए गए और इस सबको 'कानून का शासन' नाम का जामा पहनाया जा रहा है। अमीरों को साफ-सुथरा पर्यावरण देने के कानून के लिए शासन के नाम पर गरीबों को सरकारी जमीन पर बने उनके मकानों में रहने से रोका जाता रहा है। जैसे कि दिल्ली और मुम्बई में हमने देखा कि एक ओर तो उच्च-मध्यम वर्ग की कॉलोनियों के पास बनी गरीबों की झुग्गियों की उजाड़ दिया गया तो दूसरी ओर दिल्ली की सड़कों से साइकिल और रिक्शा चलाने वालों को महज इसलिए हटा दिया गया, ताकि मध्यम और उच्च वर्ग के अमीरजादों को कार में घूमने का रास्ता साफ/क्लियर मिल सके।
ऐसा लगता है कि इन निर्देशों के पीछे 'कोर्ट' और सरकार की मिलीभगत है, क्योंकि सरकार दिल्ली में यमुना पुश्ता पर बनी झुग्गियों को हटाना चाहती थी ताकि उस जमीन पर फाइव स्टार होटल और शॉपिंग माल्स बनाए जा सकें। सरकार में इतना दम नहीं था कि वह राजनीतिक रूप से इन झुग्गियों को हटाती। वजह, चुनाव में हर पांच साल बाद वोट भी तो लेने होते हैं। सो इसने न्यायपालिका के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई, क्योंकि न्यायपालिका लोकतांत्रिक या अन्य किसी भी तरह से, किसी भी प्रकार के संस्थान के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह बड़ी आसानी से ऐसे आर्डर पास कर सकती थी, खासकर तब; जबकि फैसले इस वर्ग (न्यायपालिका के इलीट वर्ग) के भी अनुकूल थे। पिछले कुछ सालों से जिस तरीके से कामगारों और मजदूरों के लिए बने कानूनों को बिगाड़ा है। उससे सरकार और न्यायपालिका की जालसाजियों की सारी पोल खोल दी है। जैसे ही आर्थिक नीतियों का उदारीकरण किया गया और विदेशी कंपनियों को भारत में दुकानें खोलने के लिए बुलाया गया तो उद्योगों ने श्रम कानूनों को भी कम करने के लिए कदम उठाए और हवाला दिया कि देश को नए श्रम सुधारों की जरूरत है। इन सुधारों से श्रमिकों को मिली हुई सुरक्षा खत्म हो जाएगी और उन्हें अपने मालिकों की दया पर जीना होगा।
इसके बाद की सरकारों के लिए श्रम कानूनों को खत्म करना जरा मुश्किल था क्योंकि वे सभी वामपंथी पाटियों के सहयोग पर निर्भर थीं या फिर उन्हें कामगारों और गरीबों से अगले चुनावों में वोट न मिलने का भी खतरा था। लेकिन तभी फिर से 'न्यायपालिका' में सुविधाजनक रास्ता खोज लिया गया और न्यायपालिका ने बड़ी ही सफाई से मजदूरों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर अपनी कैंची चला दी। इन कानूनों की नई परिभाषाएं देकर गरीब मजदूरों को कर्ज और मुफलिसी की जिंदगी के जीने का फरमान सुना दिया। 'कांट्रेक्ट लेबर एक्ट' तो एक तरह से खत्म ही हो गया है, क्योंकि एक के बाद एक मुकद्मे होने के बावजूद भी न्यायालय इसे लागू करने से इनकार कर रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय तो इनसे भी एक कदम आगे चला गया और कहा कि 'न्यायालय अपनी राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों के अनुसार श्रम कानूनों को परिभाषित कर सकती हैं।' इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय की एक अन्य बेंच ने भी सरकार के उस फैसले को उचित ठहराया जिसमें उसने मॉरिशस में रजिस्टर्ड किसी 'एक पोस्ट बॉक्स कम्पनी' को 'इण्डो-मॉरिशस डबल टैक्सेशन अवाइडेंस एग्रीमेंट' का लाभ उठाने की अनुमति दे दी और इस तरह भारत को कोई भी टैक्स न देने का रास्ता साफ कर दिया। अब यह भारत में काम कर रही सभी विदेशी कंपनियां इसी रास्ते पर चल रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब सरकार ऐसे आदेश देकर कम्पनियों को कर से छूट दे सकती है। यह तो एक व्यवस्थित संसदीय-प्रक्रिया का भी माखौल है क्योंकि संसद केवल वित्त विधेयक द्वारा ही करों में छूट आदि के कानून बना सकती है।
नक्सलियों, माओवादियों या फिर मानव अधिकारों के लिए लड़ने वालों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के मामलों में भी न्यायालयों का अनुदारवादी और फासीवादी रूख नजर आ रहा है। राज्यों ने जिन लोगों को नक्सलवादी और माओवादी करार दिया, उनकी अपीलों के साथ जिस तरह न्यायालय ने व्यवहार किया और जिस तरीके से समाजसेवी डॉ. विनायक सेन की जमानत नामंजूर की, वह सब इस बात की तरफ इशारा करता है कि कुछ न्यायधीशों ने फासीवादी रूख अपनाने का मन ही बना लिया है।
अब यह बात साफ हो गई है कि अब न्यायपालिका गरीबों पर अत्याचार करने, भयभीत करने और यहां तक कि गरीबों से सबकुछ छीन लेने वाला तंत्र बनकर रह गई है। वह भी आम-जन को डराने और अत्याचार करने वाली संस्था बन गई है। ठीक वैसे ही जैसे पुलिस और नौकरशाही; आज विदेशी कंपनियों के पिट्ठू बनकर आम आदमी पर अत्याचार कर रहे हैं।
न्यायपालिका के जन-विरोधी रूख के लिये दरअसल इसका ढांचा ही जिम्मेदार है। इसमें वर्गीय प्रतिनिधित्व, चयन की प्रक्रिया और सदस्यों का स्थायित्व आदि कई खामियों ने न्यायपालिका को जनता की पहुंच से दूर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय में ज्यादातर जज ऊंची जाति और उच्च मध्यम वर्ग से आते हैं। इसलिए गरीबों के प्रति सहानुभूति तो शायद ही उनके मनों में होती है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में ही अपारदर्शिता, निरंकुशता और भाई-भतीजावाद चलता है। जो व्यक्ति या अधिवक्ता उनके संघ के साथ मेल नहीं खाता और शासक वर्ग के साथ जिसका तालमेल नहीं है उसे चयन की प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया जाता है। 1993 में न्यायपालिका ने संविधान की नई व्याख्या करके जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका के हाथों से छीन लिया और कार्यपालिका से स्वयं को 'मुक्त' करने के लिए न्यायपालिका ने सब किया। यह सब किया आजादी के नाम पर लेकिन गौर किया जाए तो इस सबसे न्यायपालिका की न तो स्वतंत्रता बढ़ी है; न ही न्यायपालिका में कोई सुधार ही हुआ है।
अब देश की जनता के लिए समय आ गया है कि वह वर्तमान न्यायिक व्यवस्था और उस प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाए, जिससे वह गरीबों को न्याय और अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अत्याचारी शासक बन गई है।
न्यायपालिका के सभी पक्षों और सारी कारगुजारियों को ध्यान में रखकर और विमर्श करके ही यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि अब क्या किया जाए, इसी को ध्यान में रखते हुए गरीब और न्यायपालिका पर चर्चा के लिए यह सभा आयोजित की गई है। इस सभा में हम न्यायपालिका के ढांचे, कार्यों, कार्यवाहियों और व्यवहार पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह चर्चा खासतौर पर गरीबों के प्रति न्यायपालिका के व्यवहार पर होगी। चर्चा में न्यायपालिका के कार्यों में बदलाव लाने वाले, ढांचागत परिवर्तनों का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की जाएगी ताकि न्यायपालिका आम आदमी के अधिकारों को लागू और रक्षा करने वाली बनें। इन परिवर्तनों को लागू करने के लिए हमें अफसरों पर दबाव डालने के लिए एक अभियान और राजनीतिक स्ट्रेटेजी बनाने की जरूरत है।
हमें उम्मीद है कि जन आंदोलनों के प्रतिनिधि, ग्रासरूट संस्थाएं और दूसरे वे सभी लोग जो देश में न्यायपालिका की हालत पर चिन्तित हैं, इस सभा में जरूर भागीदारी करेंगें।

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