प्रसव पीड़ा के व्यवसायीकरण की अमानवीय कोशिश

5.60 लाख की जनसंख्या वाले श्योपुर जिले में 533 गांव हैं। यहां के एक जिला एवं चार अन्य अस्पतालों में मरीजों के लिये कुल 166 पलंग ही उपलब्ध हैं जिनमें से 148 बिस्तर पिछले 13 वर्षों से बदले नहीं गये हैं। विगत दो वर्षों से सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देने के लिये जमकर बातें की जा रही हैं किन्तु पिछले छह वर्षों की तरह अब भी जिले के कराहल विकासखण्ड में चार में से तीन चिकित्सकों के पद खाली पड़े हुये हैं। इस दौरान न तो चिकित्सा व्यवस्था में सुधार हुआ न ही एक भी प्रसूति रोग विशेषज्ञ की नियुक्ति ही यहां हो र्पाई। इसी जिले के गोठरा कपूरा गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बिलासी देवी अपने अनुभवों के आधार पर कहती हैं कि अस्पताल में क्यों जायें, वहां एक तो कोई भी अच्छे से बात नहीं करता है ऊपर से नर्स, डॉक्टर और सफाई करने वाली बाई हर कोई पैसे मांगता है परन्तु सरकार कहती है कि संस्थागत प्रसव कराने पर सत्रह सौ रूपये मिलेंगे, वाहन का भाड़ा मिलेगा और दवाई मिलेगी; भभूति के प्रसव के दौरान गये थे और वह जमीन गिरवी रखकर ही मां बन पाई। . . . . . पूरा पढ़ें

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